आनंद तेलतुंबडे की गिरफ्तारी पर क्यों बिफरे हैं लिबरल

    दिनांक 19-अप्रैल-2020   
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सर्वोच्च न्यायालय ने 08 अप्रैल को भूमिगत नक्सली मिलिन्द आनंद तेलतुंबडे के बड़े भाई आनंद आनंद तेलतुंबडे और 47 लाख के ईनामी नक्सली पहाड़ सिंह उर्फ कुमार साय उर्फ राम मोहम्मद सिंह टोप्पो के निशानदेही पर एनआईए की रडार पर आए गौतम नवलखा को गिरफ्तारी से और राहत देने से इनकार कर दिया। उसके बाद प्रोफेसर आनंद तेलतुमडे ने 14 अप्रैल को मुंबई में राष्ट्रीय जांच एजेंसी के सामने और गौतम नवलखा ने दिल्ली में राष्ट्रीय जांच एजेंसी के सामने आत्मसमर्पण किया।
तेलतुमडे और नवलखा पुणे के पास भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के मामले में आरोपी बनाए गए हैं। इन दोनों पर माओवादियों से संबंध रखने और सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप है। इन दोनों पर अनलॉफुल एक्टिविटी (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश और भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को खंगालने के दौरान जांच एजेन्सियों के सामने गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे के अलावा सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, वरवरा राव, वेरनॉन गोंजालविस, सुरेंद्र गाडलिंग, वरवर राव, महेश राउत, रोना विल्सन, फादर स्टेन स्वामी, सुज़ेन अब्राहम, दीपक तेलतुंबडे उसकी पत्नी एंजिला तेलतुंबडे का नाम भी सामने आया था।
गौरतलब है कि नक्सलियों के रिश्ते से इंकार कर रहे आनंद तेलतुंबडे और गौतम नौलखा की वकालत में पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया सामने आया है। 14 अप्रैल को पीएफआई के उपाध्यक्ष ई एम अब्दुल रहमान ने पीएफआई के यू ट्यूब चैनल पर एक बयान जारी किया, जिसमें वे कॅहते हैं कि आनंद तेलतुमडे और गौतम नौलखा की गिरफ्तारी के विरोध में वे यह स्टेटमेंट जारी कर रहे हैं। अपने बयान में श्री रहमान दावा कर रहे हैं कि उन्होंने किसी भी देश विरोधी गतिविधि में या फिर किसी असामाजिक कार्य में इन दोनों की सहभागिता नहीं पाई है।
पीएफआई की तरफ से तेलतुंबडे और नौलखा के पक्ष में आया यह बयान उनके प्रति संदेह को बढ़ाने वाला ही है। इसकी वजह यह है कि पीएफआई की गतिविधियों पर देश भर में इस वक्त सुरक्षा एजेन्सियों की नजर है। संगठन से जुड़े लोग संदिग्ध गतिविधियों में देश भर में गिरफ्तार हो रहे हैं। पीएफआई को प्रतिबंधित संगठन सिमी स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का ही क्लोन माना जाता है। सिमी के प्रतिबंधित होने के बाद उससे जुड़े पुराने रंगरूट पीएफआई के नाम से देश भर में सक्रिय हो गए हैं। ऐसे समय में आनंद तेलतुंबडे और नौलखा को मिला पीएफआई का समर्थन जांच एजेन्सियों के कान खड़े करेगा ही साथ ही साथ अर्बन नक्सली थ्योरी को मजबूती भी प्रदान करेगा।
