कोरोना के इलाज से बीमार पड़ती कांग्रेस..

    दिनांक 12-अप्रैल-2020   
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दुनिया जब कोरोना तबाही मचाए हुए है। तब भी भारत में हालात नियंत्रण में हैं. ऐसे में कांग्रेस के युवराज बेरोजगार बैठे हैं .इसलिए एक बार मोदी के खिलाफ फिर झूठ और अफवाह के हथियारों से जंग छेड़ी गई है

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मोदी की नेतृत्व क्षमता का लोहा मान रही दुनिया.
भारत सफलता पूर्वक कोरोनावायरस से लड़ रहा है. देश में सब तरफ ये चर्चा है कि अभी तक हम शायद किनारे लग गए होते यदि तबलीगियों ने सारे देश में कोरोना का विषाणु न फैलाया होता. तबलीग जैसी जमातों को देश में पनपाने वाली कांग्रेस अपने ढंग से पत्ते चल रही है. जब देश और सारी दुनिया संकट में है, कांग्रेस इसे मोदी के लिए संकट बनाने की फिराक में है. इसके लिए कांग्रेस के स्लीपर सेल सक्रिय हो गए हैं. एक तो कांग्रेस सरकारों के फेंके टुकड़ों पर पलता आया वामपंथी धड़ा है, जो देश में नकारात्मक वातावरण बनाने में लगा है. दूसरा कांग्रेस आईटी सेल, जो सोशल मीडिया पर तबलीगियों को बचाने और अफवाहें फैलाने में भिड़ा हुआ है.
ट्विटर पर एक प्रायोजित ट्रेंड चलाया गया “पीएम का देश को धोखा.” कांग्रेस के आधिकारिक राष्ट्रीय ट्विटर हैंडल और दिल्ली कांग्रेस का हैंडल इसे निर्देशित - संचालित कर रहे थे. क्या था ये तथाकथित “धोखा.” दरअसल ब्राजील के प्रधानमंत्री बोल्सोनारो ने प्रधानमंत्री मोदी को हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन दवा भेजने के लिए धन्यवाद देते हुए उन्हें ‘संजीवनी बूटी लाने वाले हनुमान’ कहा. उधर ट्रम्प ने भी इसी दवा की खेप अमेरिका को भेजने के लिए मोदी को महान नेता बताया. भारत की जनता की तारीफ़ की. तो जलीभुनी बैठी कांग्रेस ने सोशल मीडिया में शोर मचाना शुरू कर दिया कि मोदी ने ये दवा बेचने की अनुमति देकर देश से गद्दारी की है.
हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन : पकड़ा गया कांग्रेस का झूठ 
राहुल गांधी ने हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन के निर्यात पर अपनी ‘विशेषज्ञ’ राय देते हुए कहा कि “जीवन रक्षक” दवा पहले भारत के नागरिकों को उपलब्ध करवाई जाए फिर दूसरे देशों को निर्यात की जाए. राहुल की शह पर कांग्रेस ने हवा बाँधने की कोशिश की कि जब देश में कोरोना फ़ैल रहा है तब इस “कोरोना की दवा” के निर्यात की अनुमति देना देशद्रोह है, और मोदी ट्रम्प से दोस्ती निभाने के लिए देश के लोगों को मानो मरवाने के लिए तैयार हैं. पर कांग्रेस के इस दावे में छेद ही छेद हैं. हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन मलेरिया की दवाई है, जिसका भारत दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. दुनिया में इसका 70 प्रतिशत निर्यात भारत करता है. अब कुछ सवाल और फिर उनके जवाब. क्या हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन कोरोना की दवा है जिसे सभी कोरोना संक्रमितों को दिया जा रहा है? क्या मोदी ने भारतवासियों की परवाह किए बिना यह दवा विदेशों को भेज दी है? इस निर्यात से भारत को क्या लाभ है?
हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन को दुनिया में कहीं भी कोरोना के इलाज के रूप में नहीं देखा जा रहा है. भारत में ही आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान) ने इसके सीमित उपयोग का निर्देश दिया है, कुछ ख़ास कोरोना मरीजों के लिए, वो भी सिर्फ प्रायोगिक स्तर पर. सारी दुनिया में इसका सेवन करने के लिए सिर्फ उन चिकित्सकों और स्वास्थ्य रक्षकों को कहा गया है जो सीधे कोरोना ग्रस्त मरीजों के संपर्क में आ रहे हैं. ताकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढे और वो बीमार न हों. डॉक्टर भी इसका सेवन सोचसमझकर करते हैं क्योंकि इसकी ज्यादा खुराक प्राणघातक भी हो सकती है.

