जमात का तमाशा

    दिनांक 17-अप्रैल-2020
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 तब्लीगी जमात की हरकतों से वायरस के सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ा
 
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दिल्ली से लेकर पूरे देश में तब्लीगी जमात का तमाशा जारी है। सेकुलरवाद के नाम पर अक्सर मीडिया ऐसे मामलों पर चुप्पी साध लेता है। लेकिन इस बार शायद जनता का दबाव ऐसा था कि कुछ चैनलों और अखबारों को इस असभ्य जमात की मजहबी पहचान का जिक्र करना पड़ा। डॉक्टरों पर थूकने के मामले हों या मेडिकल टीमों पर हमले, ये ऐसी घटनाएं थीं जिनका बचाव करना उस मीडिया के लिए भी संभव नहीं था, जो अब तक यह काम पूरी लगन के साथ करता रहा है। जिस किसी ने भी जमात के कुकर्मों की कहानी दिखाई उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। ऐसे मामलों में अक्सर मीडिया से मिलने वाले अनैतिक सहयोग का परिणाम है कि मुस्लिम समुदाय अपने गलत कामों को भी सही ठहराने की कोशिश करता है। इस हद तक कि वो गाली-गलौज और धमकियां देते हैं, फिर भी कोई नहीं मानता तो हमला करने से भी पीछे नहीं रहते। ऐसा पहले शायद ही कभी हुआ हो कि समाचार चैनलों के संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन यानी एनबीए को बयान जारी करके कहना पड़ा कि तब्लीगी जमात की तरफ से एंकरों और रिपोर्टरों को धमकियां मिल रही हैं। इस बार तो एनडीटीवी और आजतक जैसे एजेंडाबाज चैनलों के कुछ चुनिंदा पत्रकारों को भी इस ‘मजहबी आतंक’ का सामना करना पड़ा।
 
मीडिया इस स्थिति के लिए सबसे बड़ा दोषी है। कोई भी मामला जैसे ही मजहब विशेष के साथ जुड़ता है उसके लिए खबरों के पैमाने बदल जाते हैं। ऐसा नहीं कि उसकी आंखें खुल गई हों। यह काम अब भी जारी है। वरना कुछ समय पहले तक कथित ‘लिंचिंग’ की कुछ घटनाओं को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटा सेकुलर मीडिया तब चुप्पी मार गया जब प्रयागराज में एक हिंदू को सिर्फ इसलिए गोली मार दी गई, क्योंकि उसने तब्लीगी जमात के विरोध में बोला था। लेकिन जब दिल्ली में एक मुस्लिम युवक को कुछ लोगों ने चायनीज वायरस फैलाने के शक में पीट दिया तो उसकी मरने की अफवाह फैलाई गई। यह काम भी पीटीआई ने किया। इसी तरह बिहार के मधुबनी में 5 अप्रैल को एक बुजुर्ग महिला की उसके मुस्लिम पड़ोसियों ने हत्या कर दी, क्योंकि उसने प्रधानमंत्री की अपील पर दीया जलाया था। लेकिन यह समाचार भी मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं पा सका।
 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मानवीय आधार पर भारत से दवाइयां मांगीं। भारत ने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग ने अफवाह उड़ा दी कि ‘ट्रंप ने भारत को हमले की धमकी’ दी है। मीडिया की फर्जी खबरों के आधार पर ही कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पर हमले बोलने भी शुरू कर दिए।
 
चायनीज वायरस आने के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में भारतीय मीडिया के अंदर छिपे बैठे चीन के एजेंट पूरी कोशिश में हैं कि किसी तरह भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर भ्रम पैदा कर सकें। इसी के तहत ढेरों झूठी खबरें छपवाई गर्इं कि अमेरिका ने जो दवा भारत से मांगी है उसकी कमी है। जबकि सरकार ये सारी जानकारी सार्वजनिक कर चुकी है कि दवा की कोई कमी नहीं है।
 
चायनीज वायरस की सबसे ज्यादा मार महाराष्ट्र में देखने को मिल रही है। रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और उतनी ही तेजी से मीडिया में प्रचार बढ़ रहा है कि उद्धव ठाकरे सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। अब पता चल रहा है कि एक पीआर एजेंसी की मदद से महाराष्ट्र सरकार की तारीफ में खबरें उड़ाई जा रही हैं। जबकि जो सचाई है वह यह कि राज्य में एक घोटालेबाज धन्नासेठ परिवार को पिकनिक पर जाने के लिए 5 गाड़ियों का विशेष पास बन गया। ठाणे में एक इंजीनियर को बुरी तरह पीटा गया, क्योंकि उसने राज्य के मंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर कुछ लिख दिया था। औरंगाबाद में एक डॉक्टर पर पुलिस केस दर्ज हुआ, क्योंकि उन्होंने तब्लीगी जमात की हरकतों को ‘आतंकवाद’ कहने का अपराध किया था। ये सारे समाचार मुख्यधारा मीडिया के विमर्श से गायब हैं। ऐसा कुछ अगर भाजपा शासित प्रदेश में होता तो मीडिया हंगामा मचा रहा होता।
 
उधर बीबीसी हिंदी ने एक बार फिर से भारतीयों के लिए अपनी नस्लवादी सोच उजागर कर दी। अपनी वेबसाइट पर उसने एक कार्टून पोस्ट किया, जिसमें दिखाया गया है कि मास्क पहनना जरूरी करने से देश के गरीबों की हालत और फटेहाल हो गई है। ये बीबीसी के काले अंग्रेजों की करतूत है जो ब्रिटेन में महामारी की खबरों पर पर्दा डाल रहे हैं।
 
खुद उनके देश की सरकार दवा के लिए भारत के आगे कटोरा लेकर खड़ी है। सही कहा गया है कि रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठन नहीं गई।