कोरोना महामारी: भारत की ओर देख रही दुनिया

    दिनांक 11-अप्रैल-2020   
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लॉकडाउन के बीच भारत एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। दुनिया के देश एक-दूसरे से कटे हुए हैं, ऐसे में कच्‍चे माल की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। केंद्र सरकार बुद्धिमानी से उपलब्‍ध संसाधनों और संभावनाओं का समुचित उपयोग कर रही है। भारत न केवल आंतरिक स्‍तर पर महामारी से निपट रहा है, बल्कि दुनिया के कई देशों की भी मदद कर रहा है

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कोविड-19 से पूरी दुनिया अस्‍त–व्‍यस्‍त है। भारत भी अब तक की सबसे खराब स्थिति में है। लेकिन सीमित संसाधनों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में भारत जिस तरह से इस महामारी से निपट रहा है, दुनिया उसे देख रही है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) भी भारत द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना कर चुका है। अमेरिका, इटली, इजरायल, ईरान सहित दुनिया के दर्जनों देश मदद के लिए भारत से गुहार लगा चुके हैं। वैश्विक आपदा के इस दौर में दुनिया के लिए भारत उम्‍मीद की किरण बन कर उभरा है। भविष्‍य की चुनौतियों को देखते हुए भारत ने भी कमर कस ली है।
कोविड-19 का टीका विकसित करने के लिए डब्‍ल्‍यूएचओ ने दुनियाभर के हजारों वैज्ञानिकों की एक टीम बनाई है। इसमें भारत भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। साथ ही, दुनियाभर के हजारों शोधार्थियों ने भी ‘क्राउडफाइट कोविड-19’ जैसे अंतरराष्‍ट्रीय मंचों के जरिए मदद की पेशकश की है। ट्विटर, फेसबुक और लिंक्‍डइन जैसे सोशल मीडिया ऐप के जरिए भी बड़ी संख्‍या में शोधार्थी इस मुहिम से जुड़ रहे हैं। इन सबके बीच भारत अभी अपनी आंतरिक मेधा शक्ति की पहचान करने में जुटा हुआ है। लॉकडाउन के दौरान स्‍टार्टअप कंपनियों और शोध संस्‍थानों ने जो काम किए हैं या काम कर रहे हैं, उसके परिणाम उत्‍साहजनक हैं।
चुनौतियों के बीच अवसर
भारत के समक्ष फिलहाल दो बड़ी चुनौतियां हैं- संसाधनों की कमी और आर्थिक तंगी। महामारी से निपटने के लिए फिलहाल भारत को परीक्षण किट, पीपीई, वेंटिलेटर, मास्‍क, सैनिटाइजर, थर्मल स्‍कैनिंग और स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों के लिए ड्रेस की बहुत जरूरत है। चूंकि दुनियाभर के देश एक-दूसरे से कटे हुए हैं, इसलिए कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में अड़चनें आ रही हैं। लिहाजा भारत में ही 24 घंटे बड़े पैमाने पर इन वस्‍तुओं का उत्‍पादन किया जा रहा है। इसमें देश के वैज्ञानिकों के साथ समन्‍वय बनाते हुए अनुसंधान एवं विकास संस्‍थान के साथ ‘मेक इन इंडिया’ को भी शामिल किया गया है। अगर इन चुनौतियों से उबरते हुए भारत उभरा तो वह विश्‍व गुरु बन सकता है। सबसे अच्‍छी बात यह है कि आपदा की इस घड़ी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और सहयोगी मंत्रालयों की अधीनस्‍थ संस्‍थाएं एक-दूसरे के साथ समन्‍वय बनाकर कोविड-19 और भविष्‍य में ऐसी अन्‍य चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीक और उच्‍च गुणवत्‍ता वाले उपकरण बना रही हैं।
