सोनिया गांधी की नाजायज मांग

    दिनांक 17-अप्रैल-2020
Total Views |
शिशिर सोनी की फेसबुक वॉल से
 
a_1  H x W: 0 x
समझ से परे सलाह: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल
 
लगता है सोनिया गांधी पर भी अब राहुल गांधी का असर होने लगा है। तभी वह राहुल गांधी की तरह बहकी-बहकी बातें कर रही हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि मीडिया को दिया जाने वाला विज्ञापन दो साल के लिए बंद किया जाए और इस राशि का उपयोग कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में किया जाए।
 
वह मीडिया की बुनियाद पर चोट करने को क्यों कह रही हैं? जाहिर है कि उनका गुस्सा राहुल गांधी को लेकर मीडिया के ठंडे रवैये से होगा। गोया कि राहुल गांधी में दम नहीं तो उस बेदम में दम मीडिया कैसे फूंक दे? सोनिया गांधी की इस मांग का खूब मान मर्दन हो रहा है। ऐसा होना भी चाहिए।
 
आईएएनएस, ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन सहित सभी मीडिया संगठनों ने सोनिया गांधी की इस मांग को अनुचित बताया है। केंद्र सरकार और विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की ओर से समूची मीडिया के लिए हर साल तकरीबन 2 हजार करोड़ रुपये का विज्ञापन जारी किया जाता है। लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद इस पर कई तरह की बंदिशें लगी हैं। पहले से ही भरी बैठीं सोनिया गांधी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि मीडिया को विज्ञापन बंद कर दिया जाए। यानी मीडिया का गला घोंट दिया जाए। यह लोकतंत्र के प्रहरी पर अंतिम प्रहार होगा।
 
सोनिया गांधी जैसे नेता आखिर इस बात पर सवाल क्यों नहीं उठाते कि सांसदों, विधायकों, विधान पार्षदों को वेतन और फिर फेमिली पेंशन क्यों दी जाएं? वे जनसेवक या जनप्रतिनिधि हैं, कोई सरकारी नौकर नहीं।
 
सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री से यह अपील क्यों नहीं की किसांसदों को मिलने वाले वेतन को बंद कर दिया जाए। इसके एवज में सरकार खजाने में हर साल 2 हजार करोड़ रुपये की बचत होगी।
 
सांसदों, विधायकों, विधान पार्षदों की पेंशन बंद की जाए जिससे तकरीबन 800 करोड़ रुपये की बचत होगी।
 
हर साल सांसद निधि के नाम पर 8 हजार करोड़ रुपये की लूट को सिरे से बंद किया जाए। इस निधि का सिवाय बंदरबाट के कुछ नहीं होता।
 
सोनिया गांधी ने इस पर सवाल क्यों नहीं उठाए कि -
 
एक ही व्यक्ति जो विधायक रहा हो, विधान परिषद में रहा हो, राज्यसभा और लोकसभा का सदस्य भी रहा हो और अगर सरकारी सेवाओं में भी रहा हो तो उसे 5-5 पेंशन क्यों दी जानी चाहिए?
 
क्या ये देश की गरीब जनता की लूट नहीं। यह एक पेशेवर गैंग की दिनदहाड़े लूट है। इसे बंद होना चाहिए
सांसद मर जाए तो उसके परिजनों को ताउम्र पचास फीसदी पेंशन हम अपने पॉकेट से क्यों दें?
 
संसद में यह नियम बनाने से पहले ये नेता चुल्लू भर पानी में क्यों नहीं डूब कर मर गए?