“आप हिंदुओं को मत समझाइये. तब्लीगियों को ट्यूशन दीजिए मोहतरमा.”

    दिनांक 20-अप्रैल-2020   
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“ ये भारत की खुशकिस्मती नहीं है कि उसके पास शाहरुख खान है. ये शाहरुख खान की खुशकिस्मती है कि वो भारतीय है. एहसान मत गिनाइये. ....मीडिया सच क्यों न दिखाए? क्या टोपी-दाढ़ी को फोटोशॉप करके दिखाए ?” .....सुनिए एक बेबाक, भारत प्रेमी, पूर्व पाकिस्तानी को

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आरिफ अजाकिया ने छद्म सेक्युलरों को पढ़ाया ईमानदारी और राष्ट्रीयता का पाठ. 
आरिफ अजाकिया कराची के मेयर थे. कश्मीर में पाकिस्तान की करतूतों का खुलासा किया तो पाकिस्तान से निष्कासित कर दिए गए. अब वो फ़्रांस में रह रहे हैं. भारत से, भारत के लोकतंत्र से और भारत की संस्कृति से प्यार करते हैं. वो परेशान हैं भारत और हिंदुओं को बदनाम करने वाले और इस्लामी कट्टरता को भड़काने वाले लेफ्ट-लिबरल पत्रकारों से.सोशल मीडिया पर मुखर हैं. हाल ही में उन्होंने सबा नकवी, आएशा खानम शेरवानी , राणा अय्यूब जैसे पत्रकारों को तबलीगियों की तरफदारी करने के कारण आड़े हाथों लिया. उन्होंने अकबरुद्दीन ओवैसी और सबा नकवी जैसे “ताजमहल” की धौंस देने वाले मुस्लिम नेतृत्व के तर्कों और दावों को भी तार-तार करके रख दिया. उर्दू और अंग्रेजी में कहे गए उनके बयान को आम भारतीय तक पहुंचाने के लिए थोड़े अनुवाद, थोड़े भावार्थ के साथ पढ़ना होगा.
कीमत कीजिए 136 करोड़ लोगों की कुर्बानी की 
आप कह रही हैं कि भारत में एक समुदाय को “टारगेट” किया जा रहा है. शुक्र करो कि भारत है. ये कोई छोटा सा मामला है? आप इसे आसानी से दरकिनार नहीं कर सकते. 136 करोड़ लोग कुर्बानी दे रहे हैं. घरों में बैठे हुए हैं. कितने लोग तकलीफ उठा रहे हैं. इतने लोगों की कुर्बानी सिर्फ एक समूह के कारण बेकार जा रही है. मुश्किल तो तो वहीँ से पैदा हो रही है न. पथराव हो रहा है. डॉक्टरों से अभद्रता हो रही है. ये आपको दिख रहा है न. पाकिस्तान में भी यही समस्या हो रही है, और एक-एक पत्रकार कह रहा है कि “तब्लीगियों को रोको... तब्लीगियों की वजह से हुआ है..” आप उसको “इस्लामोफोबिया” कह देती हैं?
सबा नकवी, आरफा खानम शेरवानी, राणा अय्यूब .. इन सबकी पत्रकारिता मैं देखता हूँ , कि एक संप्रदाय तक सीमित है. एक संप्रदाय की बेवकूफियों को ढांकने तक सीमित है. बात यहां मूर्खता की हो रही है कि आपके मुल्ला मस्जिदों में दावतें (बुलावा) दे रहे हैं, घरों में, छतों पर मिलकर नमाज पढ़ रहे हैं. गूगल भरा पड़ा है इन सबूतों से. अब यदि मीडिया उन्हें दिखाए तो क्या उन्हें फोटोशॉप (एक फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर) करके दिखाए ? कंप्यूटर पर उनकी टोपी-दाढ़ी हटाकर दिखाए ? मीडिया सच दिखाता है तो आप उसे “इस्लामोफोबिया” बताने लगते हैं?
