समता के बिना स्वतंत्रता निरर्थक है: बाबासाहेब

    दिनांक 20-अप्रैल-2020   
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भारत रत्न बाबासाहब अंबेडकर के जन्मदिवस को संपूर्ण देश ने अभी-अभी मनाया है | 14 अप्रैल 1891 को महु छावनी में बाबा साहब का जन्म हुआ था। उनके पिताजी वहां सैन्य छावनी में हवलदार के पद पर कार्यरत थे। बाबासाहब के पिता रामजी सकपाल एवं भीमाबाई उनकी माताजी थी। उनका बचपन का नाम भीमराव था
 
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इस समय संपूर्ण विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है। भारत भी इस कोरोना संक्रमण से ग्रसित है। भारत सहित लाखों लोग विश्व भर में कोरोना से प्रभावित है | लगभग 1 लाख 34 हज़ार (लेख लिखे जाने तक) की मृत्यु हो चुकी है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व मे देश की सरकारें कोरोना संक्रमण के प्रभाव को रोकने का सफलतम प्रयास कर रही हैं । बीमारी नियंत्रण में लॉकडाउन एक कारगर शस्त्र बना है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के कारण सामूहिक एकत्रीकरण संभव नहीं है इसी कारण बाबा साहब के जन्मदिन को भी घर-घर माल्यार्पण करके एवं घर-घर दीप जलाकर मनाने का कार्य संपन्न हुआ । मलिन बस्तियों में भोजन कराके एवं फेसकवर देकर भी अधिकांश लोगों ने बाबा साहब को अपनी श्रद्धांजलि दी है।
अपने देश में महापुरुषों को निश्चित वर्ग, क्षेत्र, भाषा एवं जातियों में बांटने का कुत्सित प्रयास हुआ । जबकि महापुरुष किसी एक वर्ग के न होकर संपूर्ण समाज एवं मानवता के होते हैं । महापुरुष के जन्म जयंती को मनाने का उद्देश्य उनके विचारों एवं आदर्शों की प्रासंगिकता क्या है यह होना चाहिए। आज डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर के विचारों पर चर्चा करने की आवश्यकता है ।
जिस समय बाबा साहब भीमराव का जन्म हुआ उस समय हिंदू समाज में अस्पृश्यता (छुआछूत) का वातावरण था । भीमराव भी हिंदू समाज की अस्पृश्य जाति महार में जन्मे थे । इस कारण बाबा साहब को भी इस संकट की अनुभूति जन्म काल से ही हुई थी । प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक अनेक घटनाएं उनके जीवन में आई। कक्षा में शेष छात्रों के साथ न बैठने देना, विद्यालय के नल से स्वतंत्र जल न पीने देना आदि अनेक घटनाएं हृदय को विदीर्ण करने वाली थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करके आने के बाद बाबा साहब को लगता था कि शिक्षा के कारण अब भेदभाव नहीं होगा, लेकिन धर्मशाला में न रुकने देना, ऑफिस का कर्मचारी फाइल भी उनको फेंक कर देता था। ऑफिस एवं विद्यालय में शिक्षण करते समय भी वह सभी के पीने का पानी का उपयोग नहीं कर सकते थे, इन घटनाओं ने उनको और अधिक संतप्त कर दिया।

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ध्येय समर्पित जीवन 
अस्पृश्यता के कारण होने वाली इन सब घटनाओं से वह बहुत व्यथित हुए। इस कारण उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि मुझे अपने इस अस्पृश्य समाज को सम्मान एवं स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार दिलाना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। उनका निष्कर्ष था कि "समता के बिना स्वतंत्रता निरर्थक है"। महाड का सत्याग्रह, नासिक का कालाराम मंदिर आंदोलन, जल एवं मंदिर में प्रवेश का अधिकार सभी को है इसी का द्योतक है । इन आंदोलनों का नेतृत्व उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से किया। हिंसक प्रतिक्रिया होने के बाद भी उन्होंने अपने समाज को हिंसक नहीं होने दिया। इस अस्पृश्य समाज की समस्या के निवारण