थूकने और मल फेंकने वालों पर फ़िदा कथित बुद्धिजीविता

    दिनांक 18-अप्रैल-2020   
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सबा नकवी को शायद सुनकर अच्छा नहीं लगेगा कि सिप्ला के मालिक यूसुफ़ के. हामिद स्वयं को “भारतीय यहूदी” कहना पसंद करते हैं, जिनसे सारे जिहादी और मुस्लिम कट्टरपंथी घोर नफरत करते हैं. आरफा खानम शायद थूकते-गंद फैलाते तब्लिगियों के वीडियो सबूतों को “जायनिस्ट” षड्यंत्र बताना चाहेंगी

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जब देश कोरोना से बचने के लिए मास्क लगा रहा है, तब तब्लिगियों के लिए अनेक लोगों ने सेकुलरिज्म के मास्क उतारकर रख दिए हैं. ये लोग तब्लिगियों के बचाव में नए-नए बहाने पेश कर रहे हैं. उनका बस चले तो कह दें कि उनके दुलारे तब्लीगी धरती का तापमान कम करने के लिए यहां-वहां और डॉक्टरों पर थूक रहे थे.
आरफा खानम शेरवानी ऐसी ही तथाकथित सेकुलर पत्रकार हैं. वामपंथी न्यूज़ पोर्टल द वायर के लिए काम करती हैं. तबलीगियों की करतूतें मीडिया सारे देश को दिखा रहा है. इससे आएशा बहुत खफा हैं. जब तबलीगियों की स्तरहीनता के सबूत वायरल होने शुरू हुए तो खानम ने ट्वीट किया “तब्लीगी इस देश के सबसे पढ़े लिखे लोगों में नहीं आते..... लेकिन मैं ये मानने से इनकार करती हूँ कि वो डॉक्टरों पर थूकेंगे या महिलाओं से अभद्रता करेंगे. मैं उन्हें स्वार्थहीन व्यक्तियों के रूप में जानती हूँ, जो भौतिक संसार, यहाँ तक कि उनके परिवारों को भी, मज़हब और उम्मा की खिदमत के लिए छोड़ देते हैं. बंद करो ये प्रोपेगंडा.” शायद आरफा खानम थूकते-गंद फैलाते तबलीगियों के वीडियो सबूतों को “जायनिस्ट” (यहूदी) षड्यंत्र बताना चाहेंगी.
छलावा लफ्जों का
ये लोग शब्दों से खेलना जानते हैं. शुरुआत करें “मैं ये मानने से इनकार करती हूं ..” से. जब सामने वाला सबूत लेकर आ जाए और आपके पास उनका कोई जवाब न हो, लेकिन मानना भी न हो तो कह दीजिए “मैं मानने से इनकार करता हूँ..” अब मान्यता तो मान्यता है. मान्यता है तो तो सबूत पेश करने की ज़रुरत नहीं. सबूत को नकार दो, और अपने सर कोई जिम्मेदारी भी न लो. आएशा खानम ने कह दिया कि “नहीं मानती कि वो डॉक्टरों पर थूकेंगे, महिलाओं से अभद्रता करेंगे.” तो क्या वो दर्जनों डॉक्टर और नर्सें झूठ बोल रही हैं? कैमरे, जिन्होंने इन हरकतों को रिकॉर्ड किया, वो भी झूठ बोल रहे हैं?
ऐसे लोग भारतीयों की सनातन श्रद्धा को आधार बनाकर, प्रचलित शब्दों को ढाल बनाकर, जिहादियों की खाल बचाना जानते हैं. “स्वार्थहीन,.. भौतिक संसार का त्याग” इन शब्दों की भारतीय आध्यात्म जगत और जनमानस में अलग मान्यता है जिसका इस जिहादी सोच से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. यहां स्वार्थहीन उसे कहा जाता है जो मानवमात्र की परवाह करता है. साधु वो कहलाता है जो सारे संसार को अपना मान लेता है. भारत में ‘भौतिक संसार का त्याग’ करने का अर्थ होता है सारी इच्छाओं से ऊपर उठ जाना. परम ज्ञान की खोज करना. ऐसे पके हुए लोगों को विरागी कहा जाता है. बहुत बड़ा संबोधन है ये भारत की आध्यात्म परंपरा में. इसीलिए त्यागी के लिए इतनी श्रद्धा है. इस श्रद्धा के मूल में है जन-जन का ये भाव कि ‘हम जिन संकीर्णताओं में उलझे हुए हैं ये उनसे ऊपर उठ चुके हैं. आत्मविकास के मार्ग पर ये हमसे आगे बढ़ गए हैं. ये शांति को उपलब्ध हुए हैं.”
