महात्मा ज्योतिबा फूले की जयंती पर जानें उनके बारे में

    दिनांक 11-अप्रैल-2020
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​​डॉ. प्रवेश कुमार
पुणे ओर उसके आस-पास के क्षेत्र में ज्योतिबा ने 18 विद्यालयों की स्थापना की थी। फुले स्वयं बहुत ज़्यादा शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाए थे परन्तु समाज को शिक्षा का समुचित बोध हो, इसका उनको सदैव स्मरण रहा

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महात्मा ज्योतिबा फुले एक सामाजिक चिंतक के रूप में देश और दुनिया में जाने जाते हैं। देश में शिक्षा को लेकर जितना कार्य उन्होंने किया वह चिरस्मरणीय है। मुंबई लेखागार की अगर माने तो पुणे ओर उसके आस-पास के क्षेत्र में ज्योतिबा ने 18 विद्यालयों की स्थापना की थी। फुले स्वयं बहुत ज़्यादा शिक्षा नहीं ग्रहण कर पाए थे परन्तु समाज को शिक्षा का समुचित बोध हो, इसका उनको सदैव स्मरण रहा। ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 ई. में महाराष्ट्र में स्थित पुणे के एक माली परिवार में हुआ । इनके पिता का नाम गोविन्दराव तथा माता का नाम विमला बाई था। एक साल की उम्र में ही ज्योतिबा की माता का देहान्त हो गया, मां के देहांत के बाद पिता गोविन्दराव ने आगे चल कर सुगणा बाई नामक विधवा को अपने बच्चों की देख-भाल के लिए रख लिया, जिसे वे अपनी मुंह-बोली बहन मानते थे। ज्योतिबा की पढ़ने की उत्कट इच्छा देखकर उनके पिता ने उन्हें पाठशाला में भेजा, जहां उन्होंने अपनी मूल भाषा मराठी में पढ़ाई प्रारंभ की, परंतु समाज में व्याप्त सासाजिक भेद-भाव के कारण उनको जल्दी ही स्कूल छोड़ना पड़ा। सन् 1840 में तेरह साल की छोटी-सी उम्र में ही ज्योतिबा का विवाह नौ वर्षीय सावित्री बाई से हुआ । विवाह के उपरांत 1841 में ज्योतिबा का नाम ‘स्काटिश मिशन’ नाम के स्कूल में लिखा दिया गया । वहीं पर उनकी अंग्रेज़ी में पढ़ाई हुई।
अपनी पढ़ाई के दौरान वे अपने विद्यालय के एक सहपाठी के विवाह समारोह में शामिल होने गए। वहां उनके गाँव के भी कुछ लोग आए थे, फुले को खाने की पंगत में अपने बराबर बैठा देखाकर गांव के लोगों ने हंगामा कर दिया, कुछ लोगों ने फुले को उठा के बारात के बाहर निकल दिया। इन सभी घटनाओं को अपने साथ होता देख फुले ने अपने जीवन का अंत करने की सोच ली और आत्महत्या के लिए चल पड़े, परंतु जाते हुए उन्हें कुछ मातंग समाज के कुछ लोग मिले जो गले में हांडी, कमर पर झाड़ू और पैरों में घुंगरू बांध रहे थे। ये देख फुले ने सब जाना चाहा तो ज्ञात हुआ कि ये लोग अस्पृश्य जाति के लोग हैं। ये लोग जब भी बाहर निकलते हैं तो इनको ऐसा ही करना पड़ता है। ये सब देख-सुन फुले ने आत्महत्या का विचार त्यागदिया और आजीवन समाज के इस वर्ग के लिए काम करने का निर्णय लिया।
तत्कालीन समाज में महिलाओं, शूद्रों, अछूतों को शिक्षा देना उचित नहीं माना जाता था, इस कारण से फुले ने सर्वप्रथम अपनी पत्नी सवित्री बाई को पढ़ाया। सवित्री अपनी शादी के बाद बार-बार ज्योतिबा से ये ही पूछती थी कि- “हमारे फूल तो भैरव देवता को चढ़ाए जाते हैं लेकिन हम मंदिर के भीतर की मूर्ति क्यों नहीं छू सकते? हम से भी बुरी स्थिति उन लोगों की है जो मंदिर के चबूतरे तक भी नहीं आ सकते ऐसा क्यों?” ज्योतिबा फुले उन्हें उत्तर में कहते हैं कि ये सब लोगों के शिक्षित न होने के कारण है। शूद्रों , महिलाओं के बीच शिक्षा न होने के कारण ही कल्पना पर आधारित वर्ण-व्यवस्था को लोगों ने ईश्वरकृत मानकर उसका अक्षरश: अनुसरण किया हुआ है। इस सब ने समाज में ऊँच-नीच, छुआ-छूत के भाव को लोगों के मानस में पैदा किया। इनको दूर करने के लिए शिक्षा सबसे कारगर साधन है, इसलिए उन्होंने समाज को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया।
