साम्यवादी चोगे में पूंजीवाद

    दिनांक 16-अप्रैल-2020   
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चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है

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जापान के उप प्रधानमंत्री तारो आसो
वायरस संक्रमण ड्रैगन की ऐसी छींक है जिससे दुनिया भर में सरकारों का दम फूल रहा है और मानवता का गला रुंधने लगा है। जैसे चीन विश्व का दोषी है, वैसे ही हमारे पड़ोस में भी कुछ दोषी होंगे। चीन ने अपने हिस्से का ‘काम’ किया, झेल दुनिया रही है। एक जमात ने पूरे समाज को कलंकित करते हुए अपने हिस्से का ‘काम’ किया और कब्रिस्तान में चौगुनी लाशें पहुंचने लगीं, भुगत भारत रहा है। रोग फैलाने के लिए दुनिया और भारत के सबसे बड़े कारक चिन्हित हुए। अपने यहां एक और पक्ष है, विरोध के खूंटे से बंधा विपक्ष, जो संकट के समय भी अपनी प्रकृति नहीं छोड़ता। इसलिए अच्छा हो कि उनके हवा-हवाई विरोध और सामाजिक संवेदनशीलता एवं वैज्ञानिकता को चिढ़ाते सुझावों पर मगज मारना छोड़कर समस्या के वैश्विक मूल, यानी चीन का रुख करें।
डब्ल्यूएचओ का नाम चायनीज हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कर देना चाहिए। अगर डब्ल्यूएचओ दुनिया से ये नहीं कहता कि चीन में कोई निमोनिया महामारी नहीं है, तो हर देश ने सावधानी बरती होती...डब्ल्यूउचओ, जो एक वैश्विक संगठन है, ताइवान को अपने साथ शामिल तक नहीं करता।                                    तारो आसो, उप प्रधानमंत्री जापान
हैरानी की बात है कि जो महामारी क्षेत्रीय उत्पात से अंतरराष्ट्रीय चक्रवात तक कद बढ़ा चुकी है, चीन चाहता है कि अभी भी उसका ठीक नामकरण न किया जाए। डॉक्टरों-वैज्ञानिकों, सबका कहना है कि कोरोना और भी कई तरह का होता है, फिर वुहान से फैले इस महाविनाशक विषाणु को चाइनीज वायरस क्यों ना कहा जाए!
सबसे पहले इसका खुलासा करने वाले डॉक्टर ली वेन लियांग से मृत्यु पूर्व जबरन इसका खंडन कराने, विषाणु की बात दबाने और मृतकों की संख्या पर लीपापोती के आरोपी चीन की बेचैनी समझ आती है। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसके लिए विभिन्न देशों से संपर्क कर चिंता जताते हुए वायरस को 'चायनीज वायरस' ना कहने की नसीहत भी दी। लेकिन यह सोचना कि चीन बदनामी के डर से ऐसा कर रहा है, मूर्खता ही होगी। दरअसल चीन को बदनामी से कोई फर्क पड़ता तो एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2018 में प्रकाशित उस रिपोर्ट से वह पानी-पानी हो गया होता, जिसके अनुसार विश्व भर में कुल जितने लोगों को मृत्युदंड दिया गया उससे ज्यादा सजाएं अकेले चीन में दी गईं।
किसी भी बदनामी से बेपरवाह चीन आज दुनिया की ऐसी विस्तारवादी शक्ति है जिसने साम्यवादी चोगा तो पहना हुआ है, लेकिन उसके प्राण पूंजीवाद, शोषण और सिर्फ मुनाफे में बसते हैं। यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि चीन को बदनामी नहीं सिर्फ अपने आर्थिक नुकसान से फर्क पड़ता है, और यही बात उसे समझ आती है।
आप संकट के समय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की कसौटी पर इस बात को माप कर देखिए। आप पाएंगे कि:
मार्च 2020 में जिस समय दुनिया भारी उथल-पुथल से कांप रही थी, उस समय भी चीन 12 वाटर ड्रोन के सहारे दक्षिणी चीन सागर से बढ़ते हुए हिंद महासागर तक की अहम जानकारियां बटोरने में लगा था।