ये कैसा त्याग, ये कैसी स्वार्थहीनता
आएशा खानम जिन्हें “स्वार्थहीन और भौतिक संसार का त्यागी” बतला रही हैं वो लोगों को सिखाते घूमते हैं कि यहाँ कहाँ एक स्त्री के चक्कर में पड़े हो, जन्नत में तो हर मुसलमान को 72 हूरें मिलने वाली हैं. उन हूरों के अंगप्रत्यंग का वर्णन करते हैं और बहकाते हैं कि धरती की जिन्दगी तो थोड़ी है, कठिनाई भरी है, जन्नत तो अनंत है, अनंतकाल के लिए है. इसीलिए सोशल डिस्टेंसिंग का मज़ाक उड़ाने वाले वीडियो में कुछ मुस्लिम युवक कहते नज़र आते हैं कि “हम मौत से नहीं डरते. हमारी जिन्दगी तो मौत के बाद शुरू होती है.” यही शिक्षा तो आतंकी कैम्पों में लखवी और हाफ़िज़ सईद देते हैं कि ‘मरने से मत डरो, शहादत दो. मौत के बाद बहुत बड़ा इनाम इंतजार कर रहा है.’
ये कैसे “स्वार्थहीन” लोग हैं जो “काफिरों” के लिए नफरत फैलाते घूमते हैं? क्योंकि इस्लाम के शुरुवाती दिनों में, सभी खिलाफतों में काफिरों यानी गैर मुस्लिमों को मुस्लिम शासन में दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ता था. जजिया देना पड़ता था. उन्हें अपने पूजा स्थल बनाने की इजाज़त नहीं थी. पुराने पूजा स्थलों की मरम्मत करने की इजाज़त नहीं थी. घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर रोने की आवाज घर से बाहर आने की मनाही थी. घोड़े या पालकी का उपयोग वर्जित था. अदालत में उनकी गवाही मान्य नहीं थी. यही दुनिया वापस लाना चाहते हैं आपके ये तबलीगी आएशा जी.
तबलीगी जमात दुनिया भर के मुस्लिमों को अरबी तौर तरीकों से जीना सिखाती है. तबलीग का कहना है कि हर मुसलमान को उसी तरह जीना चाहिए जैसा कि इस्लाम के शुरुवाती दिनों में होता था. तबलीगी चंगेजखान,औरंगजेब और टीपू सुलतान की तारीफ़ में कसीदे पढ़ते घूमते हैं और ग़ालिब व तानसेन पर लानत भेजते हैं. यूट्यूब पर तारिक ज़मील और तारिक मसूद के वीडियो मौज़ूद हैं. कोई भी उन्हें सुन सकता है. ये जाकिर नाइक के मुरीद हैं, आरिफ मुहम्मद खान और तारेक फतह से परहेज़ करते हैं. ये लोग वैश्विक इस्लामी भाईचारा और अखिल इस्लामवाद (इस्लामिक ब्रदरहुड और पैन इस्लामिज्म) की बात करते हैं. इस्लाम को देश से बड़ा बतलाते हैं.
