कोराना महामारी के बाद करुणा और कृतज्ञता ही बचाएगी इंसानियत को

    दिनांक 21-अप्रैल-2020
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कैलाश सत्यार्थी
कोविड-19 की महामारी के बाद दुनिया में बहुत कुछ बदलेगा। अच्छा और बुरा दोनों। शायद इंसानों की उपयोगिता और महत्व भी कम हो जाए। लेकिन तभी इंसानियत की जरूरत सबसे ज्यादा पड़ेगी, जिसे करुणा, कृतज्ञता और दयालुता से ही बचाकर रखा जा सकता है

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लॉकडाउन और कोरोना वायरस की महामारी के दौरान जो लोग अपने-अपने घरों में बंद रहकर स्‍वस्‍थ और सुरक्षित हैं, उन्हीं में तनाव, अवसाद, निराशा, हताशा, झुंझलाहट और घरेलू हिंसा की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। दूसरी ओर दुनिया के करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी खतरे में है। लाखों दिहाड़ी व प्रवासी मजदूर सरकारी या गैर सरकारी भोजन के भरोसे जगह-जगह शिविरों में पड़े हुए घर भागने के लिए तड़प रहे हैं। हां, अनिश्चितता का खौफ सभी को है।
आपदाओं के दौरान उनसे निजात दिलाने वालों के प्रति आमतौर पर आभार का उफान आता है, परंतु उनके खत्म होते ही वह भावुकता गायब हो जाती है। धन्यवाद देना या आभार प्रकट करना एक तात्कालिक भावनात्मक शिष्टाचार बनकर रह जाता है। परंतु, इन्हीं हालातों में कृतज्ञता जैसा चमत्कारी गुण भी पनपाया जा सकता है। हम जानते हैं कि कोविड-19 की महामारी के बाद दुनिया में बहुत कुछ बदलेगा। अच्छा और बुरा दोनों। शायद इंसानों की उपयोगिता और महत्व भी कम हो जाए। लेकिन तभी इंसानियत की जरूरत सबसे ज्यादा पड़ेगी, जिसे करुणा, कृतज्ञता और दयालुता से ही बचाकर रखा जा सकता है।
सामाजिक-आर्थिक संतुलन के लिए ही नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्थायित्व और सतत विकास के लिए भी वंचित, शोषित और कमजोर वर्गों के प्रति अपनी मानसिकता, व्यवहार और संबंधों में बुनियादी बदलाव कराना होगा। जरा सोचिए कि जिन घरों में हम सुरक्षित बैठे हुए हैं, वे किसने बनाए ? उनकी एक-एक ईंट-पत्थर, सीमेंट, रंग-रोगन, लोहे-लक्कड़ और बिजली-पानी जैसी सुविधाओं में आखिर किनका खून और पसीना लगा है ? आप जो कपड़े पहने हुए हैं, उनको बनाने की लंबी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर कितने लोगों की मेहनत लगी है? जिन चीजों का भी इस्तेमाल आप करते हैं, वे आपमें से ज्यादातर लोगों ने नहीं बनाईं। आपकी जिंदगी को चलाने के लिए जो भोजन आपकी प्लेट में सजा होता है, उसे यहां तक पहुंचाने में ऐसे अनगिनत लोगों की जिंदगियां खप रही हैं, जिन्हें आप जानते तक नहीं। उनमें सिर्फ पकाने वाले ही नहीं, खाने में इस्तेमाल होने वाली हरेक चीज, जैसे अनाज, दूध, तेल, घी, चीनी, मसाले, और सब्जियां पैदा करने वालों और ढोने तथा बेचने वालों की लम्बी श्रृंखला है। वे हिंदू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मण, महिला—पुरुष, काले—गोरे आदि कोई भी हो सकते हैं। क्या हम कभी उनका कोई एहसान मानते हैं ? उत्पादन, बिक्री और मुनाफे की श्रृंखला शोषण की श्रृंखला होती है, जबकि उसे कृतज्ञता की श्रृंखला होना चाहिए।
