अब दवा को लेकर अफवाह फैला रही कांग्रेेस

    दिनांक 12-अप्रैल-2020
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भारत ने अमेरिका, इज़राइल समेत कई देशों को हाइड्रोक्लोरोक्वीन (HCQ) का निर्यात शुरू कर दिया है। पिछले तीन दिन में इस दवा की खेप 13 अलग-अलग देशों में रवाना की गई है। कुछ लोग यह चिंता जता रहे हैं कि अगर आगे चलकर भारत में कोरोना वायरस की स्थिति गंभीर हो जाती है तो कहीं ऐसा न हो कि हमारे पास ही यह दवा न बचे। यह चिंता दरअसल जानबूझकर पैदा की गई है। मीडिया के एक वर्ग और कांग्रेस के नेताओं ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से यह अफवाह फैलाई कि देश के लोगों के लिए दवा नहीं है और मोदी सरकार इसे विदेशों को बेच रही है। कांग्रेस के प्रवक्ताओं ही नहीं, शशि थरूर जैसे नेता भी यह झूठ फैलाने में भरपूर मदद की। बीबीसी हिंदी ने तो एक रिपोर्ट पोस्ट की, जिसको पढ़कर लगता था कि अमेरिका को दवा बेचकर भारत बहुत बड़ी भूल कर रहा है। इसके अगले ही दिन ब्रिटेन ने भी दवा के लिए हाथ पसार दिया और बीबीसी ने चुपके से अपनी वो फर्जी रिपोर्ट हटा ली।
दवा उद्योग इस आशंका को गलत बताता है। उनके मुताबिक महामारी फैलने की खबर आने के तत्काल बाद ही भारत सरकार ने इस दवा के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है। लिहाजा भारी मात्रा में इसका स्टॉक मौजूद है। साथ ही दवा कंपनियां इसका उत्पादन लगातार जारी रखे हुए हैं। दवा कंपनियों ने सरकार को भरोसा दिलाया है कि वो हर समय अपने पास कम से कम 10 करोड़ टेबलेट्स का सुरक्षित स्टॉक रखेंगी। भारतीय दवा निर्माता संघ (IDMA) के अनुसार भारतीय कंपनियां एक महीने में 20 करोड़ HCQ गोलियां बनाने की क्षमता रखती हैं। इसमें इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल (रॉ मैटीरियल) भी भारत में पूरी तरह से उपलब्ध है। यह अफवाह भी उड़ाई गई थी कि कच्चा माल चीन से आता है। यह स्थिति तब है जब चाइनीज वायरस को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय की नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगातार दवा के स्टॉक और उपयोगिता के बारे में बताया जा रहा है।
भारत में IPCA लैब्स, एलेंबिक, टोरेंट, वालेस फार्मा और ज़ाइडस कैडिला हाइड्रोक्लोरोक्वीन बनाने वाली कुछ सबसे बड़ी कंपनियां हैं। बारिश में जब मलेरिया का सीजन आता है तब यह दवा अधिक बिकती है। अभी की स्थिति में भारत की जरूरत के लिए 10 करोड़ गोलियां होना पर्याप्त माना जाता है। कोरोना वायरस के एक मरीज के इलाज में 5 से 6 दिन लगते हैं। अगर एक दिन में 2 गोली खाई जाएं तो 10 लाख मरीजों पर 2.1 करोड़ गोली की जरूरत होगी। अब तक के प्रचार से लोगों को लग रहा है कि ये कोरोना वायरस की कोई रामबाण दवा है, लेकिन ऐसा नहीं है। डॉक्टर लगातार कह रहे हैं कि HCQ चाइनीज वायरस की प्रतिरोधक दवा के तौर पर सिर्फ मेडिकल स्टाफ को दी जानी चाहिए। आम मरीजों को इसे देने के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। असल में दुनिया भर में एचसीक्यू पर दो बड़े अध्ययन चल रहे हैं। उनके परिणाम सामने आने के बाद ही दवा की उपयोगिता का सही आंकलन हो सकेगा।
सवाल उठ रहा है कि जब यह दवा है ही नहीं तो अमेरिका इतना परेशान क्यों है। दरअसल इसका कारण है इटली का अनुभव। इटली में पिछले एक महीने के दौरान इलाज कर रहे डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे मेडिकल स्टाफ़ की बड़ी संख्या में मौत हुई है। हालत ये है कि इटली में डॉक्टरों और नर्सों की कमी पैदा हो गई है। अब जब ये वायरस अमेरिका को चपेट में ले चुका है अमेरिका नहीं चाहता कि यह स्थिति उसके यहां पैदा हो। ऐसे में भारत अगर उसकी सहायता करता है तो यह तर्कसंगत और नीतिसंगत है।