जब बुरा मुसलमान पत्थर मारता है, तो कहां होता है अच्छा मुसलमान ?

    दिनांक 16-अप्रैल-2020   
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मुरादाबाद में जिस तरीके से एक डॉक्टर और ईएमटी स्टाफ पर पत्थरों से हमला किया गया  वह लिंचिंग नहीं है क्योंकि
सेक्युलर बिरादरी ने लिंच होने का कॉपीराइट किसी एक कौम को थमा दिया गया है.

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कौन हैं ये लोग. जो जान बचाने के लिए गए डाक्टरों पर पथराव करते हैं. जो थूकते हैं. जो खुले में शौच करते हैं. क्या इनमें कोई कॉमन फैक्टर है. जी हां, इनमें एक बात हर जगह समान है. ये सभी एक मजहब के लोग हैं.
ये वही लोग हैं, जो पोलियो ड्राप पिलाने जाने वाली टीम पर पत्थर मारते हैं. जो जनगणना में सहयोग नहीं करते. जो बच्चों को कीड़े की दवाई देने वाली आंगनबाड़ी कार्यकत्री से छेड़छाड़ करते हैं. ये जान बचाने में दिन रात जुटी नर्सों से अश्लील हरकतें करते हैं. ये मजहबी जुनून में अंधे हैं, तो इनसे बड़े अंधे वे हैं, जो खोखली दलीलें देते हैं. मसलन हर मुसलमान बुरा नहीं है. मैं पूछता हूं कि अच्छा मुसलमान कहां है ? उस समय वह कहां चला जाता है, जब पूरा मोहल्ला मिलकर पथराव करता है. आगजनी करता है. इतना सब होने के बावजूद वह बिलों से बाहर नहीं निकलता. इससे भी शर्मनाक. इनके बचाव में दलीलें देते मौलाना नजर आएंगे और इन मजहबी कट्टरपंथी जिहादियों के खैरख्वाह तथाकथित बुद्धिजीवी.
 
क्या अब समय नहीं आ गया है कि ईमानदारी से समीक्षा हो. ईमानदारी से देखा जाए कि गड़बड़ कहां है. कश्मीर में सेना पर पत्थर मारते हैं. इन्हें आजादी चाहिए. फिर ये नागरिकता कानून या ऐसे ही किसी बहाने को लेकर देशभर में पत्थर मारते हैं. आजादी के नारे लगाते हैं. भारत पोलियो उन्मूलन से चंद कदम दूर है. लेकिन नहीं हो पा रहा. इक्का-दुक्का केस सामने आ जाता है. वह इसी शांति प्रिय मजहब का निकलता है. वजह ये कि इस पूरी कौम को किसी अनपढ़ मौलाना की इस बात पर यकीन है कि सरकार पोलियो की दवा के नाम पर उनके बच्चे को नपुंसक बनाने की कोशिश कर रही है. हद है न जहालत की. जहालत इतनी ही नहीं है. देशभर में एनआरसी के खिलाफ धरने हो चुके, प्रदर्शन हो चुके, हिंसा हो चुकी. अब इनसे पूछिए कि एनआरसी है कहां.... तो कहेंगे हमें इस देश से निकालने की साजिश है. कौन निकाल रहा है, ऐसा कौन सा कानून बन गया है... पूछिए. और बस पूछते रहिए. क्योंकि तर्क की इनके सामने कोई गुंजाइश नहीं है.
इस देश में कट्टरपंथी जिहादी सोच को ढकने के लिए नए-नए नैरेटिव गढ़े जाते हैं. मसलन मॉब लिंचिंग. अब लिंचिंग का इतिहास अगर आप देखेंगे, तो आपके कर्बला तक जाना पड़ेगा. लेकिन लिंचिंग की बुद्धिजीवियों ने अपनी सुविधाजनक परिभाषा गढ़ रखी है. ये जुमला तभी लागू होता है, जब एक मजहब के किसी शख्स को कोई तू तक कह दे. मुरादाबाद में जिस तरीके से एक डॉक्टर और ईएमटी स्टाफ पर पत्थरों से हमला किया गया वह लिंचिंग नहीं है क्योंकि सेक्युलर बिरादरी ने लिंच होने का कॉपीराइट किसी एक कौम को थमा दिया गया है.. कहीं किसी चोर की गुस्साई भीड़ द्वारा पिटाई पर सूरत लटकाकर लंबे प्रोग्राम देने वाले कथित पत्रकार मुरादाबाद की घटना पर गायब हैं. वे कांग्रेस और जिहाद प्रायोजित बुद्धिजीवी भी गायब हैं. अगर कोई ढूंढे मिल जाता है, तो बस उसकी जुबान इतनी ही खुलती है कि कुछ लोग..... कुछ गलत तत्व. लेकिन ये गलत तत्व कौन हैं ? और अगर ये कुछ हैं, तो बाकी कहां हैं ? जो इन्हें रोकते नहीं. शाहीन बाग में इन्हे कोई नहीं रोकता. जामिया के आस-पास ये आग लगा देते हैं, कोई नहीं रोकता. अंकित शर्मा को चाकुओं से गोद देते हैं, कोई नहीं रोकता. एक मरकज में कोरोना पालते हैं और पूरे देश में फैला देते हैं, कोई अच्छा तबका सामने नहीं आता. क्वारंटाइन सेंटर में नर्सों से अश्लीलता करते हैं, सरे आम नंगे हो जाते हैं, वार्ड के बाहर शौच करते हैं. कहां चले जाते हैं वो... जिनके बारे में कहते हैं कि सब ऐसे नहीं हैं. अगर सब ऐसे नहीं हैं और इन कथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों की बात मानी जाए कि ये सिर्फ चंद लोग हैं, तो अधिसंख्य अच्छे लोग कहां हैं ?
पूरे देश में अगर कोरोना की आफत है, तो इसलिए कि इंदौर से लेकर मुरादाबाद तक एक ही विचारधारा काम कर रही है. देशी हो या विदेशी, जमात से निकला हर शख्स छिपता क्यों फिर रहा है. और अगर अधिसंख्य लोग अच्छे हैं, तो चंद बुरे तत्व इन्हें कैसे छिपा पा रहे हैं. इन कुकर्मो को छिपाने के लिए ये जिहाद समर्थक सेक्यूलर तबका किसी भी हद तक जा सकता है. मसलन इनकी हरकतों पर आप बोलेंगे, तो एक और जुमला तैयार है. आपको इस्लामोफोबिया करार दे दिया जाएगा. मायने ये कि ये गलत करेंगे, और करते रहेंगे. आप गलत की तरफ इशारा भर कर दीजिए, तो आप सांप्रदायिक होंगे और इस्लामोफोबिया के मरीज भी. हम देश का कानून नहीं मानेंगे. हम संसद से पास कानून नहीं मानेंगे. हम सुप्रीम कोर्ट नहीं मानेंगे. हम राष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं मानेंगे. हम राष्ट्रीय पर्व नहीं मानेंगे. हम वैश्विक आपदा को भी नहीं मानेंगे. और हां.... हम पत्थर मारेंगे. बीवी बच्चों समेत. खबरदार अगर आप बोले.....