दुनिया को दहलाकर “इस्लामोफोबिया” का रोना रहे हैं तबलीगी और उनके साथी वामपंथी

    दिनांक 16-अप्रैल-2020   
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कट्टरता को पोसने वाली वामपंथी जमात , तबलीगी जमात और दूसरे कट्टरपंथी गिरोहों के समर्थन में उतरी. विमर्श को भटकाने और अटकाने का खेल शुरू.

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9/11 के बाद जब दुनियाभर में जिहादी आतंकी हमलों की बाढ़ आ गई, अमेरिका व पश्चिमी देशों में एक के बाद एक इस्लामी कट्टरपंथी गुटों के कारनामे सामने आने लगे, और यूरोप में, अरब देशों व अन्य एशियाई देशों से गए मुस्लिमों ने अपने आश्रयदाता देशों में शरिया क़ानून और इस्लामी तौर तरीके लागू करने के मांग शुरू कर दी, तो वहाँ के स्थानीय लोगों और अनेक सामाजिक-राजनैतिक संगठनों ने इस्लामी कट्टरता पर लगाम लगाने की मांग उठानी शुरू कर दी. अब जैसा भारत में होता है कि आतंकी गुटों, मुस्लिम कट्टरपंथियों का साथ देने उन्हें निर्दोष बतलाने के लिए वामपंथी, लिबरल्स और समाजवादी कूदकर सामने आते हैं, कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर चुप रहते हैं लेकिन अफज़ल गुरु, याकूब मेमन और कसाब के लिए आंसू गिराते हैं. जाकिर नायकों को पोसते हैं और आरिफ मुहम्मद खान और तारेक फतह जैसे राष्ट्रवादियों को कोसते हैं... ऐसा ही पश्चिमी देशों में भी होता है. इसलिए जब पश्चिमी देशों और अमेरिका में कट्टरपंथी इस्लाम पर आम लोगों में बहस जोर पकड़ने लगी तो वहाँ के वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इस बहस को भटकाने के लिए एक शब्द गढ़ा. इस्लामोफोबिया.
फोबिया यानी एक काल्पनिक भय. ये चिकित्सा मनोविज्ञान का शब्द है. कुछ लोग अनेक प्रकार के काल्पनिक भयों से ग्रस्त हो जाते हैं जैसे हाइड्रोफोबिया याने पानी से भय, क्लॉस्ट्रोफोबिया याने बंद कमरे या बंद जगह का भय, आर्निथोफोबिया अर्थात पक्षियों से डरना , चिआनोफोबिया अर्थात बर्फ से भयभीत होना आदि. इसी फोबिया शब्द को इस्लाम में जोड़कर शब्द तैयार किया गया – इस्लामोफोबिया. इस शब्द को तुरंत ही सारी दुनिया के कम्युनिस्टों, लिबरल प्रगतिशील गिरोह और मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पकड़ लिया. भारत में भी असादुद्दीन ओवैसी, कन्हैया कुमार, कम्युनिस्ट पत्रकारों, जमात ए इस्लामी व तबलीगी जमात जैसे संगठनों और कश्मीरी अलगाववादियों ने इस्लामी कट्टरता के कारनामों को छिपाने के लिए इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया. इस्लामोफोबिया से आशय है कि लोग बेकार ही हल्ला कर रहे हैं. व्यर्थ भय फैलाया जा रहा है. इस्लामी आतंकवाद और इस्लामी कट्टरता जैसी कोई चीज नहीं है, बल्कि ये सवाल उठाने वाले ही कट्टरपंथी है. शांति के दुश्मन हैं.
इसका मतलब हुआ कि यदि अब आप यदि कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अकथनीय अत्याचारों की बात उठाते हैं तो आप इस्लामोफोबिया फैला रहे हैं. यदि उत्तरप्रदेश के कैराना से हिंदुओं के पलायन पर सवाल पूछते हैं तो आप इस्लामोफोबिया का प्रचार कर रहे हैं. यदि आप तीन तलाक और धारा 370 को ख़त्म करने के समर्थक है, तो आप इस्लामोफोबिक हैं याने इस्लामोफोबिया से ग्रस्त हैं. तानाजी फिल्म में औरंगजेब द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों का जिक्र है, इसलिए वो फिल्म इस्लामोफोबिया की मिसाल है. और अब देश में तब्लीगियों के कोरोना वायरस बांटने की मीडिया में रोज चर्चा हो रही है तो मीडिया इस्लामोफोबिया फैला रहा है, और सरकार भी इस्लामोफोबिया फैलाने की मुजरिम है क्योंकि वो देश को बतला रही है कि कितने कोरोना संक्रमित तबलीगी जमात से जुड़े हैं. तबलीगी जमात और “सेकुलर-लिबरल-प्रोग्रेसिव” वामपंथी तबलीग से जुड़े कोरोना के आंकड़ों पर इस्लामोफोबिया का विलाप कर रहे हैं.
घाव और मवाद को छिपाने की कोशिश

