अफवाह फैलाने में माहिर सोशल मीडिया और सेकुलर मीडिया
   दिनांक 02-अप्रैल-2020
1 अप्रैल सिर्फ तारीख नहीं है। दुनिया भर में एक-दूरसे को झूठी खबर सुनाकर मजाक करने, यानी 'अप्रैल फूल' बनाने की रस्म भी इस दिन से जुड़ी है । क्या आप भरोसा करेंगे कि मीडिया का एक धड़ा यह काम रोज़ करता है! मीडिया में स्वार्थी तत्वों की घुसपैठ को उजागर करना आसान नहीं है किंतु पाञ्चजन्य ने तय किया कि इस एक अप्रैल से प्रतिदिन जनता को झूठी खबर से भ्रमित कर इस समाज और लोकतंत्र का मजाक बनाने वालों का खेल उजागर किया जाएगा। मीडिया में किसी भी पद पर काम कर रहे पत्रकार या जागरूक नागरिक पाञ्चजन्य से सूचनाएं साझा कर इस पहल को मजबूत बनाने में योगदान कर सकते हैं।

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अफवाह
जैसे ही दिल्ली के निज़ामुद्दीन में तब्लीगी मरकज़ में सैकड़ों देसी-विदेशी लोगों के छिपे होने की ख़बर सामने आई मीडिया की सेकुलर ब्रिगेड सक्रिय हो गई। कुछ ही मिनटों में एक अफवाह उड़ा दी गई कि जिस तरह जमात में सैकड़ों लोग थे, उसी तरह वैष्णोदेवी मंदिर में भी 400 श्रद्धालु पाए गए हैं। जो मीडिया अभी तक निज़ामुद्दीन की घटना में मुसलमान की जगह "धार्मिक समुदाय" और तब्लीगी जमात की जगह "धार्मिक आयोजन" जैसे शब्द इस्तेमाल कर रहा था अचानक उसकी बांछें खिल गईं। देखते ही देखते पहले सोशल मीडिया और फिर मुख्यधारा मीडिया पर यह फर्जी समाचार छा गया। न्यूज़ एजेंसी पीटीआई और एनडीटीवी, टाइम्स ऑफ इंडिया और न्यूज़ 18 जैसे संस्थानों ने इसे फैलाने में भरपूर मदद की। बताया कि कोर्ट ने आदेश दिया है कि वैष्णो देवी में फंसे श्रद्धालुओं को निकाला जाए।
क्या थी सच्चाई ?
सच यह है कि चाइनीज़ वायरस के ख़तरे को देखते हुए माता वैष्णो देवी की यात्रा 18 मार्च को ही स्थगित कर दी गई थी। श्राइन बोर्ड ने लोगों से अपील जारी करके कहा था कि फ़िलहाल क़रीब एक महीने तक वो मंदिर न आएं। चूँकि यात्रा अचानक रोकी गई थी और इसके कुछ दिन बाद ही तालाबंदी की घोषणा भी हो गई, इसके कारण कुछ लोग रास्तों में फंस गए। लेकिन ऐसा नहीं था कि वो कटरा या वैष्णोदेवी मंदिर के परिसर में कहीं पर थे। लेकिन यह बात बड़ी चालाकी के साथ छिपा ली गई। हेडलाइन वग़ैरह भी इस तरह लगाई गई कि यही समझ में आए कि ये सारे लोग मंदिर के परिसर में बैठे हुए हैं। सच यही है कि माता वैष्णोदेवी का मंदिर 18 मार्च से बंद है और किसी भी श्रद्धालु को वहाँ जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर बोर्ड ने बयान जारी करके स्पष्टीकरण भी दिया तो उसे वो प्रमुखता नहीं दी गई, जो 400 लोगों के मंदिर में होने का झूठ फैलाने में को दी गई थी।
यही नहीं कई झूठ फैलाए
तब्लीगी जमात के आपराधिक कुकृत्य को सही ठहराने की मीडिया की तरफ़ से संगठित कोशिश हुई। कई और झूठ फैलाए गए ताकि लोगों को भ्रमित किया जा सके। आजतक चैनल ने दावा किया कि आयोजकों ने प्रशासन से बसों वग़ैरह की सुविधा मांगी थी, लेकिन पुलिस ने उनकी अर्ज़ी पर सुनवाई ही नहीं की। लेकिन थोड़ी ही देर में पुलिस ने वो वीडियो जारी कर दिया जिसमें पुलिस उन्हें बुलाकर फ़ौरन जगह खाली करने का नोटिस दे रही है और साथ में बता रही है कि वो लोगों को निकालने के लिए एसडीएम की सहायता लें। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तो खूब घूमा लेकिन सेकुलर मीडिया ने इसे या तो नहीं दिखाया या थोड़ा-बहुत दिखाकर हटा लिया। यह वीडियो सामने आने के बावजूद आजतक चैनल ने "पुलिस की चूक" का रट लगाना जारी रखा। इसी तरह तिरुपति और दूसरे मंदिरों में पूजा-पाठ जारी होने के बारे में भ्रामक ख़बरें सोशल मीडिया पर उड़ाई गईं, जिनके पीछे मीडिया के जाने-माने चेहरों का भरपूर योगदान रहा।