मैं इसलिए यहां कृतज्ञता के उस जरूरी मानवीय गुण पर जोर दे रहा हूं, जो व्यक्ति और समाज को बेहतर बना सकता है। यदि हम ईमानदारी से यह महसूस करने लगें कि हमारा वजूद केवल हमारे कारण नहीं है, बल्कि इसमें बहुत लोगों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी है, तो हमारा पूरा व्यक्तित्व और चरित्र ही बदल सकता है। एक-दूसरे के प्रति सम्मान, परस्पर जिम्मेदारियों का एहसास, हर तरह के भेदभाव से छुटकारा, विनम्रता, नैतिक जवाबदेही और समानता जैसे गुण कृतज्ञता से उपजते हैं। कृपा करने में देने वाले का हाथ ऊपर और लेने वाले का नीचे बना रहता है, जिससे निजी अहंकार और सामाजिक ऊंच-नीच बढ़ती है। इसी से मिलता-जुलता भाव दया का है। दया के भाव से संतुष्टि और सुख मिलता है, लेकिन दाता होने का अहंकार पैदा नहीं होता। इन दोनों से अलग कृतज्ञता की भावना है, जिसमें मदद या किसी के भी काम आने वाला खुद को उपकृत मानता है। कृतज्ञ होने और ऋणी होने की भावनाएं एक जैसी लगती हैं, इसलिए उनमें बड़ा फर्क है। कर्जदार के मन में कर्ज उतारने का दबाव रहता है परंतु जरूरी नहीं कि कर्जदाता के लिए सम्मान का भाव हो। कृतज्ञता में दबाव नहीं, आत्मिक सुख और सम्मान महसूस होता है।
लॉकडाउन के चंद दिनों पहले की एक घटना है। मुझे किसी से पता चला था कि पंजाब में मेरे एक पुराने साथी जय सिंह गंभीर रूप से बीमार होकर अस्पताल में पड़े हैं। वे बचपन बचाओ आन्दोलन (बीबीए) की नींव के एक पत्थर हैं जो सन् 1981 में बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने वाली पहली छापामार कार्रवाई में मेरे साथ शामिल हुए थे। हालांकि कुछ सालों के बाद ही उन्होंने अपना अलग संगठन बना लिया था। पिछले तीन-चार साल से तो मुलाकात या बातचीत तक नहीं हो सकी थी। 2-3 दिनों में ही सुमेधाजी मैं और संगठन के कुछ वरिष्ठ साथी लुधियाना के अस्पताल में उनसे जाकर मिले। अस्पताल के मालिक और सभी वरिष्ठ डॉक्‍टर हमें वहां देखकर अचंभे में पड़ गए। जयसिंह जी के परिवार को भी भरोसा नहीं था कि हम इस तरह वहां पहुंचेंगे। मैंने उन सभी को बताया कि हमारा आंदोलन और मैं आज जहां भी हूं, वह जयसिंह जी जैसे साथियों के त्याग के बगैर संभव नहीं था। दिल्ली लौटते वक्त मैं चिंतित जरूर था, फिर भी थोड़ा-सा कुछ कर पाने से मन में बहुत बड़ा संतोष और चैन था।
हमारे वहां पहुंचने से पूरे अस्पताल ने जी-जान से जुटकर जय सिंह का इलाज और सेवा की। कुछ हफ्तों बाद वे स्वस्थ होकर अपने घर लौट गए। अभी-अभी उनका फोन आया था। वे रुंधे हुए गले से आभार जता रहे थे। मुझे बड़ा अच्छा लगा। मैंने उनसे कहा कि हमने तो कोई उपकार नहीं किया, बल्कि हम खुद चालीस सालों से आपके प्रति कृतज्ञ बने हुए हैं। वे खुशी में रो पड़े। दरअसल हम दोनों ही एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता के भाव से संतुष्ट और खुश थे।
