कोरोना के सेकुलर मसीहा की सचाई

    दिनांक 21-अप्रैल-2020
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कोविड19 का टीका बनाने के लिए शोध कर रही टीम की अगुवाई डेविड बी वीनर कर रहे हैं जबकि एनडीटीवी ने दावा किया कि फ़राज़ ज़ैदी इस टीम की अगुवाई कर रहे हैं।
आपको याद होगा जब गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में मस्तिष्क ज्वर से बच्चों की मृत्यु हुई थी तब सेकुलर मीडिया कफ़ील खान नाम के एक डॉक्टर को ढूंढकर लाया था। बताया गया कि वो डॉक्टर अकेले दम पर बच्चों की जान बचा रहा था। ऐसे बताया गया मानो इस मानवीय त्रासदी में डॉक्टर कफ़ील खान कोई मसीहा हो। लेकिन बाद में पता चला कि वो उस पूरे कांड का खलनायक था। अब जब कोरोनावायरस के संक्रमण से पूरा देश जूझ रहा है मीडिया का वही वर्ग नए-नए 'सेकुलर मसीहा' ढूंढने में लगा है। इसी प्रयास के तहत पिछले दिनों एनडीटीवी इंडिया ने अमेरिका के एक तथाकथित भारतीय मूल के वैज्ञानिक का इंटरव्यू किया। बताया गया कि प्रयागराज के रहने वाले फ़राज़ ज़ैदी अमेरिका में उस टीम की अगुवाई कर रहे हैं जो कोविड19 का वैक्सीन (टीका) बना रही है। सुनने में लगेगा कि ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है लेकिन जो सच्चाई सामने आ रही है वो कुछ और ही है। दरअसल एनडीटीवी ने ये पूरा झूठ गढ़ा था ताकि इसके नाम पर वो यह जता सके कि महामारी के इस समय में मुस्लिम समुदाय जो बर्ताव कर रहा है वो बिल्कुल उचित है। अगर वो महामारी फैला रहे हैं तो क्या हुआ, दवा भी तो ढूंढ रहे हैं।
फ़र्ज़ी निकली फ़राज़ ज़ैदी की कहानी

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हमने इस बारे में अमेरिका में फिलाडेल्फिया के विस्तार इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों से जानकारी मांगी, तो पता चला कि फ़राज़ ज़ैदी वहां पर प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम करते हैं। प्रोजेक्ट मैनेजर कोई वैज्ञानिक पद नहीं है जो वैक्सीन की खोज कर रहा हो। यह एक तरह का कोऑर्डिनेटर या समन्वयक होता है, जो टीम में आपसी तालमेल का काम करता है। विस्टार इंस्टीट्यूट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी देख सकता है कि फ़राज़ ज़ैदी नाम का यह व्यक्ति वहाँ पर वैज्ञानिक के तौर पर दर्ज नहीं है। डेविड बी वीनर नाम के वैज्ञानिक इस टीम की अगुवाई करते हैं। जबकि चैनल ने दावा किया कि ये टीम फ़राज़ ज़ैदी की है। संस्थान की वेबसाइट पर आप देखेंगे तो पता चलेगा कि प्रोजेक्ट के लीड साइंटिस्ट अमी पटेल नाम के एक भारतीय हैं। मानसी पुरवार नाम की एक अन्य भारतीय वैज्ञानिक इसी टीम का हिस्सा हैं। लेकिन एनडीटीवी ने ऐसे जताया मानो ये पूरी टीम फ़राज़ ज़ैदी ही चला रहे हों। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने अमी पटेल या मानसी पुरवार का नाम तक नहीं लिया। एनडीटीवी की फैलाई ये फ़र्ज़ी ख़बर देखते ही देखते दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत तमाम अख़बारों में भी पहुंच गई। भारत पहुँचाने से पहले इसे अमेरिका के कुछ ऐसी वेबसाइट पर भी पोस्ट कराया गया जो पैसे लेकर कुछ भी छापने को तैयार रहती हैं।
मज़हब के आधार पर हीरो बनाने की होड़
समझना मुश्किल नहीं कि फ़राज़ ज़ैदी के मुसलमान होने के कारण एक नैरेटिव बनाने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल किया गया। इस खेल में फ़राज़ ज़ैदी भी शामिल थे जिन्होंने संभवत: बिना अपने संस्थान की अनुमति के एनडीटीवी को इंटरव्यू दिया और ऐसे जताया मानो वही मानवता की सेवा में जी-जान से जुटे हैं। चैनल के विवादित पत्रकार ने इंटरव्यू करते समय यह भी जताने की कोशिश की मानो फ़राज़ ज़ैदी ने वैक्सीन की खोज कर ली हो। यह ठीक उसी तरह है जैसे कफ़ील खान जैसे संदिग्ध अपराधी को नायक की तरह प्रस्तुत करना। कुछ दिन पहले सेकुलर पत्रकारों की इसी ब्रिगेड ने यह झूठ भी फैलाया था कि भारतीय दवा कंपनियों सिपला और वॉकहार्ट के मालिक मुसलमान हैं। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सिपला के मालिक यूसुफ़ हामिद ख़ुद की मुस्लिम पहचान को ख़ारिज करते रहे हैं। बताया जाता है कि वो अपनी माँ के धर्म यहूदी से जुड़े हुए हैं। इसी तरह वॉकहार्ट के मालिक हबील खोराकीवाला को भी मुसलमान बताया गया, जबकि वो दाऊदी वोहरा हैं। जिन्हें सुन्नी और शिया मुसलमान अपने मज़हब का नहीं मानते। प्रश्न यह भी उठता है कि मीडिया का यह सेकुलर गिरोह आख़िर एक ख़ास मज़हब को मानवता का सेवक साबित करने के लिए इतना प्रयासरत क्यों है?
महामारी के नाम पर कमाई का खेल
सच्चाई यह है कि इस समय दुनिया भर के हज़ारों शोध संस्थान कोविड19 का टीका ढूंढने में जुटे हैं। इनमें भारत भी शामिल है। कुछ यूरोपीय दवा कंपनियाँ तो टीका बनाने के काम में काफ़ी आगे तक पहुँच चुकी हैं। इस होड़ के पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वो मानवता की सेवा से ज़्यादा फंड का है। विश्व की तमाम एजेंसियाँ इन दिनों कोविड-19 के वैक्सीन की खोज पर करोड़ों रुपये का अनुदान दे रही हैं। सबको लग रहा है कि अगर उन्होंने इसे बना लिया तो वो इसका पेटेंट हासिल करके रातोंरात मालामाल हो जाएँगे। ऐसे में सरकारी संस्थानों के प्रयासों को छोड़ दें तो जो निजी कंपनियाँ इस क्षेत्र में प्रयासरत हैं उनका उद्देश्य मानवता की सेवा से ज़्यादा मोटी कमाई की उम्मीद है। विस्टार लैब भी ऐसा ही एक संस्थान है। अब वहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी को मानवता का महान सेवक साबित करने की यह सेकुलरी प्रवृत्ति ही बताती है कि उनका एजेंडा क्या है।