गौतम नौलखा और आनंद आनंद तेलतुंबडे के पक्ष में एक वीडियो डालते हुए पत्रकार निखिल वागले कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी होने से हमारा देश की न्याय व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाएगा। संविधान से विश्वास उठ जाएगा। निखिल आह्वान करते हैं कि हमें इसका विरोध करना चाहिए। निखिल को समझना चाहिए कि इस समय जो कार्रवाई हो रही है, वह तय प्रक्रिया के अन्तर्गत हो रही है। दोनों ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद एनआईए के सामने जाकर अपनी गिरफ्तारी दी है। दोनों पर माओवादियों से संबंध रखने का आरोप है। निखिल को समझना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरोध का आहवाहन भारत का कोई नागरिक तो नहीं करेगा। यदि उसे न्यायालय के निर्देश को चुनौती देनी है तो इसकी एक तय प्रक्रिया है। जिसके लिए फिर न्यायालय की शरण में ही जाना होगा।
एक यू ट्यूब चैनल के लिए वीडियो बनाते हुए हुए निखिल यह भी कहते हैं कि मान लेते हैं कि आनंद और गौतम की विचारधारा नक्सली विचारधारा है, लेकिन इस देश में हर व्यक्ति को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है।
निखिल जैसे पत्रकार को कैसे यह समझाया जाए कि पत्रकार साहब हर आदमी को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार जरूर है लेकिन देश में एक प्रतिबंधित विचारधारा के साथ सक्रिय रहने वालों के लिए देश के कानून में दंड का विधान भी है। प्रतिबंधित विचार के लिए प्रतिबद्ध लोगों को उस दंड के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
अर्बन नक्सल शब्द से चाहे हमारा परिचय दो साल पुराना हो लेकिन नक्सलियों के बीच इस शब्द की जमीन 16 साल पहले तैयार कर ली गई थी। 2004 में जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) ने'अर्बन पर्सपेक्टिव' नाम से एक दस्तावेज तैयार किया, जिसमें उसने शहर में काम करने की अपनी रणनीति को विस्तार से लिखा। जिसमें शहरी क्षेत्रों में नेतृत्व तलाशने की प्रक्रिया की विस्तृत चर्चा थी।
अर्बन पर्सपेक्टिव नाम के दस्तावेज से गुजरते हुए, एक जगह लिखा हुआ मिलता है— ''अर्बन नक्सलियों का मुख्य कार्य लोगों को संगठित करना, उन्हें राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर शिक्षित करना, उन्नत एवं परिपक्व बनाना, और फिर उन्हें पार्टी में शामिल करना है।''
इस दस्तावेज में पार्टी में शामिल करने के बाद कार्यकर्ता को क्रांति के लिए गांव में जाने के लिए प्रेरित करने की बात भी लिखी गई है।
इस दस्तावेज को पढ़कर लगता है कि सीपीआई (माओवादी) अपने संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ शहरों में नए लोगों को दस्ते में शामिल करने की भी चिन्ता कर रही है। 2004 में आए इस डॉक्युमेंट के मुताबिक, शहरों में मौजूद पार्टी के कार्यकर्ताओं का काम है कि वह शहरी लोगों को इकट्ठा करे और नेतृत्व को एक दिशा दें। दस्तावेज में लक्ष्य समूह का जिक्र भी स्पष्ट शब्दों में किया गया है। दस्तावेज कहता है कि मिडिल क्लास के कर्मचारियों, छात्रों, वर्किंग क्लास, बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पार्टी के काम के साथ जोड़ना है।
दस्तावेज के मुताबिक, शहरों में संगठन को मजबूत बनाने के लिए संसाधन के साथ—साथ संख्या बल से भी मजबूती जरूरी है। इसमें स्पष्ट निर्देश है कि सभी धर्म निरपेक्ष शक्तियों और अल्पसंख्यकों को 'हिंदू फासीवादी ताकतों' के खिलाफ खड़ा किया जाए। दस्तावेज में सैन्य रणनीति का भी जिक्र मिलता है। जिसके अन्तर्गत गांवों में पहले छोटे मिलिट्री बेस बनाने और धीरे-धीरे शहर पर कब्जा करने जैसे षड़यंत्रों की चर्चा है।
