भारत में किसका एजेंडा चला रहा है बीबीसी ?

    दिनांक 23-अप्रैल-2020
Total Views |
चंद्रप्रकाश
 
bbc _1  H x W:
ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन अपने देश का सरकारी मीडिया संस्थान है। वैसे ही जैसे भारत में प्रसार भारती है। यह संस्थान ब्रिटिश नागरिकों के टैक्स के पैसे से चलता है। इसलिए बीबीसी से उम्मीद की जाती है कि वो इस पैसे का सदुपयोग करे। लेकिन जहां तक भारत में बीबीसी की सेवाओं का प्रश्न है उसकी भूमिका बेहद संदिग्ध है। ब्रिटिश सरकार का यह संस्थान भारत विरोधी एजेंडे और फेक न्यूज़ की बड़ी फ़ैक्ट्री बनकर उभरा है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया एक महामारी से जूझ रही है बीबीसी भारत को लेकर लगातार अपमानजनक और नस्लभेदी टिप्पणियां कर रहा है। कोरोना वायरस बीबीसी के लिए मानो भारत विरोध का सुनहरा मौक़ा लेकर आया है। बीबीसी के इस रवैये से यह प्रश्न भी उठ रहा है कि अगर भारतीय सरकारी मीडिया भी ब्रिटेन को लेकर ऐसे ही दुष्प्रचार करने लगे तो वहां के लोगों और वहां की सरकार को कैसा लगेगा ?
भारत की संप्रभुता को चुनौती
बीबीसी ऐसा कोई मौक़ा नहीं छोड़ता जिससे वो भारत की एकता और संप्रभुता को चुनौती दे सके। धारा 370 हटे एक साल होने को हैं लेकिन बीबीसी अब भी जम्मू कश्मीर को 'भारत प्रशासित क्षेत्र' लिखता है। कई लोगों ने जब इस ओर उसके संपादकों का ध्यान खींचा तो उन्होंने जवाब देने के बजाय भारत विरोधी इस रवैये को और भी तेज़ कर दिया। जम्मू कश्मीर ही नहीं, अरुणाचल और उत्तर पूर्व के कुछ क्षेत्रों को लेकर भी बीबीसी अक्सर ऐसी आपत्तिजनक रिपोर्टिंग करता रहा है। कुछ समय पहले इसी बीबीसी ने भारतीय सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम को लेकर झूठी ख़बरों की भरमार कर दी थी। यह बताया कि एलआईसी कंगाल हो चुकी है। जबकि एलआईसी की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ठीक है और अगर कभी कोई समस्या आए भी तो इसके निवेशकों को सरकार काउंटर गारंटी देती है। यह भी भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का ही मामला था। बीबीसी ये सारे काम भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की आड़ में कर रहा है।
चाइनीज़ वायरस पर फेक न्यूज़
ब्रिटेन दुनिया के उन कुछ देशों में है जहां चाइनीज़ वायरस से सबसे ज़्यादा तबाही हुई है। लेकिन बीबीसी का पूरा ध्यान भारत की खिल्ली उड़ाने पर है। बीबीसी हिंदी ने एक कार्टून छापा जिसमें मास्क लगाना ज़रूरी करने के केंद्र सरकार के आदेश पर व्यंग्य किया गया। इसमें दिखाया गया कि इससे भारतीयों को अपने तन के वस्त्र फाड़कर मास्क बनाने पड़ेंगे। यह कोई व्यंग्य नहीं बल्कि नस्लभेदी मानसिकता की निशानी है। भारत ने जब मानवीय आधार पर मलेरिया की दवा हाइड्रोक्लोरोक्वीन के निर्यात की अनुमति दी, तब सबसे पहले बीबीसी हिंदी ने एक रिपोर्ट पोस्ट की और दावा किया कि इससे भारत के अंदर दवा की कमी हो जाएगी और लोगों को नहीं मिलेगी। ये सरासर झूठ था क्योंकि भारत ने निर्यात की अनुमति अपनी आवश्यकता पूरी होने के बाद ही दी थी। लेकिन बीबीसी का इस मामले में चीन की तिलमिलाहट को ही झलकाया। संयोग से एक दिन बाद ही ख़ुद ब्रिटिश सरकार भारत के आगे हाइड्रोक्लोरोक्वीन के लिए हाथ पसारकर खड़ी हो गई। उसने केवल हाइड्रोक्लोरोक्वीन ही नहीं, पैरासिटामॉल जैसी आम दवा भी माँगी। जो देश ख़ुद इतनी विपन्न स्थिति में है उसका सरकारी मीडिया अगर भारत को लेकर ऐसी मानसिकता रखता है तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चीन के हाथ की कठपुतली बीबीसी
ऐसा नहीं है कि बीबीसी का ये रवैया नया है। बीबीसी हमेशा से अपने भारत विरोधी रुख़ के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अब जब रस्सी जल चुकी है तब ऐंठन किस बात की? जो ब्रिटेन अपनी दवा जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए भारत के भरोसे है उसका सरकारी मीडिया संस्थान इतनी अकड़ क्यों दिखा रहा है? इसका जवाब है चीन। बीबीसी की भारतीय सेवाओं में आप कभी भी चीन के विरोध या आलोचना में कोई समाचार नहीं पाएंगे। यहां तक कि हॉन्गकॉन्ग में चीन के अत्याचारों के समाचार भी बीबीसी पर सेंसर किए गए। बीबीसी की भारतीय सेवाओं में लगभग पूरी तरह से वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों का दबदबा है। ऐसे में अगर ये संस्थान भारत विरोधी दुष्प्रचार का औज़ार बन चुका है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।