सेकुलर मीडिया अफवाह और कांग्रेस

    दिनांक 13-अप्रैल-2020
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मीडिया के ज़रिए एक अफ़वाह उड़ाई जा रही है कि शेयर बाज़ार में गिरावट का फ़ायदा उठाकर चीन भारतीय कंपनियों के शेयर ख़रीद रहा है। भाषा ऐसी कि आपको लगेगा कि चीन भारतीय कंपनियों को ख़रीदकर कोई बहुत बड़ा आर्थिक हमला कर रहा है। इस बात के समर्थन में अख़बारों और चैनलों के पास जिस ‘महान अर्थशास्त्री’ का बयान है वो हैं राहुल गांधी

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दरअसल रविवार शाम को बड़े ही प्रायोजित ढंग से एक समाचार सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा मीडिया तक में फैलाया गया, जिसमें बताया गया कि चीन के केंद्रीय बैंक ने एचडीएफ़सी लिमिटेड के 1.75 करोड़ शेयर ख़रीद लिए हैं। यह सुनते ही एक तरह की घबराहट पैदा हो जाती है। थोड़ी ही देर में राहुल गांधी का ट्वीट आ जाता है जिसमें वो सरकार को सजग करते हैं कि चीन की कंपनियां मौक़े का फ़ायदा उठा रही हैं। वो यह जताने की कोशिश करते हैं कि इतनी बड़ी घटना हो गई और सरकार सोई हुई है। लेकिन कॉरपोरेट मामलों और शेयर बाज़ार के जानकारों से पूछें तो बिल्कुल अलग ही सच्चाई सामने आती है।
क्या है चीन के ‘आर्थिक हमले’ का सच?
यह बात बिल्कुल सही है कि चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (पीबीओसी) ने आवासीय वित्त ऋणदाता कंपनी एचडीएफ़सी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 1.75 करोड़ शेयर की कर ली है। लेकिन यह सौदा अभी का नहीं है। यह खरीदारी पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच हुई। शेयर बाज़ार को दी गई सूचना के अनुसार अब चीन के बैंक के पास एचडीएफ़सी के कुल 1,74,92,909 करोड़ शेयर हैं। लेकिन इस बात का मतलब समझने के लिए दो तथ्यों को जानना ज़रूरी है। पहला तो यह कि एचडीएफ़सी के कुल शेयरों की संख्या 1 अरब 73 करोड़ 20 लाख से कुछ अधिक है, इनमें से चीन की हिस्सेदारी मात्र 1 करोड़ 75 लाख शेयरों की है। जो कि कंपनी के कुल आकार का 1.01 फ़ीसदी है। इतनी हिस्सेदारी से उसे एचडीएफ़सी में कोई ऐसा अधिकार नहीं मिल जाएगा जिसे कंपनी पर क़ब्ज़ा कहा जा सके। इस मामले से जुड़ा दूसरा तथ्य यह है कि चीन के केंद्रीय बैंक की एचडीएफ़सी में अचानक रुचि पैदा नहीं हो गई। एक साल पहले भी इसी समय चीन के बैंक के पास एचडीएफ़सी के 0.8 प्रतिशत शेयर थे। इस साल पहली तिमाही में उसने अपनी उसी हिस्सेदारी को 0.21 प्रतिशत बढ़ाकर 1.01 प्रतिशत कर लिया है। दुनिया भर के संस्थागत निवेशक अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ऐसे ही ख़रीदारी करते हैं और मुनाफ़ा कमाते हैं। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। चीन का केंद्रीय बैंक ही नहीं, भारतीय कंपनी एलआईसी भी इसी अवधि में एचडीएफ़सी में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा रही है। यह ख़रीदारी कंपनी पर क़ब्ज़े के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध कारोबारी है। एचडीएफ़सी लिमिटेड ने इस बारे में बयान जारी करके सफ़ाई भी दी है।
मीडिया का अज्ञान या जानबूझकर खेल ?
कुछ तथाकथित पत्रकारों और मीडिया समूहों ने ऐसे ख़बर फैलाई मानो कोई हड़कंप मच गया हो। कुछ ने तो ऐसे ख़बर दिया मानो चीन ने 'एचडीएफ़सी बैंक' को हड़प लिया। जबकि यह मामला एचडीएफ़सी बैंक का नहीं है। वो अलग है और एचडीएफ़सी लिमिटेड एक अलग कंपनी है। कई मीडिया संस्थानों ने इस मामले में थोड़ा और बारीक खेल खेला। उन्होंने जानबूझकर सिर्फ़ 1.75 करोड़ शेयरों की ख़रीद की बात फैलाई और यह छिपा लिया कि ये कुल शेयरों का कितना प्रतिशत है। ताकि अफ़वाह फैलाई जा सकें। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस मामले में सबसे ज़्यादा सक्रिय वही लोग हैं, जो ख़ुद चीन के हमदर्द माने जाते हैं। चीन के तथाकथित आर्थिक हमले की चिंता जताने वाले राहुल गांधी वही हैं जो डोकलाम विवाद के समय चोरी-छिपे चीन के दूतावास में गए थे। जब पोल खुल गई थी तो उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि वो विवाद क्या है यह समझने के लिए वहां गए थे।
चाइनीज़ वायरस को लेकर जिस तरह से दुनिया भर के देश परेशान हैं चीन की एजेंसियाँ लगातार ऐसी कोशिशों में हैं कि वो लोगों के बीच भ्रम पैदा कर सकें। भारत में उनके पास इस काम के लिए अच्छा-खासा नेटवर्क है। 'चीन के आर्थिक हमले' की यह अफ़वाह भी ऐसा लगता है कि चीन के उसी खेल का हिस्सा है जो वो पिछले काफ़ी समय से खेल रहा है।