विलायती बबूल जैसी है वामपंथी सोच

    दिनांक 15-अप्रैल-2020
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 अनिल झा
क्रां​ति के विलायती बबूल वामपंथियों की निर्लज्जता भी आला दर्जे की है ये सिर्फ हिंदुस्थान को कमजोर करने के विचारों को फैलाने का प्रयास करते हैं

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पिछले लगभग 16 महीनों में दूसरी बार 1 जुलाई 2018 को और अब मार्च 2020 को अफगानिस्तान में सिखों और हिंदुओं की निर्मम हत्या हुई! 1980 के दशक में अफगानिस्तान में लगभग दो लाख सिख और हिंदू रहा करते थे "राजनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली नहीं थे लेकिन व्यापार और ट्रेड में उनका लोहा हुआ करता था !आज 2020 में यानी के इन 40 वर्षो के अंदर वहां यह संख्या घटकर के एक हजार रह गई है!
बमुश्किल एक मंदिर है काबुल में और तीन गुरुद्वारे बचे हैं; पिछले वर्ष 2018 जुलाई में जलालाबाद सिखों का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने जा रहा था रास्ते में ही आत्मघाती हमले में सिखों के बड़े लीडर अवतार सिंह खालसा इस हमले में मारे गए वह हिंदू और सिखों के लिए अफगानिस्तान में एक आवाज थे और कुछ ही समय के पश्चात संसद का चुनाव भी लड़ने वाले थे उनके साथ 19 अन्य सिख और हिंदू भी मारे गए !लेकिन संसदीय चुनाव से पहले अवतार सिंह खालसा की तालिबानियों ने इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने निर्मम हत्या कर दी !
अभी मार्च 2020में इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने 27 सिख श्रद्धालुओं को गुरुद्वारे के अंदर घुस के गोलियों की बौछार करके मार डाला जानकारी तो यह भी मिली है कि 3 वर्ष की छोटी बच्ची के सिर पर गोली मारी गई ,उसे भी मौत की नींद सुला दिया गया! अफगानिस्तान में सिख लगभग अपने खात्मे के तरफ खड़ा है" हालात इससे बदतर नहीं हो सकते जब अंतिम संस्कार के लिए शव को ले जा रहे थे वहां पर भी उन पर पथराव किया गया, साथ ही अंतिम संस्कार के रास्ते पर माइंस बिछाई गई थी, और वहां पर ब्लास्ट किया गया था! कितनी घृणा भरी पड़ी है इस जिहादी मानस के मन में अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को लेकर के आखिर क्यों ?और दूसरी तरफ भारत के वरिष्ठ विचारक वरिष्ठ पत्रकार एक शब्द टेलीविजन पर उनके मुख से सिखों के इस हत्या पर नहीं निकला .लेकिन उनके लिए एक राष्ट्रीय आपदा का प्रश्न बन गया कि टेलीविजन पर रामायण क्यों दिखाई जा रही है!
दिल्ली में सिटीजन अमेंडमेंट एक्ट नागरिकता संशोधन कानून को लेकर के कुछ सिख शाहीनबाग की महिलाओं को लंगर खिला रहे थे! मैं उन सब से पूछना चाहता हूं जिन लोगों को आपने लंगर खिलाया जिनके पक्ष में आप खड़े थे , कहा गया कि आपने संपत्ति बेचकर करके लंगर दिया ! जब अफगानिस्तान में सिखों की निर्मम हत्या हुई तब क्या एक भी वामपंथी ने आवाज उठाई कि सिखों का नरसंहार जो हुआ है वह मानवता का संहार है ! लेकिन इन लोगों को लगता है कि सिटीजन अमेंडमेंट एक्ट मुसलमानों के खिलाफ है ! अब मैं इन क्रांति के विलायती बबूलों से पूछना चाहता हूं जो सिखों और हिंदुओं के साथ अफगानिस्तान में हो रहा है क्या वह अत्याचार नहीं है ?