जमातियों के गठजोड़ से खतरे में दिल्ली, कहां हैं केजरीवाल

    दिनांक 13-अप्रैल-2020   
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दिल्ली में अब इस बारे में बात की जा सकती है कि राजधानी के लिए लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक कौन है. तब्लीगी जमात या फिर उसके समर्थक. या फिर मुख्यमंत्री केजरीवाल की विफलता

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देश की राजधानी कोरोना वायरस के विस्फोट को झेल रही है, तो इन दो कारकों की भूमिका और इनके आपसी संबंध पर चर्चा स्वाभाविक है. दिल्ली आज उस फसल को काट रही है, जो अपनी सस्ती और पैंतरेबाज राजनीति के लिए आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने बोई थी. संकट में नेतृत्व की पहचान होती है और दिल्ली में ये नजर आ रहा है. जब आम आदमी अपनी जान की खैरियत मनाते हुए घर में कैद है, दिल्ली की सड़कों पर सेनेटाइजेशन करने वाली मशीनों के आगे अरविंद केजरीवाल के बैनर लहरा रहे हैं. केजरीवाल सरकार ने लाखों प्रवासी मजदूरों को आधी रात में उनके घर के लिए खदेड़कर देशभर में महामारी फैलाने का जो इंतजाम किया था, उसे असल में तब्लीगी जमात ने पूरा किया है. केजरीवाल को अब समझ आ रहा होगा कि अराजकता की राजनीति असल में दोधारी तलवार है, जिसमें एक सिरे पर अब खुद उनकी गर्दन है.
दिल्ली में इस समय 41 इलाके हॉटस्पॉट हैं. मतलब वे इलाके जहां कोरोना महामारी की शक्ल लेने को तैयार बैठा है. बमुश्किल दिल्ली पुलिस इन इलाकों को सील किए हुए हैं. ये वही इलाके हैं, जहां निजामुद्दीन मरकज से निकलकर तब्लीगी जमात के कारकुन मस्जिदों में जा छिपे. न बस छिपे, इन्हें छिपाया गया. बचाया गया. क्या ये संयोग है कि 41 हॉटस्पॉट वाले इलाकों में से 90 प्रतिशत वे इलाके हैं, जहां मुस्लिम आबादी बहुत सघन है.
इन इलाकों में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद से ही कानून को लेकर बेहद बेफिक्री है. नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्ली में हुई हिंसा में भी इन इलाकों में कानून को लेकर यही बेफिक्री थी. असल में इन तमाम इलाकों में राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा ताकतवर आम आदमी पार्टी है. और उसके नेता किस तरह के हैं, इसके लिए अंकित शर्मा की हत्या से कुख्यात हुए केजरीवाल के खास लेफ्टिनेंट ताहिर हुसैन का नाम काफी है. बात को समझने के लिए तुलना जरूरी है. ऐसा नहीं है कि जमाती बस दिल्ली में छिपे. ये पूरे देश में फैले. केरल से कश्मीर तक. लेकिन हर राज्य सरकार ने खंगाला, ढूंढा और सख्त कार्रवाई की. लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रश्रय की चादर ओढ़े ये आराम से मस्जिदों में छिपे रहे.

