तबलीगी और वामपंथी : सच क्यों न बताया जाए.....?

    दिनांक 16-अप्रैल-2020   
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इस्लामी देश मलेशिया खुलकर बता रहा है कि कोरोना संक्रमितों में तबलीगियों का प्रतिशत कितना है.भारत में तथाकथित सेकुलर-लिबरल-प्रोग्रेसिव, संक्षेप में वामपंथी चाहते हैं कि ये सच छिपाया जाए. अपने पुराने तौर-तरीकों के साथ ये गिरोह मैदान में कूद पड़ा है. लॉकडाउन के खिलाफ छेड़ा जिहाद

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वामपंथी चाहते हैं कि कोरोना संक्रमित तबलीगी जमातियों की संख्या अलग से न बतलाई जाए. दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने भी ऐसा ही कहा है. तमिलनाडु सरकार ने तो जमाती संक्रमितों को “सिंगल सोर्स” कहना भी शुरू कर दिया है. हालांकि इससे सिर्फ इतना ही हुआ कि लोगों को जमातियों के लिए एक और संबोधन मिला गया. लेकिन तमिलनाडू सरकार को “सिंगल सोर्स” की ऐसी सनक कि कोरोना फैलाने में तबलीगी जमात की हिस्सेदारी का विश्लेषण करने के ‘जुर्म’ में एक ब्लॉगर मरिदास पर एफआईआर दर्ज कर दी गई है. हालांकि इस्लामी देश मलेशिया खुलकर बतला रहा है कि कोरोना संक्रमितों में तबलीगियों का प्रतिशत कितना है. तबलीगी वहां भी अव्वल आ रहे हैं. मलेशिया के नए कोरोना संक्रमितों में लगभग आधे वामपंथियों और छद्म सेकुलरों के प्रिय जमाती हैं. पाकिस्तान में भी मीडिया इनके नाम पर रो रहा है कि जाहिलों को कैसे समझाया जाए लेकिन भारत में ममता बानो से लेकर ओवैसी जैसे “सेकुलर” नेता भी यही राग अलाप रहे हैं कि ‘मत बताओ.’ सवाल ये है कि देश को सच क्यों न बताया जाए?
क्या ये दिल्लीफोबिया या इंदौरफोबिया है ?.....
क्या तबलीगी जमात देश के सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है? क्या ये जानकारी छिपाना देश के नागरिकों को खतरे में डालना नहीं होगा? क्या लोगों को ये चेतावनी देना सरकार और मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि वो अपने आस-पास रह रहे जमातियों से स्वास्थ्य की दृष्टि से सावधान रहें क्योंकि उनमें बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित पाए जा रहे हैं? क्या इससे सबसे ज्यादा मुसलमानों को ही खतरा नहीं है? क्या देश की इतनी बड़ी लड़ाई को इस ‘संकोच’ या छद्म सेकुलरवाद के वोटबैंक के एजेंडे की भेंट चढ़ा दिया जाए? इतने कष्ट, इतना बड़ा आर्थिक नुकसान गट्ठा वोट के सौदागरों के लिए व्यर्थ कर दिया जाए? वामपंथी इसे इस्लामोफोबिया फैलाना बता रहे हैं.
दिल्ली, मुंबई और इंदौर में कोरोना संक्रमितों की संख्या ज्यादा है, ये जानकारी देश को देना क्या दिल्लीफोबिया या मुंबईफोबिया अथवा इंदौरफोबिया है?
इलाज के खिलाफ बीमार बुद्धिजीविता
वामपंथी मीडिया तो जमातियों की घृणित हरकतों और चिकित्सकों व स्वास्थ्य कर्मियों पर किए जा रहे हिंसक हमलों को नए नए बहानों की ढाल देने में लगा है. जब इंदौर की मुस्लिम बस्ती में कोरोना योद्धा स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला हुआ तो एक प्रसिद्ध वामपंथी न्यूज़ पोर्टल ने आज से सवा सौ साल पहले फैले प्लेग के दौरान अस्पताल में क्वारंटाइन किए जाने वाले लोगों के परिजनों द्वारा अंग्रेज अधिकारियों के विरोध की घटना को पेश किया. तब अंग्रेजों द्वारा नियुक्त प्लेग अफसरों ने लोगों पर बहुत जुल्म किए थे. उस जमाने में अंग्रेजों और आधुनिक चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों के अविश्वास की तुलना घुमा-फिराकर आज देश में तबलीगियों और कुछ मुस्लिम इलाकों में लोगों द्वारा किए जा रहे हिंसाचार से की गई. और फिर अंत में बड़ी ही मासूमियत से पूछा गया कि “क्या हम कोविड 19 चिकित्सा कर्मियों पर किए जा रहे हमलों को नज़रअंदाज कर सकते हैं? सामाजिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्वारंटाइन को लेकर मन में बैठे संदेहों को समझाती है..” ये लचर बहाना है. क्या सवा सौ साल पहले लोगों के मन में अंग्रेजों के प्रति जो अविश्वास था उसके तुलना आज 2020 में किए जा रहे फसाद से की जा सकती है? क्या आज के लोग आधुनिक चिकित्सा पद्धति और प्रशासन तंत्र से उतने ही अनजान हैं, जैसे 1897 में थे? इसी साइट पर दूसरा लेख फ़सादियों के लिए एक अन्य बहाना पेश करता है कि क्वारंटाइन में आप जितना अधिक समय बिताते हैं उतना अधिक आप नियमों का पालन न करने के लिए प्रवृत्त होते हैं.