एहसान मत गिनाइये. भारत का अहसान है सब पर
आप हिन्दोस्तां पर मुसलमानों के अहसान गिनवाने लगती हैं. आपने जो नाम गिनवाए हैं उनमे सबसे पहले हैं शाहरुख खान. शाहरुख खान पाकिस्तान में होते तो कोई जानता क्या ? परले दर्जे के एक्टर ही कहलाते न ? भारतीय हैं इसीलिए दुनिया में मशहूर हो सके. ये भारत की खुशकिस्मती नहीं है कि उसके पास शाहरुख खान है. ये शाहरुख खान की खुशकिस्मती है कि वो भारतीय है. वो कहता है कि मेरे बच्चों का मज़हब हिंदुस्तान है. शाहरुख खान का जितना पैसा है वो उसके बच्चों का है न. ये हिन्दोस्तां ने दिया है. उसमें से उसने कुछ दान किया है तो वो अकेला नहीं है. अक्षय ने भी की, दूसरों ने भी की, बड़ी लिस्ट है. हजार-हजार करोड़ और 15 सौ करोड़ भी दिए हैं न लोगों ने. अज़ीम प्रेमजी खुद को हिंदोस्तानी कहते हैं. आप मज़हब के आधार पर नाम (इन लोगों के नाम ) लेना क्यों शुरू कर देते हैं? हिन्दोस्तां इतना बड़ा बाजार है, जिसकी दुनिया को ज़रुरत है. दुनिया का हर स्टार भारत में काम करना चाहता है. (आप अहसान जताते हो). हॉलीवुड के सितारे यहां काम करना चाहते हैं. दुनिया का हर क्रिकेटर यहां आकर खेलना चाहता है.
इस्लाम में तो एक्टिंग हराम है...
शाहरुख खान के अभिनय को मज़हब से तौलते हो तो इस्लाम में तो एक्टिंग हराम है. शाहरुख खान में टैलेंट है तो उसको उस टैलेंट की बहुत अच्छी कीमत मिली है. जिसे वो भी मानता है. आपने सलमान खान का नाम नहीं लिया. कल आपके उसी “सिंगल सोर्स” पर सलमान ने बहुत बड़ा वीडियो बनाया है. आप कहती हैं कि भारत में मुसलमानों को परेशानी है. भारत में मुसलमानों को परेशानी नहीं है, कुछ मुसलमानों से (बाकी सब को) परेशानी है. जिनकी वजह से भारत की प्रतिबद्धता और एकता को ख़तरा हो रहा है. आम भारतीय को दिक्कत हो रही है. आम मुसलमान को हो रही है. ऐसे मुसलमान भरे पड़े हैं जो ऐसे लोगों (तब्लिगियों) के कारण शर्मिंदा हो रहे हैं. आप जैसे पत्रकारों का फर्ज है कि पहले अपनी कम्युनिटी को (मुस्लिमों को) समझाओ. आपका घोड़ा आपके नियंत्रण में है नहीं और आप उसकी तरफदारी में लगी हुई हैं. पहले उनको तो घरों में बंद करो.
कलाम साहब तो करोड़ों हिंदुओं के रोल मॉडल हैं...

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एपीजे अब्दुल कलाम और आरिफ मुहम्मद खान करोड़ों हिंदुओं के रोल मॉडल हैं.
जहां देखो पथराव, घेराव.. दुनिया में कहीं देखा है कि डॉक्टरों पर पथराव होता हो? ये दुनिया की सबसे बदतरीन कौम है, ये आपकी “सिंगल सोर्स” कौम, जो अपने मसीहाओं को, डॉक्टरों और नर्सों को, पत्थर मार रही है. खुदा का खौफ करो. फिर आप उनकी वकील बनकर आती हैं. आप कहते है कि क्या ए आर रहमान को भारत से निकल जाना चाहिए? किसने कहा भाई (रहमान को निकलने को)? सोशल मीडिया पर पचासों लाख लोग हैं, उनमें से आप दस-पंद्रह लोग निकालकर ले आएं तो वो भारत के आम आदमी का प्रतिनिधित्व नहीं करते. पाकिस्तान में तो मीडिया भरा पड़ा है ऐसे लोगों से. आप तो खुद वहां (भारत में) नफरत की दीवार खड़ी करना चाह रही हैं. भारत में तो मुसलमान राष्ट्रपति रहे हैं. कलाम साहब तो कितने हिंदुओं के रोल मॉडल हैं. आरिफ मुहम्मद खान साहब हैं, कई मुसलमान हैं जिन्हें हिंदू बहुत ज्यादा पसंद करते हैं. वहां उनको (हिंदुओं को) मज़हब तो नज़र नहीं आता. मुद्दा इस्लाम में घुसे हुए मदारी, तमाशेबाज लोगों का है. उन्होंने वहाँ जो खेल खेला है, उसको रोकें. आप पूछ रही हैं कि क्या जावेद अख्तर साहब शायरी लिखना छोड़ दें. जावेद साहब बहुत अच्छे शायर होंगे, लेकिन उनको उनके एक-एक लफ्ज की कीमत दी गई है मोहब्बत के रूप में, प्रशंसा के रूप में, फैन्स के रूप में, और आर्थिक रूप में भी. आप इसे इस्लामिक योगदान के रूप में तो गिनाइये. जावेद अख्तर तो खुद को नास्तिक कहते हैं. आपने उन्हें मुसलमानों की कतार में खड़ा क्यों कर दिया?
क्या ये ताजमहल मंगोलिया से उठाकर लाए थे मुग़ल ?
