तबरेज पर रोने वाले पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या पर मौन क्यों ?

    दिनांक 23-अप्रैल-2020   
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पालघर में उन्मादी भीड़ द्वारा साधुओं की निर्मम हत्या ने एक तरफ राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर तो सवाल खड़े ही किए हैं वहीं इलाके में ईसाई मिशनरियों के कुचक्र और लुटियन मीडिया के प्रोपेगंडा को भी उजागर कर दिया है। जो सेकुलर नेता झारखंड में तबरेज चोर की लिंचिग पर रोते दिखे थे वे पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या पर मौन हैं

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                                 भीड़ की हैवानियत का शिकार हुए महाराज कल्पवृक्षगिरी और निलेश तेलगड़े
बीते दिनों महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़े के दो साधुओं की उन्मादी भीड़ द्वारा निर्मम हत्या की गई। लेकिन दो दिन तक मीडिया इसे दूसरा एंगल देकर सही तथ्य छिपाता रहा। जब एक वीडियो वायरल हुआ तब कहीं देश के सामने हकीकत आई और सेकुलर मीडिया का दोहरा रवैया—चेहरा उजागर हुआ। लेकिन जब इस पूरे मामले की घटना के तह में जाते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि आखिर घटना की वजह क्या रही ? आखिर वे कौन लोग हैं जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया ? पालघर एवं उसके आसपास के वनवासी इलाके में क्या चल रहा है ? कौन लोग हैं जो स्थानीय लोगों के मन में जहर घोलने का काम कर रहे हैं ? ऐसे तमाम सवाल इस पूरी घटना के आस—पास घूमते नजर आते हैं।
ईसाई मिशनरियों का इलाके में बढ़ता प्रभाव
दरअसल अभी तक जो जानकारी निकलकर सामने आई है, उसके अनुसार पालघर के आस—पास के इलाके में ईसाई मिशनरियां पूरी ताकत के साथ वनवासी इलाके के हिन्दुओं को बरगलाने, बहकाने में लगी हुई हैं। वह स्थानीय लोगों के मन में भारतीयता के प्रति नफरत पैदा कर रही हैं। इस बात का प्रमाण है उस क्षेत्र के पुलिस आयुक्त रहे डॉ सत्यपाल सिंह का एक टृवीट। पालघर घटना के बाद डॉ सिंह अपने टृवीट में लिखते हैं कि मैं वर्षों पहले पालघर आदिवासी क्षेत्र का पुलिस आईजी था। आदिवासी क्षेत्र में अपराध न के बराबर है परंतु छदृम रूप में सेवा व लालच को हथियार बनाकर कन्वर्जन कराने की साजिशें चालू हैं। साधुओं को चोर बताकर मारने के लिए ग्रामीणों को किसने भड़काया—यह पता लगाना अत्यंत जरूरी है। डॉ सिंह का यह टृवीट बहुत कुछ बताने के काफी है।
जाहिर है कि जहां भी चर्च की गतिविधियां बढ़ती हैं वहां पर हिन्दू विरोध को हवा दी जाती है। बाकायदा ईसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं, साधु—संतों को अपमानित करने का छल—प्रपंच रचा जाता है। भोले—भाले वनवासी समुदाय के मनों में जहर भरा जाता है। यह शक्तियां साधुओं और सनातन मानबिंदुओं के विरुद्ध इसलिए हैं क्योंकि कन्वर्जन की राह में यही सबसे बड़ा अवरोध हैं। जिन इलाकों में चर्च की गतिविधयां तेजी से बढ़ती हैं वहां का स्थानीय समाज
धीरे—धीरे अपनी जड़ों से कटने लगता है और तब पालघर जैसी घटना घटित होती है। आज महाराष्ट्र के वनवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियां तेजी से अपना काम कर रही हैं। ईसाई—इस्लाम—नक्सल गठजोड़ की बदौलत हाल के वर्षों में राज्य को कई बार अशांत करने की कोशिशें हुई हैं। भीमाकोरे गांव की घटना उसका उदाहरण है।
पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में
पालघर की घटना में जिस तरह से पुलिस संरक्षण के बावजूद संन्यासियों की निर्मम हत्या की गई, उसने समूचे पुलिस तंत्र और उसकी कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल खड़े किए हैं। महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि पालघर की घटना मन को दुखी करती है। लेकिन इससे ज्यादा दुखी करने की बात है कि जिन पर लोगों की रक्षा का दायित्व है, उनके संरक्षण के बावजूद संन्यासियों की निर्मम हत्या कर दी जाती है और पुलिस घटना स्थल पर मूकदर्शक बनकर सब देखती रहती है। यकीनन यह विस्तृत जांच का विषय है।
उल्लेखनीय है कि पालघर घटना के जो वीडियो वायरल हुए उसमें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि किस प्रकार पर्याप्त संख्या में होते हुये भी पुलिस उन्मादी भीड़ के सामने समर्पण की मुद्रा में थी। ऐसा लग रहा था कि पुलिस उस उपस्थित भीड़ से भयभीत न होकर उसके पीछे काम कर रही हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस पर किसी तरह की कार्रवाई न करने का दबाव था ?
सेकुलर मीडिया का झूठ पकड़ा गया
एक तरफ अराजक ताकतें भारत विखंडन की साजिशें रच रही हैं तो दूसरी तरफ लुटियन मीडिया उनके प्रोपेगंडा को संबल देकर झूठ फैलाता है। वह सच को दबाकर एक नया झूठ गढ़ता है। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में वह बहुत जल्दी पकड़ में आ जाता है और मीडिया की हकीकत सामने आ जाती है। पालघर की घटना में लुटियन मीडिया ने सही तथ्यों को छिपाकर साधुओं को बच्चा चोर सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया। बड़ी—बड़ी रपटें छापी। टीवी पर खबरें चलाईं और हिन्दू घृणा से भरकर सत्य को झूठ और भ्रामक तथ्यों द्वारा दबाया। लेकिन कहा जाता है कि सत्य कभी छिपता नहीं और यही हुआ। आज निर्दोष साधुओं की हत्या का सच सामने आ गया है। लेकिन इस सच ने उनको कठघरे में खड़ा किया है जो वर्षों से समाज को बरगलाते और झूठ को फैलाते आ रहे थे।
चोर तबरजे पर आंसू बहाने वाले अब कहां हैं ?
दो दिन पहले ट्विटर पर भारत और अरब के मुसलमानों की ओर से एक हैशटैग ट्रेंड कराया जाता है, जिसमें यह स्थापित करने की कोेशिश होती है कि भारत में मुसलमानों को प्रताड़ित किया जाता है। लेकिन ऐसे सभी लोग पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या पर अपना मुंह सिल लेते हैं। वे झारखंड में चोर तबरेज की लिचिंग पर तो रोते हैं। वर्तमान सरकार को कोसते और शासन-प्रशासन पर सवालों की झाड़ी लगा देते हैं, लेकिन जब बात महाराष्ट्र की आती है तो सेलेक्टिव हो जाते हैं। पालघर की घटना पर न तो वे राज्य की उद्धव सरकार को घेरते हैं और न तो पुलिस संरक्षण में साधुओं की नृशंस हत्या पर कोई सवाल करते हैं।