यह मानवता की हत्या नहीं है क्या? उन सिखों और हिंदुओं को भारत लाकर के अगर उनको नागरिकता दी जाएगी तो यह अपराध है क्या? भारत सरकार को उनकी आवाज नहीं बनना चाहिए ? क्रांति के जो विलायती बबूल बने हुए हैं जो भारत के अंतर्मन की आवाज नहीं सुनते है ;और उस छद्म युद्ध को लड़ना जो वास्तविक रूप से लड़ाई का आधार ही नहीं है; बार बार भारत की सरकार ने भारत के गृह मंत्री ने कहा सिटीजन अमेंडमेंट एक्ट हिंदुस्तान के मुसलमानों के खिलाफ नहीं है! मुसलमानों के बड़े-बड़े उलेमा जो मुसलमान आबादी को समझने नहीं देना चाहते हैं ;कि नागरिकता संशोधन कानून भारत में उनके खिलाफ नहीं है !अफगानिस्तान पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू सिख बौद्ध और ईसाई को नागरिकता देने का मामला है ! जो वहां पर प्रताड़ित हो रहे हैं! सही मायने में अफगानिस्तान के सिखों की तुलना अगर भारत के मुसलमानों से की जाए तो भारत का मुसलमान हजारों गुना ज्यादा संपन्न व उन्नति के साथ भारत में जी रहा है !मैं भारत के उन वामपंथियों, कांग्रेसियों ,ममता बनर्जी ,आम आदमी पार्टी, चंद्रशेखर रावण, स्वरा भास्कर ,कन्हैया ,और ऐसे सभी लोग टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थक हैं' उन्हें समझना पड़ेगा भारत का मुसलमान राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक रूप से सही मायनों में विश्व के मुस्लिम देशों से भी ज्यादा स्वतंत्र और संपन्न है भारत की लोकतांत्रिक भूमि पर ! कल्पना कीजिए कि अफगानिस्तान में किसी मांग को लेकर के कोई हिंदू या सिख इतने दिनों लगभग 100 दिन तक इतनी जिद कर सकता है? इतना बड़ा धरना रख सकता है? बिल्कुल नहीं कर सकता! और तो छोड़िए किसी भी मुस्लिम राष्ट्र में अल्पसंख्यकों की इतनी हिम्मत नहीं सकती कि वह आधारहीन बातों पर जिद करके सड़कों को रोक दें !
आखिर इन लोगों को हमेशा गाहे-बगाहे सिर्फ भारत के ही मुसलमानों के अधिकारों की चिंता क्यों होती है ?! विलायती विचारों के बबूल हैं यह जानना जरूरी है कि मैंने विलायती बबूल शब्द का प्रयोग क्यों किया है?
क्योंकि अंग्रेज अपने साथ सन 1870 में भारत के अंदर से हरियाली का प्रतीक समझ कर के लाए थे! लेकिन हुआ उल्टा आज दिल्ली के संजय वन से लेकर के हरियाणा और राजस्थान की पहाड़ियों तक पर जो विलायती बबूल लगे हैं अधिकतर अरावली की पहाड़ियों पर वह ऐसे राक्षसी पेड़ हैं जो वृक्ष की श्रेणी में नहीं आते हैं न फल देते हैं और न छाया देते हैं हैं! ना पक्षी घोंसला बना पाते और ना ही आसरा बना पाते हैं,आसपास की भूमि बंजर हो जाती है।
से ही हमारे बीच में भी क्रांति के और विचारों के यह विलायती बबूल हैं जिनके विचारों से न भारत में वास्तविक इतिहास बताया गया, भारत की संस्कृति ,भारत का गणित ,भारत की वास्तुकला, भारत का वैदिक साहित्य ,भारत का आयुर्वेद, भारत का योग, भारत के मंदिर और वास्तुकला, भारत के गुरुकुल, हमेशा इनमें उनको दोष दिखता रहा ! हिंदू राजाओं का सार्मथ्य और पुरुषार्थ इन लोगों ने कभी भी पुस्तकों में नहीं आने दिया!
विलायती बबूल भारत विरोधी बयानों को हवा देकर के थोड़ा बहुत अखबारों में सुर्खियां बटोरने की चवन्नी छाप कोशिश करते रहते हैं ! इनकी खवातीन ए तो अजीब प्रकार का प्रदर्शन करती हैं "एक नए प्रकार के दृश्य और भाषा को लेकर के शाहीन बाग के अंदर खुला और भोंडा प्रदर्शन करने से पीछे नहीं हटती हैं
शाहीनबाग और चांद बाग़ इंद्रलोक के प्रदर्शनों में बाबासाहेब का फोटो लगाकर कर प्रदर्शन हुए !भारत में एक बहुत बड़ा खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वर्ग बुद्धिस्ट है इन प्रदर्शनों में दलित और मुस्लिम एकता के बहुत नारे लगे !लेकिन जब वह काबुल से 150 किलोमीटर दूर बामियान के अंदर भगवान बुद्ध की मूर्तियां तालिबानियों इस्लामिक जिहादियों ने उड़ाई थी!
