मोहतरमा ! ...वहां न पत्थर चलाने की छूट है, न मुंह चलाने की

    दिनांक 21-अप्रैल-2020   
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राणा अयूब जैसे पत्रकार एजेंडे के तहत भारत में मुसलमानों पर काल्पनिक अत्याचारों का वीभत्स चित्र खींचने और पाकिस्तान के पापों को ढांकने में लगे हैं. बलात्कारी, करोड़ों के हत्यारे, नस्लभेदी, जिहादी पाकिस्तानी स्थापना की तरफदारी ऐसे लोगों के असली इरादों को जाहिर कर रही है. इनके झूठों का पर्दाफ़ाश ज़रूरी है

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भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर झूठ और नफरत का जहर उगलने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक गिरोह है, जिसे दुनिया में वामपंथी और पेट्रो डॉलर वाले इस्लामी मुल्कों के लिए किराए पर काम कर रहे विश्व मीडिया के पत्रकार हाथों हाथ लेते हैं. उन्हें भारत विशेषज्ञ के रूप में टॉक शो में बुलाया जाता है. बड़े विदेशी अखबारों में उनके लेख छापे जाते हैं. इनमें से ही एक नाम है राणा अयूब. राणा अयूब दिन प्रतिदिन अपने ट्विटर अकाउंट से भारत को मुसलमानों का नरक साबित करने में जुटी हैं. कभी-कभी अयूब से भारत के लिए अपनी नफरत छिपाना कठिन हो जाता है. जब भारत में कोरोना वायरस के मामले सामने आने लगे थे, तब 16 मार्च को राणा अयूब ने ट्वीट किया “एक नैतिक रूप से भ्रष्ट देश में वायरस से मरने के लिए बचा ही क्या है?” ऐसे पत्रकारों को वामपंथी ब्रिगेड खूब सर चढ़ाती है. ऐसे पत्रकारों की पाकिस्तान में भी खूब पूछपरख होती है. जब उत्तरप्रदेश में पुलिस ने सीएए विरोधी दंगाइयों को नियंत्रण करने के लिए कार्रवाई शुरू की तो इस तथाकथित पत्रकार ने उसे “इस्लामोफोबिया” बताया.
जहरीले झूठ
इन दिनों राणा अयूब के एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में घूम रहा है. जिसमें अयूब ने कहा है कि “इस देश में हर दिन, भारत के मुसलमानों को याद दिलाता है कि हमने 1947 में पाकिस्तान की जगह भारत को चुनकर गलती की..” अयूब कश्मीर, शाहीनबाग़, मुरादाबाद और इंदौर के पत्थरबाजों के लिए पुलिस और सुरक्षाबलों पर लांछन लगाती हैं. सच ये है कि यदि ये पत्थरबाजी पाकिस्तान के किसी शहर में होती तो पाक फौज और उसके रेंजर पूरे इलाके को रौंद डालते. सच ये है कि पाकिस्तानी एस्टब्लिश्मेंट सिर्फ पंजाबी मुसलमानों को पाकिस्तानी मानता है. बलूचिस्तान और पख्तूनख्वा में उसके फौजी मुसलमानों को दाढ़ियों से पकड़कर सड़क पर घसीटते हैं. बलात्कार करते हैं. आईएसआई के गुर्गे यहाँ लोगों को अगवा करते हैं, और टुकड़ों में वापस करते हैं. उन्हें दोषी या निर्दोष से मतलब नहीं होता. उनका मकसद होता है खौफ कायम करना. राणा अयूब का ये ट्वीट बेहद आपत्तिजनक है.इस ट्वीट के सतह पर आने के बाद ऐसे पाकिस्तान परस्त लोगों और उनके दुष्प्रचार का पर्दाफ़ाश ज़रूरी हो गया है.
पाकिस्तान की असलियत पूछो मुहाजिरों से
पाकिस्तान मुहाजिरों की लाशें नोच रहा है, और राणा अयूब जैसे लोग पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हैं. ऐसे लोग पाकिस्तान के वहशीपन को ढंकने के लिए भारत पर गंद उछालते हैं.पाकिस्तान की असलियत कराची में रह रहे मोहाजिरों (47 में भारत से गए मुसलमानों) से बेहतर कोई नहीं बता सकता.
आज मुहाजिर भारत विभाजन को इतिहास का सबसे बड़ा हादसा बताते हैं. वो खुलकर कहते हैं कि पाकिस्तान आकर हमारे पुरखों ने गलती की. हम हिंदुओं के साथ बहुत खुश थे. जिन्ना के जिन्न ने हमें बहका दिया. जिहाद करते-करते जहन्नुम में आ पहुँचे. एमक्यूएम के लोग विभाजन को गुनाह और पाप कहते हैं. सन 47 में बड़े अरमानों के साथ ये लोग हिजरत करके अपने सपनों के इस्लामी नखलिस्तान, पाकिस्तान में पहुंचे थे. लेकिन पहुंचने पर उन्होंने पाया कि यहां उनके लिए कोई जगह नहीं थी. भेदभाव सब तरफ था, जो कभी ख़त्म नहीं हुआ. शुरू से सारी सरकारी नौकरियां पंजाब वालों को दे दी जाती हैं. पाक के सबसे ताकतवर संस्थान, पाक फौज में 90 प्रतिशत भर्तियां केवल पंजाब से की जाती हैं. मुहाजिरों, सिंधियों, बलूचियों को न तो वहां की केंद्र में नौकरियां मिलती हैं और न ही उनके अपने राज्यों में. सिंध के पुलिस वाले भी पंजाब से आते हैं. प्रशासनिक नौकरियों में भी लाहौर, सियालकोट और इस्लामाबाद वाले हावी हैं. न्यायपालिका में भी यही हाल है.