समाज के एक बहुत बडे वर्ग महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्होंने 1948 देश में पहला महिलाओं के लिए विद्यालय बुद्धवार पैठ में प्रारंभ किया । इस कार्य में उनका सहयोग उनके पत्नी सावित्री बाई एवं उनके मित्रों ने की, जिसमें सखाराव,यशवंत परंजपे, सदशिव गोबड़े, श्री भिड़े, सदशिव गोविंद हाटें थे, गौर करने वाली बात है सभी ब्राह्मण ही थे। यह भारत का पहला विद्यालय था जिसमें ज्योतिबा की पत्नी सावित्री पहली भारतीय महिला शिक्षिका बनी। प्रारम्भ में मात्र 9 छात्राओं से ये विद्यालय प्रारम्भ हुआ लेकिन देश के पटल में ये बड़ी ख़बर बनी। ये ख़बर इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि उस समय में महिला शिक्षा को रूढ़िवादी लोग धर्म के विरुद्ध मानते थे। फुले ने 1851 में बुधवार पैठ में ही एक और विद्यालय खोला, जिसमें उनका सहयोग बुधवार पैठ के ही एक सम्मानित नागरिक अन्ना साहब निपलूडकर ने किया जो जाति से ब्राह्मण थे।
अन्ना साहब ने अपना आवास इस पुनीत कार्य के लिए उपलब्ध कराया। ये पहला रात्रि प्रौढ़ विद्यालय था । इसी क्रम में 1 मई 1952 में पूना बेताल पेठ में अस्पृश्य बच्चों के लिए पहला विद्यालय भी खुला, फुले दम्पत्ति ने समाज के अछूत जनों को शिक्षित करने हेतु विद्यालय बनाया, इस विद्यालय की प्रशंसा दूर-दूर तक हुई। 29 मई 1852 में पूना ओबजर्वर समाचार पत्र ने इस ख़बर को छापा- “परोपकार की भावना से प्रेरित माली जाति के व्यक्ति ने अपने ख़र्च से अस्पृश्य वर्ग के लिए एक पाठशाला स्थापित की है। यह जानकार भारत के सुधारवादी लोगों को बहुत ख़ुशी होगी । यह पाठशाला बेताल पेठ में होने से वहाँ के माहार, मांग़ और पखारी जाति के बच्चों को पढ़ाया जा सकेगा।
ज्योतिबा फुले ने शूद्र, अतिशूद्र वर्ग को “बहुजन” नाम दिया । वही सत्यशोधक समाज की स्थापना कर सामाजिक कुरीतियोंके ख़िलाफ़ एक जन आंदोलन छेड़ने का काम किया। इस समाज का उद्देश्य था सभी माने कि ईश्वर एक है, वो सर्वव्यापी, निर्गुण, निर्विकार और सरल स्वरूप है, वह प्राणिमात्र में व्याप्त है, प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर भक्ति काअधिकार है, सर्वसाक्षी परमेश्वर की प्रार्थना और चिंतन केलिए किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है, मनुष्य जातिके गुण उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित करते हैं। परमेश्वरशारीरिक रंग- रूप में अवतार धरण नहीं करता।सत्यशोधक समाज ने ब्राह्मण वर्चस्व और उच्च जातियोंद्वारा समाज की निम्न जातियों के बौद्धिक शोषण तथा सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध प्रतीकात्मक रूप में एक जन आन्दोलन खड़ा किया। फुले ने बहुजन - दलित समाज के समकक्ष एक भिन्न धर्मिक पहचान हेतु सार्वजनिक सत्य धर्म का विचार दिया। ज्योतिबा फुले एवं उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले दोनों ने ही अपना पूरा जीवन इस समाज के लिए लगा दिया। समाज कैसे भी करके समता के मूल भारतीय चिंतन पर एक पंक्ति में खड़ा हो सके, इसका प्रयास दोनो दंपती आजीवन करते रहे । फुले ने भारत में पहली बार किसानों के लिए विद्यालय खोलने की बात की। इसी तर्ज़ पर 1875 में अहमदाबाद एवं पुणे का किसान जन आंदोलन खड़ा हो सका। 28 नवम्बर 1890 में उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया और अपने पीछे एक बड़ा वैचारिक आंदोलन छोड़ गए। डॉ. आंबेडकर ने फुले को बुद्ध, कबीर, के बादअपना एक गुरु के रूप में माना और ‘शूद्रों की खोज’पुस्तक उन्ही को समर्पित किया।
लेखक जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में सहायक प्रोफेसर हैं