पृथ्वी दिवस पर विशेष: प्रकृति की सुरक्षा सबकी जिम्‍मेदारी

    दिनांक 22-अप्रैल-2020
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अमित झालानी
पृथ्‍वी के गर्भ से विभिन्‍न प्रकार के खनिज, ईंधन, धातु, रत्‍न और यहां तक कि पानी का भी दोहन करके इनसानों ने इसे खोखला कर दिया है। मनुष्य प्रकृति से अपना संबंध पहचान ले तो वह उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता। इस समग्र और एकात्म दृष्टि और इसके अनुरूप व्यवहार से ही प्रकृति सुरक्षित रह सकती है

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भारतीय धर्मशास्त्रों में एक आख्यान मिलता है, जिसमें पृथ्वी स्वयं पर हो रहे अत्याचार और दोहन से पीड़ित और दुखी है। उसके नेत्रों से आंसुओं की धार ऐसे बह रही है जैसे किसी मां के पुत्र-वियोग में आंसू। उस समय राजतंत्र हुआ करता था। चूंकि राजा धर्मात्मा और सर्व सामर्थ्यशाली था, इसलिए उसने पृथ्वी को आश्वस्त कर उसे पुनः संवर्धित कर दिया। आज यह पृथ्वी माता फिर से चीत्कार कर रही है। रत्नगर्भा के उदर से तेल, पानी, कोयला, पत्थर, रत्न और धातुओं को खोद-खोदकर उसे खोखला कर दिया गया है। जल, मिट्टी या वायु, सब प्रदूषित हैं। पूरी प्रकृति त्रस्त है। एक ओर दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे महानगरों में वायु का गुणवत्ता सूचकांक 300 (अति अस्वस्थ श्रेणी) के पार जा रहा है, तो दूसरी ओर गंगा, यमुना, कावेरी, पंचगंगा और गोदावरी दम तोड़ती हुई प्रतीत होती है। गंगा, गोदावरी और यमुना के जल प्रवाह में 50 प्रतिशत से भी अधिक की कमी दर्ज की गई है।
यह सब परिस्थितियां तो वर्तमान की 7.8 अरब आबादी के साथ है। संयुक्त राष्ट्र का मानना है 2050 तक विश्व की जनसंख्या 9.7 अरब से अधिक हो सकती है। किसी ठोस नीति और योजना के अभाव में बढ़ती आबादी बहुत बड़ी त्रासदी सिद्ध हो सकती है। एक शोध के अनुसार जीवों की 95 प्रतिशत प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं और बहुत सी अन्य लुप्त होने के कगार पर है। यह घटती जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन के लिए जो संकट पैदा करेगी, उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेली मधुमक्खी 400 से अधिक प्रकार की फसलों की पैदावार में सहायक होती है। यदि पृथ्वी से कीट-पतंगों को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए तो पृथ्वी पर जीवन मात्र 50 वर्षों में समाप्त हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि पृथ्वी तो हमारे बिना और भी बेहतर तरीके से चलेगी, परंतु इस पृथ्वी के बिना हम एक क्षण भी नहीं रह सकते।
सृष्टि को टुकड़ों में देखकर व्यवहार करना ही आज की सबसे बड़ी समस्या है। सृष्टि और मैं, दो अलग अस्तित्व नहीं है। जैसे पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी, झरने, तालाब और पर्वत इत्यादि प्रकृति का हिस्सा हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी प्रकृति का ही एक हिस्सा है। मनुष्य स्वयं में प्रकृति और सृष्टि है। मनुष्य अपने अभिन्न समझे जाने वाले माता-पिता, मित्र और सगे संबंधियों से तो अलग रह सकता है, परंतु प्रकृति से अलग नहीं। पेड़ जो ऑक्सीजन देते हैं, उसी से हम जीवित हैं। जब सिर में चोट लगती है तो हाथ उसकी रक्षा करता है और जब कान में दर्द होता है तो आंखें आंसू बहाती हैं। अंग जानते हैं कि वे एक ही शरीर का हिस्सा हैं और शरीर के बिना उन का कोई अर्थ नहीं। इसी प्रकार, यदि मनुष्य प्रकृति से अपना संबंध पहचान ले तो वह उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता। इस समग्र और एकात्म दृष्टि व इसके अनुरूप व्यवहार से ही प्रकृति और जीवन सुरक्षित रह सकते हैं। जिस विश्व रूपी विराट पुरुष की कल्पना वेदों ने की है, वह प्रकृति ही है। इसी सिद्धांत के आधार पर हम सदियों से नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की पूजा करते आ रहे हैं। इसी भाव को ध्यान में रखकर राजस्थान की वीरांगना अमृता देवी बिश्नोई ने वृक्षों के लिए अपने समाज के 363 बंधुओं के साथ आत्म बलिदान कर दिया। अकेले ही लाखों पेड़ लगाने वाले प्रकृति पूजक दरिपल्ली रमैया हों या पर्यावरण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले बाबूलाल दहिया, तुलसी गौड़ा, जमुनाटूडू, सालुमरदाथिमक्का, जिन्‍हें पद्मश्री से सम्‍मानित सम्‍मानित किया गया।
पदार्थ सीमित हैं और इच्छाएं असीम। संपूर्ण पृथ्वी का राज्य मिल जाए तो भी क्या इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं? महात्मा गांधी ने कहा है कि प्रकृति के पास इतना तो है कि हम सबकी आवश्यकताएं पूरी हो सके, पर इतना नहीं कि लोभ शांत हो सके। आज जनतंत्र है और जनता ही सर्वसामर्थ्यशाली। लोकतंत्र की अपनी सीमाएं हैं और इसलिए अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसियों से लेकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कलेक्टर आदि कोई योजना, अभियान और आंदोलन तो चला सकते हैं, परंतु व्यक्ति को बाध्य नहीं कर सकते। जिस प्रकार कोरोना त्रासदी से बचाव में प्रत्येक व्यक्ति अपनी सशक्त भूमिका निभा रहा है, उसी प्रकार पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी प्रत्येक व्यक्ति नेतृत्व करना होगा। हमें यह तय करना होगा कि जीवन के लिए आजीविका है, आजीविका के लिए जीवन नहीं है। दिशाहीन आर्थिक विकास और बेहतरीन संसाधनों से युक्त लाइफ स्टाइल से जीवन नहीं चलता, जीवन तो चलेगा निर्मल बहते पानी, स्वच्छ-सुगंधित वायु और रसायनमुक्त पौष्टिक भोजन से। वास्तव में यह समस्या प्रकृति या सृष्टि की नहीं, मानव के मन और मस्तिष्क से उपजी है। इशोपनिषद् में लिखा है, “ईशावस्यम् इदंसर्वं यत् किंचित जगत्याम् जगत...” अर्थात जड़-चेतन प्राणियों वाली यह संपूर्ण सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार ही भोग करे और त्याग की भावना रखते हुए उनका संग्रह कभी ना करें।
(लेखक मालवीय राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान में ऊर्जा संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर शोध कार्य कर रहे हैं।)