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फिलहाल दिल्ली की क्या स्थिति है. सोमवार को 85 नए मरीजों के साथ दिल्ली में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या 1154 हो गई. इनमें से 746 जमात के हैं. निजामुद्दीन मरकज को लेकर केजरीवाल के पाप खुलते जा रहे हैं. दिल्ली में ये जमावड़ा दिल्ली सरकार के अधिकारियों की जानकारी में जमा था. उससे भी बढ़कर, अंडमान निकोबार में सबसे पहले दस जमाती कोरोना संक्रमित पाए गए. इसकी सूचना अंडमान निकोबार प्रशासन ने दिल्ली सरकार को दी. लेकिन दिल्ली सरकार इस अलर्ट को हजम कर गई. केजरीवाल को हर अधिकार चाहिए, लेकिन उनके इस्तेमाल का हौसला वह वोटबैंक देखकर करते हैं. मरकज के जमावडे में भी वह इंतजार करते रहे कि दिल्ली पुलिस कार्रवाई करे और वह विलेन बनने से बचे रहें. नतीजा ये कि दिल्ली में पिछले 24 घंटे में कोरोना वायरस से 5 लोगों की मौत हुई है. इसी के साथ इस महामारी से मौत का आंकड़ा 24 जा पहुंचा है. पुरानी दिल्ली की 13 मस्जिदों में रहने वाले 102 जमातियों में से 52 पॉजिटिव मिले हैं. बीते पांच दिनों में सघन तलाशी अभियान चलाने के बाद सरकारी एजेंसियों ने 13 मस्जिदों में रहने वाले इन 102 जमातियों का पता लगाया. प्रारंभिक जांच में 52 लोग पॉजिटिव पाए गए. इतनी बड़ी संख्या में संक्रमित मिलने के बाद अधिकारियों ने चांदनी महल इलाके को सैनिटाइज कराया और पूरे इलाके को सील कर दिया है. चांदनी महल में इससे पहले तीन लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है. इसके अलावा मुंडका में भी तीस कोरोना वायरस के ऐसे ही मरीज जमाती सामने आए हैं.
जमाती हर सूबे में समस्या हैं, लेकिन दिल्ली में ये समस्या केजरीवाल सरकार की पसंद और आंख मूंद लेने के रवैये के कारण गंभीर है. उदाहरण के तौर पर हरियाणा को लेते हैं. जैसे दिल्ली में जमाती छिपे बैठे हैं, वैसे ही हरियाणा में भी छिपे थे. लेकिन यहां सरकार ने 16 जमातियों के अलावा 19 सरकारी पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश, लोगों की जान को खतरे में डालने, महामारी अधिनियम की विभिन्न धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई है. जमातियों के अलावा ये जिन इलाकों में छिपे थे, वहां की पंचायत समितियों के पदाधिकारियों और सरपंचों के खिलाफ भी जानकारी छिपाने के मामले में रिपोर्ट दर्ज हुई है. लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं होगा. दिल्ली में बैठी सरकार हर राष्ट्रीय मुद्दे पर देश के खिलाफ नजर आती है. जब पूरा देश लॉक डाउन में था, तो दिल्ली में आधी रात को प्रवासी लोगों के लिए ऐलान किया जा रहा था कि यूपी बार्डर पर उन्हें ले जाने के लिए हजारों बसें खड़ी हैं. दिल्ली परिवहन निगम की साढ़े तीन हजार बसों को इस काम पर लगाया गया कि दिल्ली में जिन लोगों से मुफ्त बिजली पानी के नाम पर वोट बटोरे हैं, उन्हें यूपी की सीमा पर पटक दिया जाए. भला हो उत्तर प्रदेश सरकार की प्रोएक्टिव पॉलिसी का. देश के कोने-कोने में बीमारी प्रसार की ये साजिश नाकाम हो गई. रातों-रात हजारों बसों का इंतजाम करके दिल्ली की केजरीवाल सरकार की इस साजिश को नाकाम किया गया.
जिस समय देश के हर सूबे के मुख्यमंत्री, चाहे वह किसी भी पार्टी का हो, जी जान से कोरोना को नियंत्रित करने में लगे थे, दिल्ली के मुख्यमंत्री देश के हर चैनल पर नमूदार होकर कोरोना न फैलने के नुस्खे दोहरा रहे थे. जिस समय दिल्ली के लॉक डाउन में गरीब और बेसहारा लोगों को खाना-पानी की जरूरत थी, उस समय आत्ममुग्ध सरकार अपने डिजिटल प्रचार में जुटी थी. इसके बाद दिल्ली में सरकार द्वारा बांटे गए खाने और राशन में भी भारी घोटाला हुआ है. कोरोना से उबरने के बाद आप देखेंगे कि दिल्ली का एक-एक नागरिक चार लाख लोगों तक खाना पहुंचाने की हकीकत का राजफाश करेगा. एक विफल नेता अपना ढिंढोरा जरूर पीटता है. अब दिल्ली में सेनेटाइजेशन के नाम पर यही हो रहा है. कथित रूप से विदेशी मशीनें सेनेटाइजेशन के लिए मंगाई गई हैं. लेकिन ये मशीने जब छिड़काव पर निकल रही हैं, तो इनके आगे केजरीवाल के बैनर लहरा रहे हैं. आजाद भारत के सबसे बड़े आपदा काल में केजरीवाल नीरो साबित हुए हैं. ज्यादा चिंता की बात ये है कि उनके नेतृत्व में ऐसी सरकार अब भी दिल्ली में जमी हुई है, जिसका विश्वास और विचार अराजकता में है.