संकट का यह दौर ‘मेक इन इंडिया’ और स्‍टार्टअप कंपनियों के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है। केंद्र सरकार ने ‘कोविड-19 कार्य बल’ का गठन किया है, जो कोरोना वायरस से जुड़ी प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, प्रयोगशाला, उद्योग आदि क्षेत्र में काम करेगा। इसमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारतीय चिकित्‍सा अनुसंधान परिषद, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, अटल नवोन्‍मेष मिशन, सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्‍यम मंत्रालय, स्‍टार्टअप इंडिया और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद शामिल हैं। खास बात यह कि कार्य बल ने 500 से अधिक संस्‍थाओं को चिह्ति किया है, जो सस्‍ते परीक्षण किट, वेंटिलेटर, डाटा विश्‍लेषण उपकरण के अलावा मास्‍क, सुरक्षा उपकरण, सैनिटाइजर और दवाएं आदि बनाती हैं। इसके अलावा, इस कार्य बल का काम कृत्रिम बुद्धिमता व तकनीक का इस्‍तेमाल करते हुए बीमारी फैलने के तरीकों की खोज करना, उनकी निगरानी तथा नियंत्रण करना भी है।
वैज्ञानिक एवं औद्योगि अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने कोविड-19 से मुकाबला करने के लिए पांच स्‍तरीय रणनीति अपनाई है। इसमें उसे उद्योग जगत से भी व्‍यापक समर्थन मिल रहा है। सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. शेखर. सी मांडे के अनुसार, सीएसआईआर की 38 प्रयोगशालाओं में शोध एवं प्रयोग कार्य चल रहे हैं। पांच स्‍तरीय रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए कुछ कंपनियों के साथ करार किए गए हैं। यही नहीं, डॉ. मांडे की अध्‍यक्षता में एक रणनीतिक समूह भी गठित किया गया है, जो कार्य समूह के साथ संबंधित कार्य क्षेत्रों की नियमित समीक्षा करता है।
शोध-प्रयोग पर जोर

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जैव प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद ने ‘कोविड-19 कंसोर्टियम’ कार्यक्रम की घोषणा की है। इसमें उद्योग, शिक्षा, उद्योग-अकादमिक की भागीदारी के लिए प्रस्‍ताव आमंत्रित किए गए हैं। इसका उद्देश्‍य सस्‍ती जांच तकनीक, टीका, नवीन चिकित्‍सा विज्ञान, दवाओं के बारे में पुनर्विचार या कोरोना वायरस की रोकथाम सहित अन्‍य उपायों पर काम करना है। इसके अलावा, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नवोन्‍मेष इकाई और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने फोर्ज तथा इनोवेशिओक्‍यूरिस के साथ मिलकर एक मेगा ऑनलाइन चुनौती ‘समाधान’ की शुरुआत की है। इसका उद्देश्‍य विद्यार्थियों व फैकल्‍टी को नए प्रयोग तथा नई शोध के लिए प्रेरित करना तथा उनके शोध को मजबूत आधार उपलब्‍ध कराना है ताकि सरकारी एजेंसियों, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं, अस्‍पतालों और अन्‍य सेवाओं को आपात चुनौतियों से निपटने में मदद मिले। साथ ही, ‘समाधान’ के तहत देश के लोगों को जागरूक बनाने, उन्‍हें किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए प्रेरित करने, किसी भी संकट से निपटने तथा रोजगार दिलाने में सहायता दी जा सकेगी।
वहीं, भारतीय तकनीक वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने ‘न्‍यू इंडिया मिलेनियम इंडियन टेक्‍नोलॉजी लीडरशिप इनिशिएटिव’ के तहत कोरोना जैसी महामारी के प्रभावी रोकथाम के लिए सस्‍ते वेंटिलेटर, अत्‍याधुनिक और तेजी से काम करने वाले जांच उपकरण, नई दवाएं, औषधियों, नए टीके या टीकों की पुनर्खरीद और ट्रैस एंड ट्रेस उपकरण के लिए उद्योगों से प्रस्‍ताव मांगे हैं। इन सब कार्यों के अलावा, अन्‍य संस्‍थानों से भी उत्‍साहजनक परिणाम मिल रहे हैं, जैसे- सीएसआईआर, इंस्‍टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्‍स एंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी ने पेपर स्ट्रिप आधारित परीक्षण किट बनाया है, जो एक घंटे के भीतर कोरोना वायरस सार्स-कोव-2 का पता लगा सकती है।
