कांग्रेसी चैनल के झूठ का कांग्रेस से नाता

    दिनांक 23-अप्रैल-2020
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एबीपी माझा चैनल ने मुंबई में झूठी खबर फैलाई, पर सिर्फ संवाददाता को बलि का बकरा बनाकर जेल भेजा
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अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में मीडिया का एक वर्ग कैसे माफिया की तरह काम करता है, इसका नमूना पिछले दिनों दिखा। मुंबई में एबीपी माझा चैनल के संवाददाता को लॉक डाउन के बाद ट्रेन चलने की झूठी खबर फैलाने के आरोप में जेल भेजा गया। उसी की खबर पर बांद्रा रेलवे स्टेशन पर हजारों प्रवासी मजदूर पहुंच गए थे। ऐसी झूठी खबरें तो रोज ही फैलाई जाती हैं, पर कभी किसी संवाददाता की गिरफ्तारी नहीं हुई। खबर झूठी थी, पर क्या इसके लिए केवल संवाददाता दोषी है? यह चैनल कांग्रेस समर्थक माना जाता है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने में इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। इसी ने गठबंधन का नाम ‘महाशिवआघाड़ी’ रखा था। ऐसा तो नहीं कि चैनल के संपादकों और मालिकों को बचाने के लिए संवाददाता को बलि का बकरा बनाया गया ताकि राज्य सफलता की विफलता को ढका जा सके?
 
संवाददाता की गिरफ्तारी पर ‘पत्रकारिता की जेबी संस्थाओं’ की चुप्पी संयोग नहीं है। बात-बात पर लोकतंत्र की हत्या का शोर मचाने वाले पत्रकार भी चुप हैं। दरअसल एबीपी माझा में इस अफवाह की पृष्ठभूमि पहले से तैयार की जा रही थी। फर्जी खबरों सबसे बड़ी फैक्ट्री पीटीआई ने 4 अप्रैल को खबर दी कि रेलवे 14 अप्रैल से ट्रेन चलाने की तैयारी कर रही है। लेकिन रेलवे ने इसका खंडन करते हुए कहा कि अभी ऐसी कोई तैयारी नहीं है, जब होगी तो सूचित किया जाएगा। इसी से पता चलता है कि दिल्ली के आनंद विहार की तर्ज पर मुंबई में भी पलायन की पटकथा लिखी जा रही थी, जिसमें मीडिया शामिल था।
इंडिया टुडे चैनल ने कथित स्टिंग आॅपरेशन में बताया कि दिल्ली और ग्रेटर नोएडा के मदरसे में कई बच्चों को एक साथ रखा गया है। चैनल के सूत्रों ने बताया कि यह स्टिंग उतना ही नकली था जितना कुछ दिन पहले इसी चैनल का जेएनयू का स्टिंग आॅपरेशन। बताया जा रहा है कि मौलवियों से अनुमति लेकर यह स्टिंग किया गया था। दावा किया जा रहा है कि इसमें जो दिखाया गया उसे कुछ मौलवियों को पहले दिखाया गया था। इंडिया टुडे और आजतक चैनल ने बीते कुछ साल में मुसलमानों से मजहबी भेदभाव और उन पर हमले की जितनी झूठी खबरें फैलाईं उतनी किसी ने नहीं फैलाई होंगी। यही चैनल क्रिकेट के मैदान में होने वाले झगड़े को हिंदू-मुस्लिम का रंग दे चुका है। ऐसे में यह स्टिंग आॅपरेशन डूब चुकी विश्वसनीयता को बचाने और लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं था।
 
जो मीडिया तब्लीगी जमात का नाम लेने से डर रहा है, उससे मदरसों के स्टिंग आॅपरेशन की उम्मीद बेकार है। वह तो तब्लीगी जमात और कट्टरपंथियों की करतूतों पर पर्दा डालने में जुटा है। आंध्र प्रदेश में एक परिवार के संक्रमण का समाचार इंडियन एक्सप्रेस ने छापा। अंदर एक लाइन जोड़ दी कि परिवार जमात से जुड़ा था। लेकिन खबर के साथ तिलक लगाए हिंदू नवदंपत्ति की फोटो छापी। मीडिया का यह चिर-परिचित खेल है जिससे वह मजहबी करतूतों को छिपाकर हिंदुओं के विरुद्ध दुष्प्रचार करता रहा है। इसी अखबार ने खबर छापी कि अमदाबाद में मजहब के आधार पर मरीजों को अलग-अलग रखा जा रहा है। कारवां मैगजीन ने छापा कि मोदी सरकार ने लॉकडाउन बढ़ाने का फैसला भारतीय चिकित्सा परिषद से बात किए बिना लिया, जबकि उसकी अनुशंसा पर ही यह निर्णय हुआ। दैनिक जागरण ने एक तस्वीर छापकर झूठ फैलाने की कोशिश की कि आगरा के सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों के पास मास्क और सुरक्षा पोशाकें नहीं हंै, जबकि जिस डॉक्टर की तस्वीर छापी गई उसका चाइनीज वायरस के मरीजों कोई संबंध नहीं था। इसी तरह, झूठ फैलाया गया कि भदोही में एक महिला ने भूख के कारण अपने 5 बच्चों नदी में फेंक दिया। आजतक ने दिल्ली में सेना के एक पूर्व अधिकारी की महामारी से मौत की ब्रेकिंग न्यूज चलाई। उक्त अधिकारी ने ट्वीट कर बताया, ‘मैं जीवित और स्वस्थ हूं’ तब भी चैनल ने खेद नहीं जताया। उधर, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट अपने देश से ज्यादा भारत को नीचा दिखाने में रुचि ले रहे हैं। बीबीसी हिंदी ने कार्टून छापा, जिसमें भारत को फटेहाल दिखाया। इसी ने भारत में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की कमी होने का झूठ फैलाया, जबकि अगले ही दिन ब्रिटिश सरकार इस दवा के लिए भारत के आगे हाथ फैलाए खड़ी थी। भारत के प्रति पश्चिमी मीडिया का रवैया हमेशा से नकारात्मक रहा है। खुद उनके देश महामारी की चपेट में हैं और भारत उनकी सहायता कर रहा है तब भी उनका एजेंडा जारी है।