को वे किस दृष्टि से देखते थे उन्हीं के शब्दों में "अस्पृश्य समाज की समस्या प्रचंड हिमालय के समान हैं। इससे टकराकर मैं अपना सिर फोड़ लेने वाला हुं। हो सकता है हिमालय न ढहे , पर मेरा रक्तरंजित माथा देखकर 7 करोड़ अस्पृश्य उस हिमालय को भूमिसात करने के लिए तैयार हो जाएंगे। " सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक सभी प्रकार से समानता हो इसके लिए बाबासाहब ने अपनी योग्यता क्षमता को अस्पृश्य समाज के उद्धार में लगा दिया | आज का परिवर्तन उनके तप का ही परिणाम है।
धार्मिक वृत्ति 
बाबा साहब की माता जी एवं पिता जी दोनों ही धार्मिक स्वभाव के होने के कारण परिवार का वातावरण धार्मिक था। प्रतिदिन रात्रि को सभी का एकत्रित होकर प्रार्थना करना परिवार का अनिवार्य कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में उनकी बहनें भक्ति स्तोत्र मधुर कंठ से गाती थी l पिताजी कबीरपंथी थे। तीन श्रेष्ठ संत जिनको वे अपना गुरु मानते थे, उनमें संत कबीर दास, संत ज्योतिबा फुले एवं महात्मा बुद्ध हैं तीनों ही संतों ने जाति विहीन समाज निर्माण के लिए प्रयास किया था। अध्ययनशील स्वभाव होने के कारण सभी धार्मिक ग्रंथों का उन्होंने अध्ययन किया। गीता का उदाहरण देकर वह सत्याग्रह की निष्ठा का दावा करते थे। उन्होंने अपने मूकनायक समाचार पत्र के पहले अंक का प्रारंभ संत तुकाराम के जिस अभंग से किया वह था (अब मानूं क्यों भय, खोला मुंह होकर निशंक | जग में गूंगे का कोई नहीं होता, शर्म करने से हित नहीं होता ) " निस्वार्थ भाव से इतने लंबे समय तक जय, पराजय एवं निराशा के वातावरण में वह सक्रिय रह सके, यह उनके आध्यात्मिक होने के कारण ही संभव हो सका।

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शिक्षा दृष्टि - बाबा साहब का निष्कर्ष था कि जब तक अस्पृश्य समाज के युवक शिक्षा प्राप्त नहीं करेंगे वह आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं बन सकते एवं समाज में बराबरी का सम्मान नहीं प्राप्त कर सकते। मुंबई उन्होंने अपने सम्मान के लिए एकत्रित की गई राशि को अस्पृश्य छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए खर्च करा दिया। शिक्षा में ही संस्कार का स्थान हो इस विषय के महत्व को प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि " इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा का महत्व है, लेकिन शिक्षा के साथ ही मनुष्य का शील भी सुधरना चाहिए। शील के बिना शिक्षा का मूल्य शून्य है।" आगे वे कहते हैं "विद्यालय में बच्चों के मन को सुसंस्कारित कर समाज हितोपयोगी बनाना होता है। विद्यालय श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने के कारखाने हैं। "
महिला उत्थान
बाबा साहब समाज की जनसंख्या के इस 50% भाग के उत्थान के प्रति समर्पित थे। महिलाओं की शिक्षा एवं आर्थिक उन्नति के लिए उन्होंने प्रयास किए। अपनी शिक्षा के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता से कटौती करके उन्होंने अपनी पत्नी को पढ़ाने का प्रयास किया। 25 नवंबर 1921 को लंदन से भेजे पत्र में उन्होंने अपनी पत्नी रमाबाई को लिखा है कि ” तुम्हारी पढ़ाई चल रही है यह बहुत प्रसन्नता की बात है।" मैं पैसे की व्यवस्था कर रहा हु , मेरे पास भी पैसे नहीं हैं इसलिए भोजन भी सीमित ही कर रहा हूं। 1942 में नागपुर के शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के अधिवेशन में महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि "समाज की प्रगति को उस समाज की महिलाओं की प्रगति से मापा जा सकता है।" अमेरिका से अपने पिताजी के मित्र को पत्र लिखते समय भी वे लिखते हैं कि "यदि लड़कों की तरह लड़कियों को भी पढ़ाया जाए तो अपने पद दलित समाज की प्रगति अधिक गति से हो सकेगी।" कर्मचारी महिलाओं को मातृत्व अवकाश की व्यवस्था भी महिला सुरक्षा में उनका योगदान है।