मुहाजिरों को सरकारी लोग गाहे-बगाहे कह देते हैं कि तुम हिंदुस्तानी हो, यहां आए क्यों ? वापस चले जाओ. पाकिस्तान के मुहाजिरों की राजनैतिक पार्टी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) को पाक फौज ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है. एमक्यूएम का दावा है कि पाक फौजियों और पाकिस्तानी रेंजरों ने कराची में 25 हजार मोहाजिरों की हत्या की है और विरोध में आवाज उठाने वाले मुहाजिरों की स्त्रियों को यौन दासी (सेक्स स्लेव) तक बनाया गया है. मुहाजिरों की हत्या करने के लिए जिहादी आतंकी संगठनों का भी इस्तेमाल पाक फौज करती है. खौफ फैलाने के लिए लोगों को अगवा करके बेरहमी से यातनाएँ देकर मारा जाता है. फिर उनके क्षत-विक्षत शव उनके परिवार को दे दिए जाते हैं. कुछ लोग बस, गायब हो जाते हैं. उनका कभी पता नहीं चलता.
“पाकिस्तान मुहाजिरों, सिंधियों, बलूचों और कश्मीरियों का शमशान है.”
एमक्यूएम के मुखिया अल्ताफ हुसैन 1992 से पाकिस्तान से निष्कासित हैं, और ब्रिटेन में रह रहे हैं. अल्ताफ हुसैन को मुहाजिरों के हक़ की माँग उठाने के एवज़ में ये निष्कासन झेलना पड़ा है. आईएसआई अल्ताफ की जान के पीछे पड़ी है. अल्ताफ हुसैन को पाकिस्तान से खदेड़ने के बाद एमक्यूएम के कार्यालयों को ढहा दिया गया. चुनाव में जब वोटिंग होती है तो पाक फौज और पाक रेंजर्स मुहाजिरों को वोट देने से रोकते हैं. टीवी पर अल्ताफ हुसैन का फोटो दिखाने या अल्ताफ हुसैन का नाम लेने की भी मनाही है. यही हाल प्रिंट मीडिया में भी है. आज अल्ताफ हुसैन और उनकी पार्टी के अन्य नेता जो पाकिस्तान से भागकर दुनिया के दूसरे देशों में रहकर पाकिस्तान का पर्दाफ़ाश कर रहे हैं वो सभी दुनिया के जिम्मेदार नेताओं से पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट करने, उसकी सभी तरह की फंडिंग रोकने और उसे आतंकी देश घोषित करने की माँग कर रहे हैं. वो न केवल मुहाजिरों, बल्कि सिंधियों, बलूचों, पश्तूनों, गिलगित-बाल्टिस्तान और तथाकथित “आज़ाद” कश्मीर (पीओजेके) के लिए भी आज़ादी माँग रहे हैं. एमक्यूएम की निष्कासित नेता कहकशां हैदर का कहना है कि पाकिस्तान मुहाजिरों, सिंधियों, बलूचों और कश्मीरियों का शमशान है.
या पूछो हिजरत करने वाले बंगाली मुसलमानों से...
47 में बंगाल से भी बहुत से मुसलमान तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान याने आज के बंग्लादेश में हिजरत करके गए. पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद उनसे बंगला भाषा छीनी गई, उर्दू थोपी गई. फिर बंगालियों के शोषण का सिलसिला शुरू हुआ. न नौकरी, न उद्योग, न पुलिस में जगह, न प्रशासन में. फौज में बैठे पंजाबी मुसलमान, सत्ता में बैठे पंजाबी मुस्लिम अफसर उन्हें नोचते. बंगाल के संसाधनों को निचोड़कर इस्लामाबाद और रावलपिंडी को सजाया जाता रहा. उनके वोट की ताकत को भी तानाशाह दबाते रहे,और जब उन्होंने बगावत करने की कोशिश की तो पाकिस्तानी फौज ने 40 लाख बंगालियों को काट डाला. 4 लाख लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार किया और इसे बंगालियों की “नसल सुधारने” का नाम दिया.
1970-71 पाक फौज ने अपने ही लोगों के साथ वो किया जो दुनिया के इतिहास में कभी किसी सेना ने नहीं किया था. 71 की लड़ाई में भारत के सामने हथियार डालने वाले इन हत्यारे फौजियों को शिमला समझौते के अंतर्गत छोड़ दिया गया, और फिर पाकिस्तान लौटने के बाद इन नृशंस कातिलों ने सन 74 में बलूचिस्तान में हैवानियत का नंगा नाच किया. बलूच आबादी पर बमबारी की. टैंक, तोपखाने और सैनिक हैलीकॉप्टरों से सैकड़ों गांवों को भस्म कर दिया. राणा अयूब जैसे लोग कश्मीर में कुछ दिनों के लिए नेट बंद होने पर छाती पीटते रहे थे.बलूचिस्तान में आज भी कहीं नेट नहीं है. नेट वहां पहुंचा ही नहीं, कंटोनमेंट को छोड़कर. यानि फौजियों के घरों और ऑफिस को छोड़कर कहीं भी नहीं. पाकिस्तान के पापों को एक लेख में समेटना असंभव है. पाकिस्तान की सचाई बहुत भयानक है.
इसलिए मोहतरमा ! यदि आपने हिजरत की होती और आज पाकिस्तान में मुहाजिर बनकर रह रही होतीं, तो अच्छी तरह समझ लो कि वहां न पत्थर चलाने की छूट है न मुंह चलाने की. वैसे सच यह है कि आपको भी ये सब पता है.