महाराष्ट्र: कोरोना महामारी पर राजनीति भारी

    दिनांक 17-अप्रैल-2020
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राजेश प्रभु सालगांवकर
महाराष्ट्र सरकार में शामिल एनसीपी और कांग्रेस के मंत्री मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की एक नहीं सुन रहे हैं। इस कारण सरकार महामारी का सामना ठीक से नहीं कर पा रही है और इसका नतीजा है कि आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक वायरस पीड़ित मरीज हैं

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मुम्बई के बांद्रा में जमा हुए लोग। इन लोगों को एक साजिश के तहत यहां तक लाया गया था।
आज महाराष्ट्र वर्तमान महामारी का केंद्र बन चुका है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनकी सरकार इस महामारी का सामना करने में नाकाम दिख रही है। इस नाकामी का बड़ा कारण है सरकार में शामिल दलों (शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस) की आपसी राजनीति। लोग महसूस कर रहे हैं कि कांग्रेस और एनसीपी उद्धव ठाकरे के हाथ बांध रही है। इसका एक प्रमाण यह है कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज से महाराष्ट्र आए लगभग 1,000 जमातियों में से अभी भी करीब 150 लापता हैं। उन जमातियों को ढूंढने में एनसीपी का गृहमंत्री नाकाम रहा है।
बांद्रा में साजिश
गत 15 अप्रैल को मुम्बई में बांद्रा तथा थाणे के मुम्ब्रा में बहुत बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए। मुम्ब्रा तो मुस्लिम-बहुल इलाका है। बांद्रा में मस्जिद के सामने कम से कम 5,000 लोग जमा हुए। इनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग थे, लेकिन बताया गया कि उत्तर भारतीय मजदूर अपने घर जाने के लिए रेलवे स्टेशन पर जमा हुए थे। दिलचस्प बात यह दिखी कि इनमें से किसी के पास सामान नहीं था। इसका मतलब तो यही निकलता है कि इन लोगों को किसी ने यहां लाया था। उस स्थान का एक वीडियो वायरल हुआ है। उसमें एक व्यक्ति वहां जमा हुए लोगों को बता रहा है कि 15,000 रु. लेने के बाद ही यहां से निकलना।
दूसरी बात यह है कि बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास पश्चिम की ओर जहां ये लोग जमा हुए थे, वहां से केवल लोकल ट्रेन चलती है। एक्सप्रेस ट्रेन तो बांद्रा टर्मिनस से चलती है, जो उस स्थान से कम से काम तीन किमी दूर पूर्व में है, और वहां से भी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के लिए कोई ट्रेन नहीं जाती। बताया गया कि ये लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर हैं। यह विरोधाभास भी बहुत कुछ कहता है। बता दें कि मुम्बई में रहने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को पता है कि उनके लिए गाड़ियां मध्य रेलवे के लोकमान्य तिलक टर्मिनस (बांद्रा पश्चिम से लगभग 10 किमी दूर) तथा छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (बांद्र्रा पश्चिम से 20 किमी दूर) से चलती हैं। इसलिए बांद्रा में लोगों का जमा होना, एक बहुत बड़ी साजिश लग रही है। इसके पीछे अनेक शातिर हो सकते हैं। इस मामले में पुलिस ने एनसीपी के कार्यकर्ता विनय दुबे (यह मुम्बई मेें रहता है और वाराणसी से चुनाव लड़ चुका है) को पकड़ा है। विनय ने सोशल मीडिया के जरिए उत्तर भारत के मजदूरों को अपने घर भेजने की मुहिम चला रखी थी, जबकि वह जानता है कि तालाबंदी के दौरान यह संभव नहीं है। इसके बावजूद वह अपनी मुहिम में लगा रहा। वह लोगों को खुलेआम भड़काता रहा, लेकिन राज्य सरकार ने उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टे घटना से दो दिन पहले उसने गृहमंत्री अनिल देशमुख से मुलाकत की थी। वह कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से भी मिला था।
बांद्रा की घटना के मामले में पुलिस ने एबीपी माझा (मराठी न्यूज चैनल) के एक पत्रकार राहुल कुलकर्णी को भी पकड़ा है। इसने 15 अप्रैल को एक समाचार प्रसारित किया था कि रेलवे विभाग कुछ जनसाधारण और एक्सप्रेस गाड़ियां चलाने जा रहा है, जबकि प्रधानमंत्री ने उसी दिन बता दिया था कि तालाबंदी 3 मई तक रहेगी। भले ही उस चैनल के पत्रकार को गिरफ्तार किया गया हो, लेकिन चैनल के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई।