आप ताजमहल का बड़ा घमंड करती हैं. आप बस इतना बता दें कि क्या ये ताजमहल मंगोलिया से उठाकर भारत लाया गया था? मुग़ल वहां से लेकर आए थे? या वहां से पैसे लेकर आए थे और उससे बनाया था? या वहां से मजदूर लेकर आए थे? या वहां पत्थर लेकर आए थे? इसमें इस्लामी क्या है? या इसमें गैर भारतीय क्या है? लंबी कहानी है ताजमहल की. जिस मुहब्बत की निशानी की आप बात करती हैं वो सोलहवाँ बच्चा जानते हुए मरी थी जिसकी “मोहब्बत” के गम में ये ताजमहल बना था. और उसी “गम” में फिर उसकी बहन से शादी की थी. और शाहजहां ने मुमताज महल के पति को क़त्ल करवाकर फिर उससे शादी रचाई थी. ये है आपकी मोहब्बत की कहानी.
इस्लाम की तारीख को न कुरेदो सबा साहिबा. बहुत गंदगी है इसमें. इसी मुहब्बत के देवता शाहजहां के बेटे आलमगीर औरंगजेब ने गद्दी के लिए भाईयों को क़त्ल किया था. ताजमहल की नींव में लाखों भारतीयों की लाशें हैं. दो-चार नहीं बीस साल लगे थे. हजारों मजदूरों के खानदानों ने कुर्बानियां दी हैं. वो भारतीय थे. वो सारा पैसा भारत का था. मुग़ल बाहर से कुछ लेकर नहीं आए थे, उलटा यहां से भर-भरकर ताशकंद, बुखारा और समरकंद ले गए थे. इसी भारत से लूटकर ले गए थे. तैमूरलंग से सिलसिला शुरू हुआ था. मुगलों की तारीख न गिनवाया करें हमें. और मुगलों का “सेक्युलरिज्म “ भी न दिखाया करें हमें. अच्छी तरह पता है. ..सबसे पहले भारतीय बनो.
“वन्देमातरम” कम्युनल और “अल्लाहो अकबर..” सेक्युलरब?
आपकी बहन आरफा खानम कहती हैं कि भारत माता की जय कम्युनल है, क्योंकि इसमें एक देवी की बात की गई है. अरे भारत माता की जय का मतलब है मातृभूमि भारत जिंदाबाद. इंग्लैंड जिंदाबाद. हर देश का ये नारा होता है. आप इसे कम्युनल कहती हैं, लेकिन जब सीएए के खिलाफ “ला इलाहा इल्ललला..” बोला जा रहा था तो ये ट्वीट करती हैं कि “ला इलाहा इल्ललला..” और “अल्लाहो अकबर..” कम्युनल नहीं हैं, सेक्युलर हैं, क्योंकि ये लोगों के एक समूह को ताकत देते हैं. इस तरह की राजनीति और पत्रकारिता करके आप मुसलमानों को तकलीफ में ही डाल रहे हैं.
मत बहकाओ मुसलमानों को. जिम्मेदार बनो.
आप हिंदुओं को मत समझाइये. आम मुसलमान को ट्यूशन की ज़रुरत है. थोड़ा आपकी कम्युनिटी की “स्टुपिडिटी” पर नज़र डालें. कोरोना वायरस के कुल फैलाव में 33 प्रतिशत अकेले तबलीगी जमात के कारण हुआ है. आप बहाने लेकर आ जाते हो कि सरकार ने क्यों नहीं रोका? क्यों होने दिया? एक कम्युनिटी के रूप में आपकी क्या जिमेदारी है? ताने मारना? एहसान गिनवाना ? ये आप लोगों की जिम्मेदारी नहीं है? वो डॉक्टर किसको बचाने आए हैं? किसी मुसलमान परिवार को ही बचाने आए हैं न जो उन पर पथराव कर रहे हैं?
सबा साहिबा ! आप लोगों की जिम्मेदारी है कि आप मुसलमानों को बताएं कि उनका दुश्मन हिंदू नहीं है. उनका दुश्मन भारत नहीं है. उनका दुश्मन कोरोना वायरस है. आप मुसलमानों को बता रही हैं कि हिंदू तुम्हारा दुश्मन है और भारत सरकार तुम्हारे खिलाफ है. मत करो ऐसा. आपकी सरकार बिना पक्षपात के सबकी सेवा कर रही है. पाकिस्तान में फंसे इग्लैंड के लोग अभी भी नहीं निकल पाए हैं और आपकी सरकार बिना किसी का मज़हब देखे सबको निकाल लाई. पूरी दुनिया में लोग फंसे हैं. आप सबसे पहले अपनी कौम को समझ दें. इसमें सबसे ज्यादा भला मुसलमानों का ही है.