सन 2010 की एक और घटना है। बाल आश्रम में हमारे रिहाइशी भवन का उद्घाटन करने के लिए हमने निर्माण मजदूरों, मिस्त्रियों और उनके परिवारों को बुलाया था। यज्ञ वेदी पर ब्राह्मणों की जगह उन्हीं को नए कपड़े बगैरह देकर बैठाया। हम यजमान की जगह बैठे। फिर उन्हें पंगत में बैठा कर प्रत्येक के पैर छूकर दक्षिणा दी। उसके बाद आश्रम के सारे निर्माण कार्यों में तेजी और गुणवत्ता तो बढ़ी ही, वे हमारे परिवार का अंग बन गए। सन् 2015 में उन्होंने हमारी बेटी के विवाह में आपस में चंदा इकट्ठा करके उपहार भी भेजा था। इस तरह आपसी कृतज्ञता का रिश्ता प्यार का रिश्ता बन गया।
सभी मत—पंथों में अलग-अलग तरह से कृतज्ञता का महत्व समझाया गया है। ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए प्रार्थनाएं और पूजा पद्धतियां बनाई गईं। परन्तु अक्सर देखने में आता है मानवीय भावनाओं का पांथिकीकरण हो जाने से उनका अर्थ ही खो जाता है। वे दिखावा, रिवाज, खुदगर्जी या उपदेशबाजी बन कर रह जाती हैं। दयालुता, कृतज्ञता और करुणा के साथ यही हुआ। मनोवैज्ञानिक शोधों से कई मजेदार खुलासे हुए हैं। यह जरूरी नहीं कि ?पांथिक व्यक्ति कृतज्ञ भी हों, लेकिन कृतज्ञ व्यक्ति में सभी मत—पंथों में निहित मूल मानवीय गुण जरूर होते हैं। इसी तरह हर सुखी व्यक्ति कृतज्ञ नहीं होता, परन्तु हर कृतज्ञ व्यक्ति खुद को सुखी समझने वालों से कहीं ज्यादा सुखी रहता है।
हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों में सुबह उठने से लगाकर रात को सोने तक के लिए किसी न किसी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए प्रार्थना के मंत्र मौजूद हैं। इनमें सुबह धरती पर पहला कदम रखते वक्त पृथ्वी को मां मानकर आभार प्रकट किया जाता है और क्षमा भी मांगी जाती है। भोजन का पहला निवाला तोड़ने से पहले ईश्वर के साथ-साथ उसे बनाने वालों का धन्यवाद किया जाता है। रात को सोने से पहले उन सभी के उपकार को याद किया जाता है, जिन्होंने दिनभर में किसी भी रूप में हमारी मदद या खुशी देने का कोई भी काम किया हो। करोड़ों हिन्दू परिवारों में उम्र से बड़े व्यक्तियों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा उनके एहसानों के लिए कृतज्ञता ज्ञापन ही है। माता—पिता और शिक्षकों का सम्मान करना दिखावे के लिए नहीं, बल्कि उनके उपकारों को याद रखने के लिए ही सिखाया जाता है।
मैं सोचता हूं कि भारत की सभ्यता और संस्कृति के विकास में दया, करुणा और कृतज्ञता के मूल्य बड़ी गहराई से रचे-बसे हैं। जिन-जिन पेड़-पौधों से छाया, भोजन और औषधियां मिलती हैं, हजारों साल से हमारे पूर्वज न केवल उनका उपकार मानते रहे, बल्कि श्रद्धा-भाव में पूजा तक करने लगे। बड़, पीपल, तुलसी आदि को काटना तक पाप माना जाता है। पशु-पक्षियों से लगाकर नदियों, पहाड़ों, पत्थरों जैसे निर्जीव पदार्थों में भी जीवन की ही नहीं, ईश्वर तक की कल्पना करके उन्हें पूजा जाने लगा। हर मंगल कार्यों में सूर्य, चंद्रमा सहित सभी ग्रहों और नक्षत्रों को पूजना अब तो कोरा ढकोसला बन चुका है, लेकिन असलियत में तो उसके पीछे की मूल भावना पूरे सौरमंडल के उपकार को याद करते रहना ही थी। हमारे शास्त्रों में तो प्रत्येक नए दिन को ईश्‍वर का वरदान माना जाता है। हर नया दिन खुद को और समाज को बीते हुए कल से बेहतर बनाने के लिए प्रकृति का उपहार होता है, इसके लिए उन सबको धन्यवाद देना चाहिए जिनके कारण जीवन की निरंतरता बनी रहती है।
