क्या सोची-समझी साजिश के तहत दिल्ली बनती जा रही है अराजकता का केंद्र ?
   दिनांक 02-अप्रैल-2020
ले. कर्नल (सेनि.) आदित्य प्रताप सिंह
 देश की राजधानी में फैलती अराजकता और दिल्ली को कट्टरपंथियों द्वारा केंद्र बनाना शुभ संकेत नहीं है। पहले सीएए के नाम पर दिल्ली को जलाया जाना, दंगे भड़काना, और अब निजामुद्दीन के मरकज से मुसलमानों द्वारा पूरे देश में कोरोना फैलाना कई सवाल खड़े करता है।

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दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शन कैसे धीरे-धीरे मुस्लिम समुदाय द्वारा हिंसा का माध्यम बन गए, आश्चर्यचकित करने वाला विषय था। कैसे दिसंबर मध्य में दिल्ली के मुस्लिम बहुल क्षेत्र शाहीन बाग में अराजक तरीके से शुरू हुआ प्रायोजित इस्लामिक प्रदर्शन सीएए विरोध का पूरे देश में प्रतीक बन गया। देश में देखते ही देखते कई शाहीन बाग बनते चले गए। इन प्रदर्शनों को सर्व समाज का प्रदर्शन बनाने का भरसक प्रयास हुआ परंतु सफलता नहीं मिली। इन प्रदर्शनों की आड़ में गैर भाजपा शासित राज्यों में कई जगहों पर मुस्लिम समाज के जिहादियों द्वारा हिंसा की गई। लेकिन धीरे-धीरे शाहीन बाग मुस्लिम महिलाओं की आड़ में राष्ट्र और समाज विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गया। शाहीन बाग के मंच का प्रयोग मोदी विरोध से धीरे-धीरे हिन्दू और हिन्दुत्व विरोध के लिए इस्लामिक अलगाववादियों के साथ-साथ वामपंथियों द्वारा खुलेआम किया जाने लगा। शाहीन बाग की राह चलते हुए दिल्ली सहित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया, लखनऊ के नदवा में प्रदर्शन की आड़ में खुलकर हिंदुओं से आजादी और जिन्ना वाली आजादी के नारे बुलंद किए गए। इस दौरान अराजक तत्वों ने हिंदुओं से घृणा को खुलकर प्रकट किया।
जब दंगों की भेंट चढ़ा दिल्ली

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छोटे-छोटे हिंसक सांप्रदायिक प्रदर्शनों ने 23 फरवरी को दिल्ली में शुरू हुई हिन्दू विरोधी जिहादी हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार की। इस हिंसा में लगभग 50 लोग मारे गए और करोडो़ं-अरबों की संपत्ति क्षतिग्रस्त हुई। इससे बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता कि यह जिहादी हिंसा सुनियोजित थी। मुस्लिम समुदाय द्वारा जिस प्रकार से अस्त्र और अन्य युद्धक सामग्री एकत्रित की गई थी वह पुलिस और खुफिया तंत्र की आंखें खोलने वाली थी। दंगों के बाद यह जरूर जाहिर हुआ कि शाहीन बाग तो मात्र राजनीतिक मोर्चा भर था, असली लड़ाई की तैयारी तो कहीं और की थी।
क्या दिल्ली बनता जा रहा है कट्टरपंथ का केंद्र
सीएए के नाम पर दिल्ली को जलाया जाता है, दिल्ली के कई इलाकों को बंधक बनाकर शाहीन बाग बनाया जाता है, दंगा-फसाद कराया जाता है और अब उसी दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज के मुसलमान पूरे देश में कोरोना फैलाते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर दिल्ली को ही कट्टरपंथी इन कुकृत्यों के लिए क्यों चुन रहे हैं ? जाहिर है राजधानी होने के कारण यहां की एक छोटी भी घटना बड़ा रूप ले लेती है। यही वह कारण है जिसका फायदा अराजक तत्व उठाते हैं। वह अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि धूमिल करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा भी था कि “शाहीन बाग संयोग नहीं प्रयोग है।” क्या उनका इशारा कहीं दिल्ली को लक्षित करके फैलाई जा रही अस्थिरता की ओर तो नहीं था ? अस्थिर दिल्ली का सीधा संबंध भारत की शक्ति, संपन्नता और स्थिरता पर तो पड़ता ही है, साथ ही साथ वैश्विक जगत में उसके सामरिक और राजनीतिक महत्व को भी कम करता है। इस स्थिति से सर्वाधिक लाभ भारत के विरोधी और शत्रु राष्ट्रों को है। पाकिस्तान और चीन मिलकर इसका सम्मिलित लाभ उठा सकते हैं। यहां अस्थिरता बनाए रखने के लिए वह एक साथ काम कर सकते हैं। चीन का पैसा और पाकिस्तान का भारत स्थित मानव खुफिया तंत्र इस कार्य को अत्यंत प्रभावी रूप से कर रहा है। दोनों की जुगलबंदी इस्लामिक अलगाववाद को अपने लाभ के लिए भुना सकती है। हिन्दुत्व के विरुद्ध युद्ध इसी इस्लामिक अलगाववाद को सिंचित करने के लिए ही है।