यह युद्ध है, इसे सैनिक लड़ेंगे

    दिनांक 23-अप्रैल-2020
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राजीव मिश्रा की फेसबुक वॉल से
 

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दिल्ली से बिहार, उत्तर प्रदेश के मजदूरों की भगदड़ और पलायन का दृश्य देख कर लोगों का कवि हृदय जाग गया है। लॉजिक (तर्क) और कॉमन सेंस (व्यावहारिक बुद्धि) की जगह करुण रस बह रहा है। हाय गरीब, हाय गरीब का रुदन सुन रहा हूं।
मेरे अंदर का कवि दुख और गरीबी देख कर नहीं जागता। इतना भी क्रूर नहीं हूं कि दूसरों के दुखों की आंच पर अपनी संवेदनाओं के पराठे सेंकूं। अगर सचमुच इतनी ही संवेदना होती तो उन्हीं गरीबों के बीच रह कर उनका इलाज कर रहा होता, उनके जैसा जीवन जी रहा होता। वह संवेदनशील कवि किसी के हृदय में नहीं बसता जो एक गरीब के परिवार को अपने साथ अपने खाने की मेज पर ले आए। उतने संवेदनशील आप भी नहीं हैं और मैं भी नहीं हूं। सबने अपने-अपने जीवन के निर्णय व्यावहारिकता के आधार पर लिए हैं, संवेदनाओं के आधार पर नहीं। इसलिए उस कवि को सोने ही दें और व्यावहारिकता की बात करें।
 
दिल्ली में रहने वाले बिहार और उत्तरप्रदेश के लोग भूखे-प्यासे थे, इसलिए भाग रहे थे। इस तथ्य को मान लूं? बिहारी हूं, इसलिए बिहारी की मानसिकता को इतना तो समझता ही हूं। बिहारी जहां इतने साल से रह रहा हो, वहां उसने इतना सपोर्ट सिस्टम विकसित नहीं किया होगा, यह मानने वाली बात है? बिहारी युवक दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के बाद जब एक सूटकेस लेकर पहुंचता है तब तक वह किसी को नहीं जानता। लेकिन पांच साल में ही वह छात्रसंघ का चुनाव लड़ लेता है, कारोबार का रास्ता खोज लेता है और रिश्तेदारी कायम कर लेता है। अगर कोई बिहारी दिल्ली में तीन सप्ताह गुजारा करने के लिए साधन-संसाधन नहीं खोज पाता तो वह बिहारी कहलाने लायक नहीं।
 
नहीं, इस भगदड़ के पीछे किसी मजबूरी से ज्यादा बड़ी बात है एक मानसिकता, जिसे बिहार में कहते हैं ‘भेड़ियाधसान’। छुट्टी हो गई, घर चलो। एक चला तो सभी चल पड़े। पीछे से हुल-हुल करके आपियों ने उनकी भीड़ बढ़ा दी। बिहारियों के इस ‘भेड़ियाधसान’ के पीछे उनकी मजबूरी की भूमिका उतनी ही है, जितनी विदेश से भाग कर वापस आ रहे भारतीयों के पीछे उनकी ‘देशभक्ति’ का।
 
 
गरीबी हर बात का बहाना नहीं है। गरीबी एक बीमारी है और मूर्खता दूसरी बीमारी है। यह ऐसा है कि डायबिटीज के मरीज को टीबी हो गया है। दोनों बीमारियां एक साथ हो सकती हैं, यह एक्सक्लूसिव बात नहीं है। गरीब आदमी ही मूर्ख नहीं होता है और मूर्ख आदमी हमेशा गरीब नहीं होता है। मूर्खता पर किसी वर्ग का विशेष दावा नहीं है। हवाई जहाज से आए या लाए गए लोग, जो क्वारंटाइन से भागे और और पार्टियों में शामिल हुए, वह उनके हिस्से की मूर्खता थी। आनंद विहार की भीड़ उनके हिस्से की मूर्खता है। पहले ने माचिस जलाई, जबकि दूसरे ने पेट्रोल छिड़क दिया। किसी ने माचिस जलाई तो मैं पेट्रोल क्यों ना छिड़कूं? मैं गरीब हूं तो मुझे मूर्खता का अधिकार नहीं है? यह तर्क जिन्हें आकर्षक लगता हो वे बेशक यह तर्क दें, मुझे तो ठीक नहीं लगा।
 
संवेदना बहुत ही सुंदर और महत्वपूर्ण चीज है, पर वह कितनी होनी चाहिए? दाल में नमक बराबर। सिर्फ स्वाद भर। अभी के हालात को देख कर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने चुटकी के बजाय मुट्ठी भर कर नमक डाल दिया है। किसी को दुख नहीं देना चाहिए। सुई देने पर, आईवी लाइन लगाने पर दर्द होता है। क्या एक डॉक्टर को इतना संवेदनशील होना चाहिए कि वह किसी को सुई ही ना दे सके? बच्चे का रोना, बच्चे का दर्द मां से देखा नहीं जाता। तो क्या मां बच्चे को टीका दिलाने ना ले जाए?
 