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दवा पर भ्रम फैलाने की जुगत में कांग्रेस  
दूसरा, भारत में हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन की जितनी आवश्यकता है या आगे जितनी ज़रुरत पड़ सकती है उससे कहीं ज्यादा भंडार देश के पास है. भारत हर माह इसकी 20 करोड़ गोलियां (टैबलेट) बनाता है. (आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता को 5 से 7 गुना बढाया जा सकता है) देश में कोरोनासंक्रमितों की संख्या 7 हजार के लगभग है. इनमे से शायद दो-तीन सौ को हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन दवा के रूप में दी जाएगी. ऐसे में एक मरीज को कितनी हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन गोलियों की आवश्यकता पड़ेगी ये कांग्रेस पार्टी राहुल गाँधी से पूछकर तय कर सकती है. जहाँ तक मलेरिया के मरीजों या अन्य बीमारों के लिए इसकी उपलब्धता का प्रश्न है, नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने बतलाया है कि देश में इसका पर्याप्त भंडारण है, और माँग व आपूर्ति का प्रतिदिन विश्लेषण व निरीक्षण किया जा रहा है. संस्था की चेयरमैन शुभ्रा सिंह ने कहा कि देश की ज़रूरतें पूरी करने के बाद ही निर्यात किया जा रहा है.
एक और महत्वपूर्ण बात है कि भारत दुनिया के देशों जैसे अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि को हजारों करोड़ की दवा बेच रहा है. भारत के दवा उद्योग को इससे लाभ मिलेगा. प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में उन 14 दवाओं के निर्यात पर से प्रतिबंध उठा लिया गया है जिन पर पहले रोक लगा दी गई थी. भारत अफ्रीका के 80 लाख मरीजों के लिए एड्स की दवा निर्यात करता है. ब्रिटेन को पैरासिटामॉल और पड़ोसी देशों को हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन भेजता आया है. दवा निर्यात प्रतिबंध उठाने से भारत का दुनिया में मान भी बढ़ा है. ट्रम्प ने ट्वीट किया कि अमेरिका भारत की इस मदद को “नहीं भूलेगा.” वाइटहाउस के ट्विटर हैंडल ने मोदी को फॉलो करना शुरू कर दिया है.
सोनिया की चिट्ठी का कच्चा चिट्ठा

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मीडिया के संकट पर सोनिया गांधी की सियासत
जब जमातियों की फैलाई गंद का चिट्ठा देश के सामने खुल रहा था उस समय सोनिया गाँधी सामने आईं और जमातियों को एक शब्द कहे बिना सरकार पर ठीक से काम न करने का आरोप उछाल दिया. फिर उन्होंने प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र लिखा, जिसमें 5 सुझाव दिए गए थे. ये पत्र देश के भले के स्थान पर कांग्रेस के भले और प्रधानमंत्री मोदी के लिए नए गड्ढे खोदने की साफ़ कोशिश थी. पहला सुझाव था कि मीडिया को केंद्र सरकार के विज्ञापन रोक दिए जाएं. पहली नज़र में एक आम व्यक्ति को ये सुझाव अहानिकर लग सकता है, लेकिन इसमें पेच है मोदी सरकार को घेरने का. भारत का मीडिया विज्ञापनों पर, विशेष रूप से सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर करता है. विकसित देशों की तुलना में हमारे यहां अखबारों की कीमत बहुत कम है. न्यूज़ वेबसाइट भी निशुल्क सेवा देती हैं. विकसित देशों में ऐसा नहीं है. अखबार महंगे हैं.समाचार वेबसाइट की सशुल्क सदस्यता लेनी होती है. आज जब समाचार जगत अब तक की सबसे बड़ी विपत्ति का सामना कर रहा है तब ऐसा करना मीडिया को भारी नुकसान पहुंचाएगा. हजारों पत्रकारों की नौकरियां चली जाएंगी. नए पत्रकारों को मौक़ा नहीं मिलेगा.