इस योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए दो तरह की समितियों का जिक्र किया गया है। पहला कारखाना क्षेत्र की पार्टी समिति अथवा बस्ती क्षेत्र की पार्टी समिति। दूसरे तरह की समिति कॉलेज के छात्रों के बीच जाकर बनानी है। इसमें पार्टी के कितने स्तर और विभाग होंगे। इन सबमें आपस में कैसे समन्वय रहेगा, इसकी भी विस्तार से चर्चा है।
बात शरजील इमाम की…
जामिया में हुए सीएए विरोधी प्रदर्शनों के बीच जेएनयू के छात्र शरजील इमाम का नाम पिछले दिनों चर्चा में आया। वहां चल रहे प्रदर्शन के एक प्रमुख सूत्रधार में शरजील का नाम था। देशद्रोही भाषण और हिंसा भड़काने के आरोप में शरजील इमाम के खिलाफ दिल्ली के साकेत कोर्ट में चार्जशीट दायर की गई। उसकी गिरफ्तारी बिहार के जहानाबाद से 28 जनवरी को हुई थी। यहां इस बात की उपेक्षा नहीं की जा सकती कि जहां भी देश विरोधी कोई गतिविधि हो रही होती है, वहां पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया का नाम अचानक से पाप अप होता है। जामिया के सीएए विरोधी आंदोलन में भी छपी खबरों के अनुसार बहुत सारा पैसा पोपुलर फ्रंट आफ इंडिया ने लगाया।
जिस भाषण को लेकर शरजील इमाम विवादों में आया, उसमें वह पश्चिम बंगाल से पूर्वोत्तर को काटने की बात करता है। 22 किमी का गलियारा जिसे सिलीगुड़ी कॉरीडोर कहा जाता है। उसका ही एक नाम चिकन नेक है क्योंकि मानचित्र में देखने पर यह हिस्सा किसी मुर्गे की गर्दन की तरह ही दिखाई देता है।
अपने भाषण में शरजील कहता है — ''अब वक्त आ गया है कि हम गैर मुस्लिमों को बोलें कि हमदर्द हो तो हमारी शर्तों पर आकर खड़े हों। अगर हमारी शर्तों पर नहीं खड़े हो सकते तो हमारे हमदर्द नहीं। 5 लाख लोग हमारे पास संगठित हों तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ ईस्ट को स्थायी रूप से कट कर सकते हैं, लेकिन स्थायी रूप से नहीं तो हम अस्थायी रूप से कट कर सकते हैं। मतलब इतना मवाद डालो पटरियों पर.. रोड पर कि इनको हटाने में एक महीने लग जाएं। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है। असम और इंडिया कटकर अलग हो जाएं, तभी ये हमारी बात सुनेंगे।
वह इतने पर रूका नहीं, बोलता रहा— ''आपको पता है कि सीएए लागू हो चुका है। लोग डिटेंशन कैंप में डाले जा रहे हैं। वहां तो कत्लेआम चल रहा है। 6 से 8 महीने में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया है। हिंदू हो या मुसलमान, अगर हमें असम की मदद करनी है तो हमें असम का रास्ता बंद करना होगा। चिकन नेक बंद कर सकते हैं। वो जो इलाका है मुसलमानों का है, मुस्लिम बहुल इलाका है।''
सबूतों के आधार पर दिल्ली पुलिस ने उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए और 153ए के तहत मुकदमा दर्ज किया है। शरजील पर भड़काऊ भाषण देने और दंगा भड़काने के आरोप है। आरोप के अनुसार 13 दिसंबर, 2019 को उसने देश को तोड़ने की बात कही थी। इस भाषण के दो दिनों बाद ही 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया नगर और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की थी, इसी हिंसा के दौरान कई बसें जला दी गई थीं और सड़कों पर जमकर तोड़फोड़ भी हुई था।
इस वक्त जिस प्रकार पुलिस और जांच एजेन्सियों की सक्रियता हम सब देख रहे हैं, देखकर तो यही लगता है कि इस समय देश की सुरक्षा की व्यवस्था सही हाथों में है।