हम देखते हैं कि ‘आभार’ और ‘थैंक्यू’ जैसे शब्दों का बाजारीकरण करके खूब मुनाफा कमाया जाता है। जाहिर है कि ये शब्द ग्राहकों के मन को सुकून देते हैं। होटलों, एयरलाइनों, रेस्त्राओं और दुकानों आदि में ग्राहकों के प्रति धन्यवाद और आभार जताने से उनकी कमाई बढ़ती है। इन पर बाजार शास्त्र में लगातार अध्ययन चलते रहते हैं। अमेरिका में जौहरियों पर किए गए ऐसे ही एक अध्ययन से पता चला कि जिन्होंने खरीदारी के बाद अपने ग्राहकों को फोन या मेल से धन्यवाद किया था, उनके पास 70 प्रतिशत ग्राहक दोबारा सौदा करने आ गए। किन्तु, जिन्होंने सामान पर सेल की बार-बार सूचना पहुंचाई, उनके 30 प्रतिशत ग्राहक ही लौटे। इस तरह कृतज्ञता भी कमाई का जरिया बन चुकी है।
कई समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि कृतज्ञ व्यक्तियों में ज्यादा सृजनात्मकता, उत्पादकता, नेतृत्व के गुण और सहनशीलता होती है। वे दूसरों के मुकाबले ज्यादा खुशमिजाज, धैर्यवान, उम्रदराज, स्वस्थ, सकारात्मक और समाज में सम्मानित व्यक्ति होते हैं। इसका सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि वे आत्मग्लानि, डिप्रेशन, आत्मक्षुद्रता और ईर्ष्‍या जैसे नकारात्मक मनोभावों से मुक्त रहते हैं। उसके वैज्ञानिक कारण भी हैं। कई शोधों से पता चला है कि कृतज्ञ व्यक्तियों के मष्तिष्क की न्यूरोएलास्टिसिटी अधिक होती है। मष्तिष्क की कोशिकाएं ज्यादा व्यवस्थित और मजबूत होती हैं। यह भी देखा गया है कि उमंग और उत्साह लाने वाला एन्डोरफिन नामक दीमागी हार्मोन ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। इससे नए न्यूरोट्रांसमीटर उत्पन्न होते हैं जो हमें ज्यादा बुद्धिमान और प्रसन्नचित बनाते हैं।
कोरोनावायरस से लड़ने के लिए और उसके बाद की चुनौतियों का मुकाबला सिर्फ करुणा से ही संभव है। जब तक हम दूसरों की परेशानियों और कष्टों को अपने दुख की तरह महसूस करके उनके निराकरण की कोशिश नहीं करते, तब तक खुद को और दुनिया को नहीं बचा सकते। दरअसल करुणा ही न्याय, समता तथा मानवीय गरिमा के लिए हुई क्रांतियों और सभी मत—पंथों की पहली चिंगारी थी। करुणा एक चिंगारी है, तो उसे दीपक की तरह जलाए रखने के लिए कृतज्ञता के तेल और दयालुता की बाती की जरूरत है। दयालुता और कृतज्ञता के पंखों से करुणा उड़ान भरती है। आज कृतज्ञता को जीवन शैली बनाने और उसका व्यापक समाजीकरण की जितनी जरूरत है शायद पहले कभी नहीं थी। भारत के पास दुनिया को देने के लिए ‘नमस्कार’, ‘योग’, आध्यात्मिक उपदेशों और ‘कृष्णभक्ति’ के अलावा और भी बहुत कुछ है। कृतज्ञता की जीवनशैली और संस्कृति का निर्माण उनमें से एक है।
(लेखक नोबेल शांति पुरस्कार से सम्‍मानित विश्व प्रसिद्ध बाल अधिकार कार्यकर्ता हैं।)