आर्थिक तज्ञ एवं मजदूर नेता
डॉ० भीमराव अंबेडकर ने संभाजीराव गायकवाड से उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने से पूर्व समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र के साथ-साथ पब्लिक फाइनेंस पढ़ने की इच्छा व्यक्ति की थी। इनका शोध भी रुपए की समस्या (Problem Of The Rupee) विषय पर था | उस समय के आर्थिक जगत में चलने वाले पूंजीवादी, साम्यवादी एवं समाजवादी व्यवस्था सभी का अध्ययन उन्होंने किया। मजदूर क्षेत्र में कम्युनिस्टों की कार्यशैली की आलोचना करते समय उन्होंने कहा था कि ' मजदूर व ट्रेड यूनियन का उपयोग कम्युनिष्ट अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करते हैं। ' 26 अप्रैल 1929 को मुंबई कपड़ा मिल की हड़ताल का बाबा साहब ने विरोध किया था यह हड़ताल करने वाली यूनियन कम्युनिष्टों की थी। 1936 में बाबा साहब ने स्वतंत्र मजदूर दल भी बनाया था। 1942 से 1946 में वायसराय काउंसिल में श्रम मंत्री रहते हुए बाबा साहब ने मजदूरों के हित में अनेक कार्य किए। मजदूर परिषदों का आयोजन, न्यूनतम वेतन निर्धारण, मजदूरों के लिए कानून, कार्य के घंटे निर्धारण, मजदूरों को सस्ते में कैंटीन, भविष्य निधि जैसी आज की अनेक मजदूरों की सुविधाएं बाबा साहब की देन हैं। सरकारी स्तर पर लेबर कमिश्नर की व्यवस्था भी बाबा साहब ने प्रारम्भ कराई।
समाज सुधारक
बाबा साहब ने अस्पृश्यता निवारण के साथ समाज में प्रचलित अनेक दुर्व्यसनों से दूर रहने के लिए समाज को सचेत किया। शेड्यूलड कास्ट फेडरेशन के महिला सम्मेलन के संबोधन में वे कहते हैं कि आप स्वच्छ रहें, दुर्गुणों से दूर रहें अपने बच्चों को शिक्षित करें, उन्हें हीनता ग्रंथि से दूर करें, उनके विवाह जल्दी न करें। आगे बाबा साहब कहते हैं आप स्वयं को अश्पृश्य न माने। अपना घर साफ रखें। आप सबको पुराने एवं घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए।शराबी पति अथवा पुत्र को घर में प्रवेश न दें। जो पति मरे हुए जानवर का मांस घर में लाए, उसे आप स्पष्ट कहे कि मेरे घर में यह नहीं चलेगा।
राष्ट्रवादी दृष्टि
बाबा साहब संस्कृत के प्रति प्रेम रखते थे, धनंजय कीर लिखते हैं –" बाबा साहब कई बार कहते थे कि संस्कृत भाषा का अभिमान होने के कारण मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि वह मुझे अच्छी तरह आनी चाहिए पर देखना यह है कि वह सुदिन कब आता है | " बाद में बाबा साहब ने संस्कृत का अध्ययन किया। वे कहते थे कि अस्पृश्यता का प्रश्न संपूर्ण हिंदू समाज का प्रश्न है व उसके लिए उच्च वर्ग तथा अस्पृश्य दोनों को कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करना चाहिए। महाड सत्याग्रह के समय भाषण करते समय उन्होंने कहा था कि 'सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह प्रश्न अत्यंत महत्व का है। हिंदुत्व पर जितना अधिकार स्पृश्यों का है उतना ही अस्पृश्यों का भी है। इसी मान्यता को लेकर अछूतों के कार्य में सवर्ण वर्ग के भी अनेक श्रेष्ठ पुरुष उस समय सक्रिय थे | वीर सावरकर , सम्भाजी राव गायकवाड, क्रांतिकारी नेता लोकमान्य तिलक, शाहू जी महाराज एवं गांधीजी सहित अनेक नाम इस श्रेणी में आते हैं। मुंबई के एक कार्यक्रम में लोकमान्य तिलक ने कहा था कि "यदि स्वयं भगवान अस्पृश्यता मानने लगे तो मैं उसे भगवान नहीं मानूंगा " कोल्हापुर के साहूजी महाराज बाबा साहब से सीमेंट कॉलोनी मुंबई में मिलने के लिए आए थे। बाबा