सस्‍ते स्‍वदेशी उपकरणों का विकास
भारत में बनने वाले ये उपकरण और जांच किट न केवल भरोसेमंद हैं, बल्कि सस्‍ते भी हैं। इसी कड़ी में त्रिवेंद्रम स्थित श्री चित्रा तिरुनल आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्‍थान ने एक वेंटिलेटर विकसित किया है। बेंगलुरु में इसका परीक्षण चल रहा है। परीक्षण के बाद इसका उत्‍पादन शुरू हो जाएगा। संस्‍थान कोरोना संक्रमितों की जांच के लिए कम लागत वाला डिजिटल एक्‍स-रे डिटेक्‍टर भी विकसित करने का प्रयास कर रही है। यही नहीं, कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में अस्‍पतालों के लिए संक्रमित रोगियों के स्राव का निपटान भी बड़ी समस्‍या बन गई है। इससे निपटने के लिए भी संस्‍थान एक नवाचार के साथ आगे आया है। इसके अलावा, जवाहरलाल नेहरू उन्‍नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) ने रोगाणुरोधी कोटिंग विकसित किया है, जो एन्‍फ्लूएंजा वायरस और प्रतिरोधी रोगजनक बैक्टीरिया व कवक को पूरी तरह नष्‍ट करने में सक्षम है। खास बात यह है कि इसमें सीवियर एक्‍यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस-2 (सार्स-कोव-19) से निपटने की क्षमता है।
भारत में निजी स्‍तर पर चल रहे प्रयासों से भी कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में तेजी आई है और विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि पुणे की कंपनी माईलैब डिस्‍कवरी सोल्‍यूशंस देश की पहली कंपनी है, जिसने कोविड-19 रैपिड परीक्षण किट विकसित की है। यह किट ढाई घंटे के भीतर जांच के नतीजे दे सकती है। एक किट से 100 मरीजों की जांच की जा सकती है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ), भारतीय चिकित्‍सा शोध संस्‍थान से मंजूरी मिलने के साथ ही इसका उत्‍पादन शुरू हो गया है। बाजार में इसके आ जाने से एक निजी प्रयोगशाला में रोजाना 1,000 जांच किए जा सकेंगे। जल्‍दी ही यह उत्‍पादन प्रति सप्‍ताह 1.5 लाख से बढ़ाकर 20 लाख करेगी। किट का उत्‍पादन सीरम और एपीजी के सहयोग से हो रहा है। सीरम के सीईओ अदर पूनावाला ने कहा कि देश में एक से दो महीने के भीत जांच किट की किल्‍लत नहीं रहेगी। उधर, फास्‍टसेंस डाइग्‍नोस्टिक्‍स नामक स्‍टार्टअप कंपनी ने कोविड-19 का पता लगाने के लिए दो उत्‍पाद बना रही है- पीसीआर आधारित किट और पोर्टेबल चिप आधारित मॉड्यूल। पीसीआर किट प्रति घंटे करीब 50 नमूनों की जांच कर सकता है, जबकि पोर्टेबल चिप आधारित मॉड्यूल के तह चिप सेंसिंग तकनीक के जरिए 15 मिनट में कोरोना संक्रमण की जांच की जा सकती है। भविष्‍य में इसे प्रति घंटा 100 नमूनों तक बढ़ाया जा सकता है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा के अनुसार, कम लागत में तैयार होने वाले ये उपकरण कोविड-19 की सटीक जांच करने में सक्षम होंगे। पोर्टेबल रैपिड डाइग्‍नोस्टिक किट से मरीजों की नियमित निगरानी की जा सकेगी, जिससे भविष्‍य में उनमें संक्रमण के दोहराव को रोकने मदद मिल सकती है। यह तकनीक कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में भारत में संक्रमण के जांच के प्रयासों को और सशक्‍त बनाने में मददगार हो सकती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वित्त पोषित यह स्टार्टअप पहले भी रोगों की जांच के लिए कई नए उत्पाद विकसित कर चुका है।