अज़ीम प्रेमजी और यूसुफ़ हामिद को मत घसीटो इस गंदगी में
तब्लीगी दुनिया में अनेक सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर हैं. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ये लोग “खालिस इस्लाम” के नाम पर जिहादी आतंक के लिए वैचारिक जमीन तैयार करते हैं. दुनिया में अनेक जिहादी आतंकियों के तार तबलीगी जमात से जुड़े मिले हैं. सबा नकवी भी ऐसी ही एक “सेकुलर” हैं. लेखिका-पत्रकार हैं. वामपंथी झुकाव रखती हैं. 3 अप्रैल को जब दिल्ली के मरकज़ की ख़बरें सुर्ख हो रही थीं तब तबलीगियों के लिए बहाने ढूँढने की होड़ में सबा ने 18 मार्च का वीडियो ट्वीट किया जिसमें लोग मंदिरों में जाते दिख रहे हैं. आशय था कि ‘देखो, हिंदू भी लॉकडाउन तोड़ रहे हैं.’ सच ये है कि तब लॉकडाउन लागू ही नहीं हुआ था. जनता कर्फ्यू भी 22 मार्च को लगाया गया था. सबा ने एक वीडियो जारी किया जिसमें अज़ीम प्रेमजी और दवा कंपनी सिप्ला के मालिक जैसे प्रतिष्ठित व देशभक्त भारतीयों के नाम लेकर तब्लिगियों को आड़ देने की कोशिश की. घुमा-फिराकर तब्लिगियों , थूकने वालों और डॉक्टरों पर हमला करने वालों को लेकर देश में जो गुस्सा है उसे मुस्लिमों के प्रति नफरत साबित किया, और विक्टिम कार्ड खेला. वैसे सबा को शायद सुनकर अच्छा नहीं लगेगा कि सिप्ला के मालिक यूसुफ़ के. हामिद स्वयं को (अपनी यहूदी मां लूबा डरकान्ज्सका के नाम पर) “भारतीय यहूदी” कहना पसंद करते हैं, जिनसे सारे जिहादी और मुस्लिम कट्टरपंथी घोर नफरत करते हैं. उनके पिता भी उदार सोच वाले देशभक्त नागरिक थे. उनकी या अज़ीम प्रेमजी की तुलना तब्लिगियों से करना अपराध है. कोई और बहाना लाएं सबा.
और भी हैं हिमायती
रेडियो मिर्ची की आर जे सायमा को भी तब्लिगियों की खुलती पोल देखकर बहुत मिर्ची लगी. वो मीडिया को “फेक न्यूज़” फैलाने का दोष देने लगीं. कुछ वीडियो गलत सन्दर्भ के साथ हमेशा सोशल मीडिया में घूमते हैं, लेकिन उन्हें आधार बनाकर सच को झुठलाने की साजिश करना कैसी पत्रकारिता है? एक प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ने 17 अप्रैल को एक ब्रिटिश विशेषज्ञ की बात को तोड़मरोड़ कर ‘कोविड 19 इंडिया’ नाम से ट्वीट किया कि “थूकने और बीमारी फैलने की बात अतिरंजित है.” पहली बात तो यह कि यह ‘विशेषज्ञ’ बीमारी/महामारी/चिकित्सा शास्त्र का विशेषज्ञ नहीं है. ये व्यक्ति विशेषज्ञ हैं सामाजिक विज्ञान और अपराध शास्त्र के. और वास्तव में इन “विशेषज्ञ” ने कोरोना वायरस के बारे में कहा ही नहीं था. कथन था कि “एड्स और हैपेटाइटिस ए तथा बी के विषाणु लार में बहुत कम पाए जाते हैं.... “ कोरोना के बारे में कथन था कि “सोशल डिस्टेंसिंग और संवेदनशील व्यवहार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है... हवा में थूकने और जमीन पर थूकने में अंतर है, जो कि बहुत कम होता है. यह समझदारी होगी कि हम किसी भी प्रकार के शारीरिक स्त्राव को बाहर (सार्वजनिक) न फेंकें.”
ये बहानेबाजी, सच को छिपाने- भटकाने –मिटाने की कोशिशें “सेकुलरिज्म” के नाम पर जायज़ ठहराई जाती हैं. स्वास्थ्य अमले पर पत्थर फेंकने, थूकने, और मल-मूत्र फेंकने वालों पर फ़िदा बुद्धिजीविता गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रही है