साहब को अत्यंत आत्मीयता से गले लगा कर कहा कि अब मेरी चिंता दूर हुई। "दलितों को एक नेता मिल गया |" पुणे करार के बाद ठक्कर वापा को एक पत्र में वे लिखते हैं अस्पृश्यता निवारण का मार्ग हिंदू समाज को समर्थ करने के मार्ग से भिन्न नहीं हैं। निसंदेह मैं कह सकता हु कि अपना कार्य जितना स्वहित का है, उतना ही राष्ट्रहित का भी है। बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के पीछे भी उनकी राष्ट्रीय दृष्टि ही थी , इस कारण उन्होंने इस्लाम एवं ईसाइयत के मार्ग को नहीं चुना। इस्लाम के संबंध में बाबा साहब ने कहा था कि इस्लामी भ्रातृत्व विश्वव्यापी भातृत्व नहीं है, वह मुसलमानों का मुसलमानों के लिए ही है। पाकिस्तान निर्माण के समय दलितों को उन्होंने कहा कि "मैं पाकिस्तान में फंसे दलितों से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो मिले उस मार्ग से व साधन से हिंदुस्तान आ जाना चाहिए l" उत्तेजक परिस्थिति एवं शारीरिक हमले सहन करने के बाद भी उन्होंने समाज में संघर्ष की भूमिका नहीं ली। उनकी स्पष्ट भूमिका थी कि "हमें वर्ग संघर्ष अथवा वर्ग युद्ध उत्पन्न नहीं होने देना है। संपूर्ण समाज की एकता निर्माण होनी चाहिए | उन्होंने बार-बार अपनी भावना प्रकट करते हुए कहा कि ऐसी एकता निर्माण हो सकी तो बाकी बातें ठीक हो सकती हैं |"
संघ के साथ संबंध - पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार जी के द्वारा समाज संगठन एवं संस्कार निर्माण का जो कार्य चल रहा था बाबा साहब उससे परिचित थे। बाबा साहब की धारणा थी कि "सामाजिक समरसता निर्माण हुए बिना सामाजिक समता स्थापित नहीं हो सकेगी।" संघ भी इसी विचार के आधार पर आज तक कार्य कर रहा है | 1935 एवं 1939 में वे पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में आए थे | उनकी डॉ० हेडगेवार जी से भेंट भी हुई थी। वर्ग मे अस्पृश्य समाज के अलग-अलग जाति के 100 से अधिक स्वयंसेवकों को देखकर उनके मन में संतोष भी हुआ था | संघ के अनेक प्रचारकों से उनके संबंध थे । स्व० दत्तोपंत ठेगडी एवं मोरोपंत पिंगले उनमें से प्रमुख नाम हैं | संघ कार्य की गति बढ़नी चाहिए यह उनकी अपेक्षा थी।
संवैधानिक मूल्यों के प्रति समर्पण
बाबा साहब ने राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव भी लड़ा। चुनावों की जय – पराजय, राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले दल एवं कार्यकर्ताओं के संबंध में भी उनके विचार अविस्मरणीय हैं। राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वाले सभी कार्यकर्ताओं को उनका अध्ययन एवं मनन करना चाहिए। उससे हमारा लोकतंत्र और अधिक समृद्ध होगा |
जिस कार्य से बाबा साहब की प्रतिभा का पूर्ण उपयोग देश के लिए हुआ एवं बाबा साहब भीमराव भी सार्वदेशिक हो गए वह उनकी संविधान निर्माण में भूमिका है | बाबा साहब संविधान निर्माण की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे | प्रारूप समिति में उनके शेष सहयोगी अन्यान्य कारणों से सहयोग करने की स्थिति में न होने के कारण समस्त कार्य बाबा साहब को ही करना पड़ा। जिसको उन्होंने पूर्ण कुशलता के साथ निभाया |
इस भीम कार्य के लिए पंडित नेहरू जी एवं सरदार पटेल किसी विदेशी विद्वान सर इवोर जेनिंग को लाना चाहते थे। महात्मा गांधी जी के आग्रह पर यह भीम कार्य भीमराव को देने का निर्णय हुआ। ऑल इंडिया रेडियो से 3 अक्टूबर 1954 को अपने भाषण में डॉ० भीमराव ने कहा कि "वेद निम्नवर्णीय व्यास जी, रामायण महाकाव्य भगवान वाल्मीकि, अब संविधान का दायित्व मुझे मिला है |"
