बाबासाहेब और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

    दिनांक 14-अप्रैल-2020
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डॉ. प्रवेश कुमार

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बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 में मध्यप्रदेश के महु में सेना की छावनी में सूबेदार राम जी मालो जी सकपाल एवं भीम बाई के यहां हुआ। आज दुनिया बाबासाहेब के जन्मदिवस को बड़े हर्ष और उल्लास से मान रही है ऐसे समय में मेरा लेख संघ और आंबेडकर के रिश्तों को लेकर बात कर रहा है। आधुनिक समय में जहां एक ओर बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को ज्ञान का प्रतीक (Symbol of knowledge) माना जाता है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दुनिया इसके सेवा-कार्य, प्रबल राष्ट्रभक्ति और समर्पण के लिए जानती है। संघ और बाबासाहेब आंबेडकर को लेकर इसलिए भी बात करना आवश्यक है क्योंकि कुछ लोग संघ पर जातिवादी होने का आरोप लगाकर बुनियादी तौर पर वैचारिक मतभेद पैदा करने का प्रयास करना चाहते हैं। डॉ. आंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के मध्य विचारों की अतिशय समानता है। भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाना ही दोनों का प्रधान उद्देश्य था। डॉ. आंबेडकर एवं डॉ. हेड्गेवार के बीच तुलना करते हुए श्री संघ के पांचवे सरसंघचालक सुदर्शन जी ने कि- “डॉ आंबेडकर हिंदू समाज की मानसिकता में जो क्रांति चाहते थे, वही डॉ. हेडगेवार की इच्छा थी, डॉ. हेडगेवार ऊंच-नीच, छुआ-छूत आदि की भावनाओं से मुक्त जिस एकरस और संगठित सामाजिक जीवन की रचना चाहते थे, वही डॉ. आंबेडकर भी चाहते थे।
डॉ. आंबेडकर ने आजीवन भारत की अखंडता और एकता तथा सामाजिक समरसता के लिए कार्य किया। वे कहते हैं कि- “किसी भी राष्ट्र के लिए आवश्यक तत्त्व ही ‘बंधुत्त्व-भाव का होना है’ ये बंधुत्व-भाव की संकल्पना सामाजिक समरसता से ही पूरित हो सकती है। बाबा साहेब आंबेडकर और संघ ने भी इसी बंधुत्व-भाव के लिए कार्य किया। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने भी कहा कि- “हिन्दू समाज के भीतर व्याप्त सामाजिक दोष, खंडित एवं सामंती मानसिकता सामाजिक एवं राष्ट्रीय अवनति का मूल कारण हैं।” इसी विचार को तो आंबेडकर भी मानते हैं तभी तो वे जाति को राष्ट्र के विरूद्ध मानते हैं। डॉ. हेड्गेवार कहते हैं “ हिन्दुओं में सामाजिकता के भाव का अभाव होने के कारण एक रक्त, एक मांस के बने शरीर को एक - दूसरे से भिन्न कर दिया । इसीलिए संघ की शाखा पर आने वाले सभी स्वयंसेवक केवल हिन्दू हैं न कि किसी जाति अथवा वर्ण के, सभी की एक सामूहिक पहचान हैं ।” डॉ. हेडगेवार मानते हैं कि हिन्दू भारत की राष्ट्रीय अस्मिता हैं, इसी प्रकार बाबासाहेब भारतीयता को अपनी राष्ट्रीय पहचान मानते हैं , उनकी मांग वास्तव में भारतीय समाज के पुरातन मौलिक तत्त्वों को पुन: प्राण प्रतिष्ठा करना ही तो था और ये तत्व ही हिंदू तत्व है। ये तत्व ही हैं जिसने आंबेडकर को बाबासाहेब बना दिया।
समाज में आंबेडकर के साथ कितना उत्पीड़न हुआ, अपने बाल्यकाल से लेकर संपूर्ण जीवन उन्हें जातीय भेदभाव को सहन करना पड़ा लेकिन जब आंबेडकर संविधान लिखते हैं तो क्या उनके मन में किंचित भी किसी समाज वर्ग के प्रति दुराग्रह का भाव आता है? तो ऐसा नहीं, ये भाव ही तो हिंदुत्व भाव है, जो सबके कल्याण की कामना करता है। डॉ. आंबेडकर और संघ दोनों का प्रारम्भिक कार्य क्षेत्र महाराष्ट्र ही था लेकिन आंबेडकर ने क्या कभी संघ के बारे में कुछ लिखा? तो ऐसा नहीं, बल्कि संघ के विचार का समर्थन करते हुए वो ज़रूर दिख जाते हैं। कभी ये आंबेडकर आरोप लगाते हैं कि आंबेडकर ने नागपुर को इसीलिए चुना क्योंकि नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय है। इसको स्वयं आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि- “नागपुर की भूमि में तमाम बौद्ध मत के अवशेष मिल जाते हैं, इससे स्पष्ट है कि ये कभी बौद्ध मत का बड़ा केंद्र रहा होगा। इसलिए यहां से मैं भारत के लोगों को समता, बंधुत्व का अहम संदेश दे रहा हूं।” वही इसी नागपुर में 1925 में स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने समाज में समता और बंधुत्वभाव के आधार पर देश के जन मानस को संगठित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की । संघ का विचार भारत को “एकात्म भाव” के मौलिक भारतीय चिन्तन के आधार पर भारयीय जनमानस को संगठित करना है । यही उद्देश्य तो डॉ. आंबेडकर का भी था। अतः वे इससे भिन्न मत तो नहीं रखते थे। पद्धति भिन्न हो सकती है परन्तु हेतु तो एक था । इसीलिए संघ की शाखा पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। इसी कारण 1938 में डॉ. आंबेडकर पुणे में संघ के शिविर में आए और महार स्वयंसेवक के साथ सम्मान और समानता का भाव देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि- “मैंने इस तरह से अस्पृश्यता समाप्त करने का कार्य पहले कभी नहीं देखा”। संघ ने सदैव समरस समाज की बात की और समरसता के विचार को माना। संघ मानता है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तीनों को व्यक्ति अपने आचरण में आत्मसात करे यही समरसता हैं। सामाजिक समरसता, बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों का असल अर्थों में अनुपालन करना हैं। आंबेडकर जी ने तीन मानव मूल्यों की बात की- स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व ये तीनों तत्व व्यक्ति के विकास के लिए अनिवार्य हैं, परंतु आंबेडकर बंधुता भाव को समाज में सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब व्यक्ति का व्यक्ति के साथ प्रेम हो, उसके दुख में वो दुखी हो और सुख में खुद भी परम आनंद को महसूस करे, यही बंधुत्व भाव है। इसे समाज में किसी कानून से नहीं लाया जा सकता, अपितु ये व्यक्ति के स्वयं के विचार एवं व्यवहार से ही आ सकता है। इसी मूल विचार के साथ काम करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज एक शतक पूरा करने जा रहा है। संघ अपने शुरुआती दौर से ही समाज के किसी भी असमानता का विरोध करता है।
( लेखक जेएनयू में सहायक आचार्य हैं )