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वामपंथी गिरोह की खासियत है कि वो उदार और राष्ट्र की मुख्यधारा के मुस्लिमों की उपेक्षा करते हैं और कट्टरपंथी तालिबानी मानसिकता की तेल मालिश करते हैं. वामपंथी “फेमिनिस्ट” आपको तीन तलाक समाप्त करने वाले क़ानून का विरोध करती मिलेंगी या चुप्पी मारे. कोरोना के मामले में भी ये लोग इसी राह पर हैं. जिहादी मानसिकता पर पर्दा डालने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंके हुए हैं. पर मीडिया और सोशल मीडिया के जमाने में ऐसा हो नहीं पा रहा है.
मीडिया और सोशल मीडिया की आंख से सारी दुनिया देख रही है कि जम्मू कश्मीर से लेकर अंदमान तक, और राजस्थान से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक तबलीगी जानलेवा बीमारी बाँट रहे हैं. देश में मस्जिदों और छतों पर चुपके से या फिर धौंस के साथ की जा रही सामूहिक नमाज बतलाती है कि मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से पर फिरकापरस्ती और मौलवी की पकड़ इतनी मजबूत है कि उन्हें काबा का लॉक डाउन भी नहीं दिख रहा है. जगह-जगह स्वास्थ्य अमले पर बरसते पत्थर बतला रहे हैं कि संकीर्ण मानसिकता का 70 बरस तक पोषण किया गया है.
मजे की बात है कि “काफिर” कोरोना की दवा खोजने और उससे लड़ने में लगे हैं उधर कुछ मुल्ला “काफिरों” को बद्दुआ देने में व्यस्त हैं.सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मुल्ला बोलते दिख रहे हैं कि “या अल्लाह, इस कोरोना को काफिरों की तरफ मोड़ दे... “ वो वीडियो सभी ने देखा है जिसमें जालीदार टोपी लगाए मुस्लिम युवक कोरोना के आगमन की खुशी मनाते हुए कहता है कि “तुम एनआरसी ला रहे थे न... कागज़ मांग रहे थे न.. अब अल्लाह की एन आर सी शुरूहो गई है.” कुछ कह रहे हैं कि अब मुसलमान दुनिया को लीड करेंगे और उनका अपना फिरका दुनिया को चलाएगा. कहीं कहा जा रहा है कि जो मुसलमान जो कोरोना से मरेगा वो शहीद कहलाएगा. दूसरे तरह के अंधविश्वास भी फैलाए जा रहे हैं.”अल्लाह ने जिस दिन लिखी है, मौत तो तभी आएगी..” ... यदि यही सच है तो फिर हर तरह का इलाज बंद कर देना चाहिए. दुनिया ढूंढ रही है कि कोरोना कैसे फैलता है, उससे कैसे बचना है, उसकी वैक्सीन कब बनेगी.... यहाँ मौलाना साद जैसे लोग और उनकी जमात इस्लामी-गैरइस्लामी और हलाल-हराम में मुसलामानों को उलझाए हुए हैं.
ये "फोबिया" नहीं वास्तविक भय है...
इसके धरातल पर खतरनाक परिणाम निकल रहे हैं. टिकटॉक वीडियो पर एक मुस्लिम युवक 5 सौ के कुछ नोटों को चाटकर दर्शकों से कहता है “आपके लिए”. लॉकडाउन के दौरान मध्यप्रदेश के गुना जिले के धरनावदा पुलिसथाना क्षेत्र में चूनाभट्टी इलाके मं“ शाकिर खान नामक मुस्लिम युवक ने सुबह-सुबह गांव के हैंडपंप में खुद का मैला मिला दिया. इस हैंडपंप से आसपास के 25-30 घरों के लोग पानी भरते हैं. शाकिर खुद भी आसपास की दुकानों में पानी भरने का काम करता है.बदले में उसे ठीक-ठाक मजदूरी भी मिल जाती है. जब लोगों ने उसकी हरकत पर ऐतराज जताया तो वो फरसा लेकर उन्हें धमकाने लगा.
कोटा का कुछ महिलाओं का वीडियो फुटेज सामने आया जिसमें वो पॉलीथीन में थूक-थूककर लोगों के घरों में फेंकती दिखीं. कुछ के साथ बच्चे भी थे. खाने के सामान में थूकते, सब्जियों पर थूक लगाते मुस्लिम विक्रेताओं के वीडियो फ़ैल रहे हैं. ऐसे में आम लोगों में भय फ़ैल रहा है. इसका बुरा परिणाम ये हो रहा है कि देश में कई स्थानों पर लोग कुछ भी खरीदने के पहले सब्जी या फल विक्रेता से आधार कार्ड दिखाने को कह रहे हैं. सभी मुस्लिम विक्रेता तो ऐसा नहीं कर रहे हैं. लेकिन ग्राहक फैसला कैसे करे ? उसे दोष भी नहीं दिया जा सकता. अपनी और अपने परिवार की रक्षा करने का उसे पूरा अधिकार है. ये स्थिति दुखद है. इस्लामी कट्टरता फैलाने वाले आम मुसलमान के भी दुश्मन बन गए हैं.
कोरोना वायरस एक दिन चला जाएगा, लेकिन कोरोना त्रासदी ने एक कडवे सच को उघाड़कर रख दिया है. इस्लामी जगत में पल रही कट्टरता और अंधविश्वास पर गहन आंतरिक मंथन की आवश्यकता है. मुसलमानों को समझना पडेगा कि तंगदिल सोच और संकीर्ण मानसिकता वाली जमातें उनके गले की फांस हैं, और मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन हैं वो छद्म सेकुलर लोग, वामपंथी, दामपंथी और कपटपंथी, जो सच पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं. जो कट्टरपंथियों की खुलती पोल को ढंकने के लिए “इस्लामोफोबिया” नाम का फरेब फैला रहे हैं.