सोनिया गांधी का गणित ये है कि यदि सरकार ऐसा करती है तो सारा मीडिया जगत मोदी के खिलाफ हो जाएगा, और नहीं करती तो वो और राहुल गांधी इसे सरकार की फिजूलखर्ची बतलाकर मुद्दा बनाएंगे. ख़ास बात ये कि सोनिया गांधी ने ये सुझाव राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकारों को नहीं दिया. देने की हिम्मत करेंगी सोनिया जी ?
सोनिया का दूसरा सुझाव है कि पीएम केअर्स फंड की सारी राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में डाली जाए. इसके पीछे कांग्रेस और सोनिया गाँधी का अपना एजेंडा है. जब जवाहरलाल नेहरु ने ये प्रधानमंत्री राहत कोष बनाया तब ये नियम भी जोड़ दिया कि इसकी छः सदस्यीय समिति में से एक अनिवार्य सदस्य कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष होगा. उसका स्थान दूसरे क्रम का, अर्थात प्रधानमंत्री के बाद होगा. इसका मतलब ये कि वहाँ बैठकर सोनिया अपनी राजनीति कर सकेंगी. इसके विपरीत मोदी द्वारा बनाए गए पीएम केअर्स फंड में कोई सदस्य राजनैतिक पार्टी के आधार पर इसका हिस्सा नहीं है. प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री, वित्तमंत्री और रक्षामंत्री इसके सदस्य हैं.
तीसरा सुझाव केंद्र सरकार की योजनाओं में 30 प्रतिशत की कटौती का है. सोनिया फरमाती हैं कि इसका उपयोग मजदूरों , प्रवासी श्रमिकों , किसानों के कल्याण लिए किया जाए. लेकिन होगा उलटा. केंद्र सरकार आधारभूत ढांचे के निर्माण में सड़क, बंदरगाह, पुल आदि पर बहुत बड़ा काम कर रही है. यदि इसमें 30 प्रतिशत की कटौती की गई तो इससे बड़ी संख्या में नौकरियां जाएँगी, और सबसे ज्यादा मार श्रमिक वर्ग पर ही पड़ेगी. एक अन्य सुझाव संसद के सौन्दर्यीकरण की योजना को निरस्त करने का है, जिसे मानने में कोई बुराई नहीं है.
कांग्रेस अध्यक्षा का पांचवा सुझाव है कि , प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत सभी केन्द्रीय मंत्रियों, नौकरशाहों और मुख्यमंत्रियों की विदेश यात्राओं पर प्रतिबंध लगाया जाए. इस सुझाव का कोई औचित्य सिद्ध नहीं होता क्योंकि इस समय वैसे ही सारी दुनिया में सारी यात्राएं स्थगित हैं. जी-20 वार्ता और मोदी द्वारा बुलाई गई दक्षेस वार्ता भी वीडियो कांफ्रेंस द्वारा संपन्न हुई. सोनिया के इस सुझाव में एक सियासी पेंच भी है. विदेश यात्राओं का अधिकाँश संबंध केंद्र सरकार और उससे संबंधित विभागों को ही पड़ता है. जैसा सारी दुनिया करेगी वैसा भारत सरकार को भी करना होगा. जब सारी दुनिया में यात्राएं प्रारंभ होंगी तब फैसला हो जाएगा. सोनिया के इस सुझाव से राहुल गाँधी द्वारा उछाला गया लेकिन पिटा हुआ जुमला याद आता है जब प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के प्रथम कार्यकाल में वो मोदी की विदेश यात्राओं को सैर-सपाटा बताया करते थे. जब विदेश में मोदी और भारत का कद बढ़ता ही चला गया तब राहुल और उनके दरबारियों के मुंह अपने आप बंद हो गए.
छटपटाहट, तिलमिलाहट....
देश मोदी के आह्वान पर घरों में बंद हो गया. दुनिया जब कोरोना से काँप रही है तब भारत में हालात नियंत्रण में हैं. ताली-थाली घंटे बज रहे हैं, दीपक जल रहे हैं. जमाती जमानत पर हैं, और कांग्रेस के युवराज बेरोजगार. सत्ता भविष्य में भी दूर –दूर तक नज़र नहीं आ रही है. सत्ता की खुरचन पर 70 साल तक पले वामपंथी अपने वैचारिक उच्चाटन की आहट से बेचैन हैं. इसलिए तिलमिलाहट है. प्रासंगिक बने रहने की छटपटाहट इन्हें बेचैन कर रही है.