तालिबानी कह रहे थे यह अल्लाह के विचारों की जीत है !2 मार्च 2001 को पहले रॉकेट लॉन्चर से उड़ाया गया , और उसके बाद भी जब उनको कामयाबी नहीं मिली तो बारूद लगा कर के दोबारा विस्फोट किए गए , मैं आपकी जानकारी में बता दूं तालिबान से पहले सन 1221 चंगेज खान ,उसके बाद औरंगजेब, 18 वीं शताब्दी में नादिर शाह ,और अहमद शाह अब्दाली' भी यह काम करने में पीछे नहीं रहे थे! इन सब हमलावरों के एक ही विचार थे जहां पर इस्लाम रहेगा वहां पर दूसरा धर्म रह नहीं सकता है !"वह काफिर है" और उनके समस्त निशानियां को उड़ा दिया जाए!
इस्लाम के जन्म से पहले ही पांचवी और छठी शताब्दी में अफगानिस्तान में बौद्ध धर्म पहुंच चुका था! भारत में कुषाण वंश के समय में ही अफगानिस्तान में बुद्धिस्ट धर्म का प्रचार-प्रसार प्रारंभ हुआ था ! लेकिन जैसे ही इस्लाम दाखिल हुआ उसने नरसंहार प्रारंभ कर दिए और यह आज तक चल रहा है !अब ना अफगानिस्तान में बुद्धिस्ट बचे हैं न हिंदू न सिख !भारत के किसी वामपंथी ' कांग्रेस ममता बनर्जी चंद्रशेखर रावण मायावती कभी किसी ने यह भारत में कहने की हिम्मत नहीं करि की औरंगजेब ,अहमद शाह अब्दाली और अब इस्लामिक स्टेट ,और तालिबानी , ने बुद्धिस्ट मूर्तियों को तोड़कर करके अपराध किया है, अफगानिस्तान में जो हिंदू और सिखों की जो हत्या हो रही है , वह नरसंहार है ।
मुसलमान जिहादियों को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए? यह मानवता की हत्या है ; जर्मनी के म्यूनिख यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एवन इमार लीन ने यूनेस्को की मदद से इन मूर्तियों को पुनः स्थापित करने में अपना संघर्ष जारी रखा! चाइना के जियांग सिंन्यू और लियांग हॉट दंपत्ति ने इसकी 3D डिजाइन को तैयार किया! जितना धन लगा वह अपनी जेब से लगाया! अब सवाल यह उठता है कि दलितों मुसलमानों के नाम पर जो राजनीति कर रहे है ! जब भगवान बुद्ध की सभ्यता की प्रतीक मूर्तियों पर तालिबानी हमला करते हैं जब सिखों हिंदुओं के अफगानिस्तान में हत्या हो जाती है! तब इनके मुंह से कुछ भी नहीं फूटता है ?
क्रांति के विलायती बबूल उद्दंड विचारकों की निर्लज्जता भी आला दर्जे की है वे सिर्फ हिंदुस्थान को कमजोर करने के विचारों को यह वैश्विक रूप से फैलाने का प्रयास करते हैं ! अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों के व्यापार और परिवारों को समाप्त कर दिया गया ! पाकिस्तानी लेखक हसन निसार ने सही कहा इनके बारे में खुद नहीं बदलते कुरान को बदल देते हैं ! जो कौम अपनी तारीख को तोड़ती और मरोड़ ती है उसकी हालात उस बूढ़े बेबस बाप की होती है जिसे दिखना बंद हो जाता है!
मेरा सुझाव है भीम और भीम का छद्म युद्ध लड़ रहे वामपंथी कांग्रेसी तृणमूल पार्टी ऑल इंडिया एम आई एम और कुछ आधारहीन दलित चिंतक जब इस्लामिक जिहाद के कारण से अफगानिस्तान में सिखों का और हिंदुओं का नरसंहार होता है! अफगानिस्तान में संस्कृति और सभ्यता के बुद्ध की प्रतिमा की रक्षा की हुंकार नहीं भर पाते हैं और साथ ही दिल्ली के दंगों का निर्लज्ज जता के साथ नए शहरी आतंकियों का कवच बनाने का प्रयास करते हैं तो वह अपनी दुर्दशा के खुद मालिक होंगे! जब जागो तब सवेरा होता है नहीं तो वामपंथी और कांग्रेस का तंबू ढीला हो गया है नहीं संभले तो तख्त के पाए भी जाते रहेंगे! वैसे भी भारत अब काफी आगे बढ़ गया है वामपंथ की कृतियों ने उसकी वैचारिक मान्यताओं को शायद भारत में अब कोई स्थान नहीं बचा है क्योंकि वैचारिक विलायती बबूल कभी कल्पवृक्ष नहीं बन सकते
 
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय छ़़ात्र संघ के अध्यक्ष और भाजपा के विधायक रहे हैं )