इसी तरह, पुणे स्थित विज्ञान और प्रौद्योगिकी पार्क (साइटेक पार्क) की एक स्‍टार्टअप कंपनी ने ‘साइटैक एरोन’ नामक उत्पाद बनाया है, जो कोविड-19 से निपटने में सक्षम है। कंपनी का दावा है कि उसके द्वारा विकसित आयन उत्‍पन्‍न करने वाली मशीन प्रति सेकंड 10 आयन पर ऋणायन उत्पन्न करती है। यह क्‍वारंटाइन सुविधाओं और अस्पतालों को साफ करने में मददगार साबित होगा। सरकार तकनीकी और चिकित्‍सीय समाधान तो तलाश ही रही है, साथ ही लोगों के बीच विज्ञान आधारित सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) सामग्री तैयार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा रही है ताकि लोग अफवाह, भय और मनोवैज्ञानिक तनाव से दूर रहें। साथ ही, सरकार ने ‘आरोग्‍य सेतु’ और ‘कोरोना कवच’ नामक दो ऐप बाजार में उतारे हैं। ये ऐप उपभोक्‍ता का लोकेशन डाटा सरकार के पास मौजूद कोरोना के मरीजों के डाटा से मिलान करके बताता है कि वह किसी कोरोना संक्रमित व्‍यक्ति के संपर्क में तो नहीं आया?
जंग जीतने की जद्दोजहद
सरकार पूरी प्रतिबद्धता से कोरोना वायरस से निपट रही है और स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयास में जुटी हुई है। इसके लिए वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, निजी व सार्वजनिक अनुसंधान प्रयोगशालाओं, स्‍टार्टअप, उद्योगों व उद्वमियों को अधिक से अधिक सुविधाएं दे रही है ताकि वे बेहतर परिणाम दें। इसका परिणाम यह निकल रहा है कि स्‍थानीय स्‍तर पर कोविड-19 संक्रमण की जांच किट, टीका विकसित करने सहित कई शोध परियोजनाओं को गति मिली है। कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 56 करोड़ रुपये की लागत से ‘सेंटर फॉर ऑगमेंटिंग वार विद कोविड-19 हेल्‍थ क्राइसिस’ (सीएडब्‍ल्‍यूएसीएच) की स्‍थापना है। इसके तहत 50 नवाचारों और स्‍टार्टअप का मूल्‍यांकन करने के साथ उन्‍हें सहयोग प्रदान किया जाएगा। सीएडब्‍ल्‍यूएसीएच देशभर में प्रौद्योगिकियों की व्यावसायिक प्रक्रिया पर नजर रखेगा और समय-समय पर सहायता भी प्रदान करेगा। भारत सरकार का दृढ़ विश्वास है कि निश्चित रूप से इन शोधों-प्रयोगों के सकारात्‍मक परिणाम निकलेंगे और देश में फैली महामारी पर काबू पाया जा सकेगा। साथ ही, व्‍यावसायिक दृष्टि से भी ये पहल कारगर साबित होंगे। यही नहीं, सरकार ने सीएसआईआर, डीबीटी, डीएसटीऔर परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) सहित सभी राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं को कोविड-19 का परीक्षण करने की अनुमति दी है। इससे जांच प्रक्रिया तेज करने और वायरस के फैलाव का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर सरकार देश में मौजूद संसाधनों और संभावनाओं का बुद्धिमानी से उपयोग कर रही है। 21 दिन का लॉकडाउन और महज एक दिन में रेल डिब्‍बों को 6,000 बिस्‍तरों में तब्‍दील करना, उसी दिशा में उठाए गए कुछ बड़े कदम हैं। इसी तरह भारतीय रेल की कार्यशालाओं में पीपीई-पोशाक के उत्पादन के बारे में कोई सोच सकता था? इसके अलावा सरकार विदेशों से पीपीई किट आपूर्ति भी 8 अप्रैल से शुरू हो गई है। सरकार का लक्ष्‍य एक हफ्ते में 10 लाख पीपीई किट मंगाने का है। देश में मरीजों की संख्‍या को देखते हुए पर्याप्‍त मात्रा में किट उपलब्‍ध हैं।