दिल्ली से अपने घरों की ओर भागते लोगों की भीड़ देखकर अगर आपकी संवेदना जाग गई है तो उसे वापस थपकी देकर सुला दीजिए और छुट्टी पर गई सहज तार्किकता और व्यावहारिक बुद्धि को व्हाट्सएप कर दीजिए कि छुट्टी खत्म हो गई, वापस आ जाए। यह युद्ध है, इसे सैनिक लड़ेंगे... कवि नहीं।
ताबिश की फेसबुक वॉल से
 
खुदा के बंदों को हकीकत समझने की जरूरत
 
अल्लाह अरबों के लिए सबसे बड़ा देवता था। अल यानी बड़ा और इलाह यानी देवता। मतलब सबसे बड़ा देवता। अरब अपने सबसे बड़े देवता को ‘अल-इलाह’ यानी ‘अल्लाह’ कहते थे। ये शब्द कहीं और किसी अन्य इतिहास या किसी पुरानी मजहबी किताब में नहीं आया है। न ईसाइयों की बाइबिल में और न यहूदियों के तौरेत में। जाहिर है, ये अरबों का व्यक्तिगत शब्द था, उनके अपने देवता के लिए।
 
सबसे बड़े देवता के बाद भी अरबों के अपने व्यक्तिगत देवता होते थे। कुल देवता होते थे। अरब ठीक उसी तरह से मूर्ति पूजा करते थे जैसे आज भारत के लोग करते हैं। कहीं भी सफर में दूर जाने पर अरबों को जब किसी दैवीय सहायता की जरूरत होती थी तो वे अच्छे-अच्छे गोल पत्थर चुनकर उसे एक घेरे में लगाते थे और उस पर पानी और ऊंट का दूध डालकर पूजा करते थे। ऐसे पत्थरों को इलाह या अल-इलाह बुलाते थे।
 
अरब सांपों को भी अपने इलाह यानी देवता का रूप मानते थे। वे सांपों को जिन्न कहते थे जो उनके हिसाब से उनके इलाह का ही एक रूप होता था। जिन्न अरबों की अपनी व्यक्तिगत खोज थी। इसीलिए इनका जिक्र किसी दूसरे मत-पंथ की किसी किताब में नहीं मिलता है। रेत के बड़े-बड़े तूफान को अरब जिन्न बोलते थे और उससे बचने के लिए सांपों की पूजा करते थे।
तो ‘अल-इलाह’ अरबों के लिए कोई भी हो सकता था। किसी के लिए उज्जा सब कुछ थीं तो किसी के लिए हुबल। किसी के लिए वे इलाह होते थे तो किसी के लिए अल-इलाह।
 
एक छोटी सी घटना का मैं यहां जिक्र करना चाहूंगा कि पैगम्बर मुहम्मद के बचपन के समय जब काबा की हालत बहुत खस्ता हो गयी थी, तो अरब लोग उसकी मरम्मत करवाना चाहते थे। मगर उसमें एक सांप रहता था.. और वह रोज धूप सेंकने काबा से निकलकर दीवार पर सटकर लेटा रहता था। अरब उसी के सामने सब चढ़ावा चढ़ाते थे। अरब ये सोचते थे कि इलाह का ये रूप अपने काबा की हिफाजत कर रहा है, इसलिए हम काबा की अभी कोई मरम्मत नहीं कर सकते हैं।
 
फिर एक दिन एक बाज उड़ता हुआ आया और उस सांप को चोंच में दबा कर उड़ गया। अरबों ने इसे इलाह की तरफ से इशारा समझा और ये माना कि अब उनको काबा के मरम्मत की इजाजत मिल गयी है। उनके हिसाब से उनके अल-इलाह ने अपने ही एक रूप जिन्न को बाज द्वारा उठवा कर ये सन्देश दिया कि अब तुम लोग मरम्मत करो.. फिर काबा की मरम्मत हुई और वह बनाया गया। उसके बाद काबा से सांप वाले इलाह, सांप यानी जिन्न का ‘एपिसोड’ खत्म हो गया। और इन सारी आस्थाओं और अरबों की अपनी समझ के रास्ते से तय हुई एक ‘घटना’ ने आपको अपने वर्तमान ‘खुदा’ का रूप और नाम दिया।
 
ये मुझे सिर्फ इसलिए मुझे आप अपना सब कुछ मानते हैं वह कितने रूपों में चलकर आपके पास पहुंचा है। और किस तरह से चांद, सूरज, पत्थर से लेकर सांप की यात्रा करते हुए वह निराकार बन गया।
 
इसलिए बस थोड़ी सी समझ और इतिहास की पढ़ाई की जरूरत होती है आपको सारा खेल समझने के लिए। और जिस दिन आप ये समझ गए, आपके सामने ही सारी नफरतें ताश के पत्ते की तरह ढेर हो जाएंगी।