लेख लिखे जा रहे हैं कि सीएए मुस्लिम विरोधी था, अब क्वारंटाइन भी मुस्लिम विरोधी है. कोरोना और लॉकडाउन की आड़ में मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनने की साज़िश की जा रही है. बेहद भड़काऊ शीर्षक वाले लेख न्यूज़ पोर्टलों पर चमक रहे हैं, जैसे “व्हाय द स्लो ड्रिप ऑफ़ ऑफ़ एंटी मुस्लिम पॉइजन इन इंडिया इस नाओ अ फ्लड” अर्थात “मुस्लिम विरोधी जहर की धीमी धारा बाढ़ कैसे बन गई है” पूरी बेशर्मी से लिखा जा रहा है कि तीन तलाक को अपराध बनाना, 370 को हटाना, गोहत्या को रोकना, कश्मीर में इंटरनेट सुविधा को (कुछ समय के लिए) बंद करना , “संदिग्ध” तरीकों से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता बनाना ये सब मुस्लिम विरोधी कदम हैं.
समाज का विकृत चित्रण
द वायर के संपादक सिद्धार्थ ने एक चित्र साझा किया कि मजदूर सर पर सामान रखे एक कॉलोनी में से निकलकर जा रहे हैं और कॉलोनी के लोग अपने घरों की बालकनी में से उन्हें देखकर घंटे-थाली-शंख आदि बजा रहे हैं. ये नकारात्मक सोच, समाज का ऐसा झूठा चित्रण यही वामपंथी बुद्धिजीविता है. क्या भारत के करोड़ों लोगों ने प्रवासी मजदूरों की कठिनाइयों को ‘सेलिब्रेट’ करने के लिए थाली-घंटे बजाए थे? वो घंटे तो देश के चिकित्सकों-पुलिस और मीडियाकर्मियों के सम्मान में बजाए गए थे. उन्ही घंटे-थाली बजाने वाले लाखों-करोड़ों लोगों ने इन मजदूरों की सेवा में तन-मन-धन लगाया है. समाज को जोड़ने वाली ये घटना वामपंथ के चश्मे से दिखाई नहीं पडतीं. वो ढूँढ-ढूँढकर नकारात्मक जुमले और हताशा भरे चित्र लाएंगे.
वो लेख लिखेंगे कि “भारत महामारी से पुलिस की लाठियों के सहारे नहीं लड़ सकता. लोगों को भोजन और सम्मान मिलना चाहिए.” कितनी घृणा है इन लोगों के मनों में. क्या पुलिस ने कहीं किसी पर इसलिए लाठी चलाई कि वो भोजन मांग रहा था? पुलिस की सख्ती कर्फ्यू तोड़ने वालों या चिकित्सा कर्मियों पर हमला करने वालों पर हुई है. सरकार ने लोगों को 3 महीनों का राशन दिया है. जिनके पास राशन कार्ड नहीं है उनके लिए भी व्यवस्था की जा रही है. समाज आगे आया. स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आईं. मंदिरों ने अपने कपाट भक्तों के लिए बंद कर रखे हैं लेकिन भक्तों के लिए खोल दिए हैं.
लेकिन वामपंथ और छद्म सेकुलरवाद को ये सब नहीं दिखता. वो तो वाइन की चुस्कियां लेते हुए तब्लीगी और तालिबानियों की चमचागिरी करेंगे. हर सकारात्मकता को कोसेंगे. अपने मन में पल रहे जुगुप्सा और आत्महीनता के कीटाणुओं को समाज के चेहरे पर मलने की कोशिश करते रहेंगे.