भारतीय परंपरा में भी प्राचीन गणराज्य व्यवस्था एवं उनके संविधान, विश्व भर में लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक व्यवस्थाएं प्रचलित थीं। इन सबका अध्ययन आदि का विचार करते हुए भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़ सकने वाला एवं संकट काल में उचित मार्गदर्शन कर सकने वाला संविधान भारत को मिले यह बाबा साहब की संविधान के संबंध में दृष्टि थी। लोकतंत्र का विचार करते समय बाबा साहब सोचते थे कि "लोकतंत्र का केवल राजनीतिक होना पर्याप्त नहीं है वह सामाजिक एवं आर्थिक भी होना चाहिए। धर्म के संबंध में विचार करते समय उनकी मान्यता थी कि लोकसभा किसी एक विशेष धर्म को लोगों पर लाद नहीं सकेगी, यह एक मात्र मर्यादा संविधान को मान्य है।" धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विसर्जन नहीं।
17 सितंबर 1949 को संविधान समिति में डॉ० अंबेडकर ने कहा था कि "राजनीतिक जनतंत्र आधारभूत सामाजिक जनतंत्र के बिना टिक नहीं सकेगा। सामाजिक जनतंत्र का अर्थ क्या है यह तो स्वतंत्रता, समता, बंधुता को जीवन मूल्य देने वाली पद्धति है। "
अनेक प्रकार के सुझावों को समावेश करते हुए , देश के समस्त प्रश्नों का समाधान कर सकने वाला संविधान उन्होंने हमको दिया। वंचित वर्ग की समस्याएं , समाज के सभी वर्गों का राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में बराबरी, सभी को अपने मत का समान अधिकार आज यह सब जो हमको प्राप्त है उसमें बाबा साहब की दृष्टि है | उनके योगदान को स्मरण करते हुए पं० नेहरू ने संसद में कहा कि "संविधान तैयार करने के विषय में डॉ० अंबेडकर से अधिक चिंता व कष्ट अन्य किसी से नहीं सहन किया।"
संविधान की सफलता उस देश के नागरिकों के व्यवहार पर निर्भर करती है | इसका पालन उन्होंने स्वयं भी अपने जीवन में किया एवं नागरिकों से भी अपेक्षा की। भंडारा के चुनाव के समय दूसरा मत देने से आप चुनाव हार जाएंगे इसलिए हम दूसरा मत नहीं देंगे, उनके अनुयायियों ने निर्णय किया था। तब बाबा साहब ने नाराज होते हुए कहा "मुझे चुनाव में हार स्वीकार है मगर आप लोगों को दूसरा मत खाली छोड़ने की अनुमति नहीं दूंगा। मैंने संविधान तैयार किया है उस संविधान की व्यवस्था में ऐसा गैर जिम्मेदार व्यवहार मैं सहन नहीं कर सकता।"
बाबा साहब ने अपने साक्षात्कार में कहा कि "संविधान की अपेक्षा संवैधानिक नैतिकता का महत्व अधिक है | संवैधानिक नैतिकता रहने पर संविधान की कमियों से कुछ नहीं बिगड़ेगा । परंतु संवैधानिक नैतिकता न रहने पर संविधान कितना भी अच्छा रहे परिणाम कारक नहीं होगा।"
हमारे देश में आज भी अपनी -अपनी मांगों को मनवाने के लिए अनेक प्रकार के हिंसक आंदोलन होते हैं। हिंसा का विचार लेकर अनेक प्रकार के संगठन भी सक्रिय हैं । इस विषय पर अपने विचार रखते हुए बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर जी ने कहा था कि "हमें अपने सामाजिक व आर्थिक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए संविधान से चिपके रहना चाहिए। रक्तरंजित क्रांति के मार्ग को त्यागना होगा। अब जब संवैधानिक मार्ग खुल गया है तब असंवैधानिक मार्ग का समर्थन नहीं किया जा सकता। यह मार्ग दूसरा, तीसरा न होकर अराजकता का मार्ग है इसका जितनी जल्दी हो सके त्यागना ही अपनी दृष्टि से अच्छा रहेगा। "
बाबा साहब ने अपने संपूर्ण जीवन में अनेक प्रकार के कार्य किए | वे अपने समाज के अप्रतिम योद्धा थे। जुझारू पत्रकार, पराक्रमी नेता, कुशल संगठक, अर्थशास्त्री, मजदूर नेता एवं संविधान निर्माता अनेक गुणों का संगम उनमें एक साथ मिलता है। ऐसे महापुरुष का समग्रता से विचार करना आवश्यक है। मेरी उनको विनम्र श्रद्धांजलि।
( लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री हैं )