दुनिया को जिस समय चिकित्सकीय उपकरणों आदि की भारी किल्लत थी, उस समय चीन घटिया गुणवत्ता की सामग्री विदेशों में खपाने में जुटा था।
जिस समय दुनिया वैश्विक महामारी पर गंभीरता से चर्चा करना चाहती थी, उस समय चीन का बगल-बच्चा बना विश्व स्वास्थ्य संगठन (हऌड) विश्व मंच पर वैश्विक महामारी की चर्चा ना होने देने का खेल खेल रहा था।
तो फिर चीन की चिंता का कारण क्या है? इस चिंता को समझने के लिए वर्तमान डब्ल्यूएचओ के पद समीकरणों के साथ कम्युनिस्ट आंदोलन के गर्भनाल संबंधों को समझना होगा।
इसे खुद से सवाल पूछते हुए कुछ यूं समझें कि, चीन की राजकीय चिंता विश्व मीडिया की चुप्पी क्यों बन गई? क्या बीजिंग की हनक या वायरस की मारक क्षमता ने मीडिया की मुखरता भी छीन ली! ऑस्ट्रेलियाई अखबार डेली टेलीग्राफ ने जरूर चायनीज वायरस के मुद्दे पर चीन से आक्रोश पत्र प्राप्त होने पर इसकी सार्वजनिक बखिया उधेड़ी, किंतु मीडिया के बड़े हिस्सों में इस पर मौन क्यों बना रहा, और क्यों विश्व स्वास्थ्य संगठन और इसके महानिदेशक की कार्यप्रणाली पर जो सवाल उठने चाहिए थे, वे उठे ही नहीं? इसका जवाब मीडिया में चीनी कम्पनियों के निवेश, विज्ञापन बजट, यूसी ब्राउजर जैसे पत्रकार प्रशिक्षण और समाचार सेवा के लबादे में मनचाही खबरों को छांटने-दबाने के औजारों में छिपा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस अधानम (जिनका हिंसक/आतंकी कम्युनिस्ट आंदोलन से साफ जुड़ाव रहा) के मुद्दे पर आज मीडिया का मौन एक पहेली जैसा है। गौर करने वाली बात है कि महानिदेशक बनने से ठीक पहले टेड्रोस इस बात को लेकर सुर्खियों में थे कि उन्होंने इथियोपिया में हैजे जैसी महामारी को बिना वैज्ञानिक जांच के, 'पानी से फैलने वाली पेचिश' बताकर मामला दबाने का कारनामा कर दिखाया था। इतना ही नहीं, आरोप थे कि उन्होंने तीन अलग-अलग वर्षों में बार-बार यह काम किया। टेड्रोस के उग्रवादी कम्युनिस्ट दल से जुड़ाव के इतिहास को देखते हुए इथियोपिया के कई दलों ने डब्ल्यूएचओ में उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया था, लेकिन साथ ही कम्युनिस्ट टैग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ने उनकी उम्मीदवारी के लिए लाखों डॉलर भी खर्च किए थे। शायद यह कम्युनिस्ट जुड़ाव ही था जिसकी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीनी एजेंसियों की भ्रामक रिपोर्ट पर मुहर लगाते हुए दुनिया भर में ट्विटर के जरिए यह मुनादी कर दी कि चायनीज वायरस इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता।
दरअसल यही वह बिंदु है जहां चीन की बेचैनी का बीज छिपा है। यही वह बिंदु है जहां चीन और डब्ल्यूएचओ से जवाब—तलब करने और विश्व मानवता को हुई क्षति के लिए हजार्ना मांगने के लिए घेराबंदी की जरूरत है। महामारी से अधूरे-अनमने ढंग से निपटने, डॉक्टर ली वेन लियांग जैसे सूचना के हरकारे को खामोश करने और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं का दुनिया को अंधेरे कुएं में धकेलने के औजार के रूप में उपयोग करने के प्रथम दृष्टया साक्ष्य दुनिया के सामने उजागर हो रहे हैं।
इस विषाणु के आघात को झेलने के बाद विश्व व्यवस्था का चेहरा चाहे जो हो, किंतु यदि उसके हृदय में न्याय और संवेदनशीलता की आग बुझ गई, दोषियों को दण्ड न मिला तो यह दुनिया के उस सपने का मर जाना होगा जिसे हम सब देखते हैं। इसलिए, चायनीज वायरस की रोकथाम और राहत कार्यों से छुट्टी पाने के बाद दुनिया को न्याय पाने के लिए कमर कसनी होगी।