अनेक पत्रकारों तथा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विनय दुबे और राहुल कुलकर्णी की गिरफ्तारी केवल दिखावा है। वास्तव में इनकी आड़ में बांद्रा के बड़े साजिशकर्ताओं को बचाने का प्रयास हो रहा है। जानकारों का कहना है कि एनसीपी, कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों में कुछ ऐसे लोग हैं, जो तालाबंदी को असफल करना चाहते हैं, ताकि देश में महामारी फैले और प्रधानमंत्री बदनाम हों। ऐसे नेताओं को न देश की चिंता है, न समाज की। इनका एक उद्देश्य है अपना स्वार्थ सिद्ध करना। विश्लेषक यह भी कहने लगे हैं कि शरद पवार मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की राह में बाधा खड़ी करने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि गृहमंत्री, वित्तमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री, ये तीनों एनसीपी के हैं। उपमुख्यमंत्री अजित पवार ही वित्त मंत्रालय संभाल रहे हैं और स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे हैं। इस संकट से निपटने में इन तीनों मंत्रियों की बड़ी भूमिका है, पर इनके चाल-चलन कुछ और ही बता रहे हैं।
निर्णय पलटने वाले मंत्री
इस संकट के काल में सरकार जो भी निर्णय लेती है, उसे कुछ मंत्री तुरंत पलट देते हैं। सरकार ने निर्णय लिया कि तालाबंदी के दौरान जरूरतमंदों के घर तक अनाज पहुंचाया जाएगा। इस निर्णय को कुछ मंत्रियों के दबाव में दो घंटे में बदल दिया गया। फिर दुकानों को भी घर-घर तक सामान पहुंचाने से मना कर दिया गया। इस कारण जरूरतमंद लोग बाहर निकले और बाजारों में ‘सामाजिक दूरी’ बनाए रखने की नीति की धज्जियां उड़ीं। सरकार ने एक निर्णय यह भी लिया था कि महामारी से मरने वाले हर व्यक्ति के शव को जलाया जाएगा, चाहे वह किसी भी मत-पंथ का हो। इस निर्णय को एक घंटे के अंदर ही एनसीपी नेता और प्रदेश के राज्यमंत्री नवाब मालिक ने पलट दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुस्लिम मृतक को दफनाया जाएगा। नवाब के इस निर्णय पर उद्धव कुछ बोल भी नहीं पाए।
ऐसा लगता है कि सत्ताधारी दलों के तमाम मुस्लिम नेताओं की दबंगई तथा एनसीपी के जितेंद्र आव्हाड जैसे नेताओं की गुंडागर्दी के सामने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे असहाय हो गए हैं। मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में तालाबंदी की धज्जियां उड़ी रही हैं। अन्य इलाकों के निवासियों तक जरूरी चीजें नहीं पहुंचने से लोग बाहर निकल रहे हैं। इस कारण आज मुम्बई माहामारी का केंद्र बन चुकी है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर ‘मातोश्री’ के बाहर ही एक चायवाला वायरस से पीड़ित मिला है। उसके पास उद्धव के कर्मचारी और अंगरक्षक चाय पीते थे। अब सबको अलग किया गया है। ठाकरे अपने चालक को छुट्टी पर भेजकर गाड़ी खुद चलाते हैं।
वधावन कांड
तालाबंदी के दौरान आम लोगों का घर से निकलना मुश्किल है, वहीं येस बैंक तथा पीएमसी बैंक घोटाले के फरार आरोपी वधावन परिवार को (पांच महंगी गाड़ियां तथा 23 लोगों के साथ) गृह सचिव की अनुमति से महाबलेश्वर जाने की अनुमति मिल गई। जब महाबलेश्वर के स्थानीय लोगों ने यह मामला उठाया तो गृहसचिव को छुट्टी पर भेज दिया, लेकिन निलंबित नहीं किया गया।
सरकार की इन हरकतों से शिवसेना के सामान्य कार्यकर्ता भी उबल रहे हैं। कार्यकर्ताओं को भटकाने के लिए सामना के संपादक और सांसद संजय राउत लगातार मोदी सरकार तथा भाजपा के विरोध में लिख रहे हैं। वे कांग्रेस तथा एनसीपी की हरकतों पर कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। इससे भी शिवसेना के कार्यकर्ता नाराज चल रहे हैं।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि कांग्रेस और एनसीपी के नेता उद्धव ठाकरे को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं। इसका खामियाजा पूरा महाराष्ट्र उठा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)