" कुछ समय के लिए अब जीवन जीने को मिला"

    दिनांक 16-अप्रैल-2020   
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अपने स्वरों से समां बांधने वाली ख्याति प्राप्ति लोक गायिका मालिनी अवस्थी कहती हैं कि ‘हमारे जैसे व्यस्त लोगों को तो समय ही नहीं मिला जिंदगी की तमाम चीजों के लिए। मैं तो इस पूरे लॉकडाउन के पूरे समय को इस रूप में देख रही हूं कि जैसे कुछ समय के लिए अब जीवन जीने को मिला है। लाॅकडाउन को केंद्र में रखते हुए अजय विद्युत ने उनसे खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

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इस लॉक डाउन के समय को कैसे परिभाषित करेंगी ? वैसे आपके कोरोना पर आधारित गीत की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काफी प्रशंसा की है ?
जिन कामों के लिए कभी वक्त ही नहीं था, अब ऐसे कई कामों को कर पा रही हूं। एक तो मैंने कोरोना वायरस पर गीत बनाया जो चार ही दिनों में काफी लोकप्रिय हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी उसकी प्रशंसा की। मेरे गीत के बोल इस प्रकार हैं, ‘हवाओं पे बैठा पहरा, असर देखो कितना है गहरा, पूछे है हर कोई देखो, खतरा बड़ा है पहचानो, डरना नहीं मुस्कुराना है मिलकर अब इसे हराना है, आखिर क्या है तू निगोड़ा, अरे आया है क्यों तू कोरोना।’
तमाम लोगों को काफी बोरियत हो रही है समय काटना मुश्किल हो गया है ?
हो सकता है कि लॉकडाउन के दौरान कुछ लोगों को घर पर बोरियत भी हो रही हो। मैं एक कोशिश यह कर रही हूं कि सोशल मीडिया के जरिए उन लोगों से बात करते रहें जो हमसे जुड़े हैं। मुझे लगता है कि जिन लोगों की हल्की-फुल्की लोकप्रियता हो जाती है उनका यह दायित्व भी है। उन लोगों को बीमारी के बारे में सही जानकारी देना और कैसे घर में बंद रहने के दौरान अपने को सकारात्मक रख सकें, इसे लेकर कितना कुछ हम कर सकते हैं उसे बताते हुए संवाद करना। मैं रोज अपने सोशल मीडिया अकाउंट जैसे फेसबुक और ट्विटर पर शाम पांच बजे से लाइव रहती हूं और लोगों से संवाद करती हूं। इसके अलावा, काफी कुछ ऐसे काम थे, जिन्हें व्यस्तता के चलते नहीं कर पा रही थी, उन्हें करने का अवसर भी मिला है। घर की बात करूं तो पतिदेव उत्तर प्रदेश में एक बहुत महत्वपूर्ण दायित्व देख रहे हैं। वे प्रदेश के गृह सचिव हैं और इस समय कोरोना को लेकर सारी कवायद में लगे हैं। फिर सास-श्वसुर साथ में हैं तो घर का काम भी काफी बढ़ जाता है और समय कम मिलता है। मैं काफी समय से एक पुस्तक लिखने पर विचार कर रही थी। इस समय काफी ध्यान उस पर लगा रखा है। रचनात्मक काम में आजकल लगी हुई हूं। पढ़ रही हूं और लिख रही हूं।
इधर क्या कुछ पढ़ा और देखा ?
एक बहुत रोचक चीज पढ़ी। प्रख्यात नाटककार स्व. मोहन राकेश के पत्रों की पुस्तक। ‘राकेश और परिवेश’ राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी जयदेव तनेजा की यह पुस्तक काफी पहले आई थी, लेकिन मुझे पढ़ने का समय नहीं मिला था। पत्रों के माध्यम से एक रचनाकार को जानना एक अलग अनुभव है। पत्रों में तो रचनाकार बहुत आत्मीय हो जाता है और तमाम विषयों पर अपनी बात बहुत खुलकर कहता है। मोहन राकेश के व्यक्तिगत, सरकारी, पत्नी, मां, अन्य महिलाओं, उनके समकालीन रचनाकारों-कलाकारों से पत्राचार पुस्तक में हैं। ये पत्र पचास के दशक से लेकर 1972 में मोहन राकेश के निधन तक के दौर के हैं, जो उस दौर के परिवेश पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। उस दौर में समाज का क्या चलन था, उसके बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारी भी इनसे मिलती है। इस पुस्तक को पढ़ने के अलावा इसी दौरान नेटफ्लिक्स पर कुछ सीरीज भी देख डालीं। ‘रबींद्रनाथ टैगोर की कहानियां’ अनुराग बसु द्वारा निर्देशित 26 कड़ियों का यह धारावाहिक बहुत प्रभावशाली और शानदार है। निर्देशन भी बहुत अच्छा है। यह 2015 में एपिक चैनल पर प्रसारित हो चुका है, लेकिन तब व्यस्तताओं के चलते देखने से चूक गई थी।
लॉक डाउन को लेकर लोगों से क्या कहना चाहेंगी ?
हमारे जैसे व्यस्त लोगों को तो समय ही नहीं मिला जिंदगी की तमाम चीजों के लिए। मैं तो इस पूरे समय को इस रूप में देख रही हूं कि जैसे जीवन अब जीने को मिला है कुछ समय के लिए। बाकी लोगों को भी इस लॉकडाउन की अवधि को इसी रूप में देखना चाहिए। अभी तक हम अपने आप को समय नहीं दे रहे थे, अपने आप से नहीं जुड़ पा रहे थे। प्रभु का संकेत है कि जो लोग घर से बाहर भाग-भाग कर जग को जीतने का प्रयास कर रहे थे, वे परिवार से जुड़ें, अध्यात्म से जुड़ें, ध्यान लगाएं, अपनी रुचि के कामों को करें, अपने आप को जानें। नवरात्रि की साधना तो नौ दिनों की होती है, लेकिन मैं कहूंगी कि सब लोग इक्कीस दिन साधना करें। इसका फल निश्चित ही बहुत अच्छा होगा।