करतारपुर गुरुद्वारा के निर्माण ने खोली पाकिस्तान की पोल, बनाए थे फाइबर के गुंबद

    दिनांक 23-अप्रैल-2020   
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जानकर आश्चर्य होगा कि आंधी-पानी के बीच गिरे गुरुद्वारा के गुंबद सीमेंट-सरिया की बजाए फाइबर से बनाए गए थे। इसे जोड़ने के लिए नट-बोल्ट तक का उपयोग नहीं किया गया था

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सिखों के पवित्र स्थलों में एक पाकिस्तान के करतारपुर गुरुद्वारा के गुंबद और मीनार वास्तव में तेज आंधी-पानी के कारण गिरे थे या इसकी आड़ में कोई षड़यंत्र है। घटना के तुरंत बाद आनन-फानन में जिस प्रकार क्षतिग्रस्त गुबंदों आदि की मरम्मत कराई गई तथा पाकिस्तान सरकार के आदेश पर मामले की जांच शुरू की गई है, उसे लेकर हिंदुस्थान और पाकिस्तान की अवाम के साथ सिख जगत में तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। करतारपुर गुरुद्वारा के कार्यवाहक सरदार इंद्रजीत सिंह के मुताबिक, इस पवित्र स्थल के दो सफेद-सोनहरे गुंबद, संग्रहालय की मीनार, दो स्टॉल, दीवान अस्थाना तथा दर्शन ड्योढ़ी 17-18 अप्रैल की आधी रात को अचानक भरभराकर गिर गए। उस समय तेज आंधी-बारिश हो रही थी। चारों तरफ अंधेरा पसरा हुआ था। चूंकि कोरोना संक्रमण को लेकर इन दिनों करतारपुर गुद्वारा श्रद्धालुओं के लिए बंद है, इसलिए घटना के समय वहां कोई मौजूद नहीं था। हालांकि पाकिस्तान गुरूद्वारा प्रबंधक समिति के सदस्यों को प्र्रारंभिक जांच में हादसे के समय वहां किसी की मौजूदगी और तोड़-फोड़ के निशान नहीं मिले हैं। पाकिस्तान ने पिछले साल ही गुरुद्वारा को नए सिरे से सजाने-संवारनेे, मरम्मत और विस्तार पर 17 बिलियन खर्च किए गए हैं। इसके कुछ महीने बाद ही गुरुद्वारा को इतना बड़ा नुकसान पहुंचना, कई तरह के संदेह पैदा करता है। पाकिस्तान के सिखों का एक वर्ग इस घटना को पिछले साल गुरूनानक देव जी के जन्मस्थल ननकाना साहिब में घटी घटना से जोड़कर देख रहा है।
गत वर्ष एक सिख लड़की के मजहब परिवर्तन को लेकर मुकदमा दर्ज कराने पर कट्टरपंथियों ने ननकाना साहिब में खूब हंगामा बरपाया था। गुरुद्वारे पर पत्थरबाजी तक की गई थी। इस दौरान पाकिस्तान के गुरुद्वारों पर इस्लामिक झंडा फहराने की सिखों को चेतावनी दी गई थी। इस घटना को लेकर कुछ लोग गिरफ्तार किए गए थे लेकिन फिर भी यह विवाद अभी ठंडा नहीं पड़ा है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
करतारपुर गुरुद्वारा सिखों का दूसरा सबसे पवित्र स्थल है। यहां गुरुनानक देव जी महाराज ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण अठारह वर्ष बिताए थे। प्रत्येक वर्ष भारत सहित दुनियाभर के लाखों सिख श्रद्धालु करतापुर साहिब गुरुद्वारे का दर्शन करने पाकिस्तान जाते हैं। भारत के दर्शनार्थियों को वहां तक पहुंचने के लिए पहले अटारी बॉर्डर पार कर लंबा चक्कर काटना पड़ता था। मगर भारत-पाकिस्तान की सीमा पर कॉरिडोर निर्माण के बाद घंटों की यह दूरी मिनटों की हो गई है। इसके माध्यम से भारत के दर्शानार्थी बिना वीजा और लंबा चक्कर काटे मात्र कुछ ही समय में करतारपुर पहुंच जाते हैं। पिछले वर्ष 9 नवंबर को गुरुनानक देव जी महाराज के 550वें प्रकाशोत्सव पर भारत-पाक के बीच समझौते के उपरांत कॉरिडोर को दर्शनार्थियों के लिए खोला गया था। दर्शन करने वालों से पाकिस्तान सरकार तकरीबन पंद्रह सौ रूपये फीस वसूलती है। करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के समय इमरान खान और पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने एक समारोह में खुद को सिख हितैशी साबित करने के लिए कई घोषणाएं की थीं। बावजूद इसके पाकिस्तान के सिख समुदाय सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के हालात में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया है। बल्कि पिछली सरकारों के मुकाबले इमरान सरकार में मजहबी कट्टरपंथियों के अत्याचार बढ़े ही हैं। सरकार अल्पसंख्यकों को कतई महत्व नहीं देती। करतारपुर की ताजी घटना इसका एक उदाहरण है। जानकर आश्चर्य होगा कि आंधी-पानी के बीच गिरे गुरुद्वारा के गुंबद सीमेंट-सरिया की बजाए फाइबर से बनाए गए थे। इससे जोड़ने के लिए नट-बोल्ट तक का उपयोग नहीं किया गया था। इस पर पाकिस्तानी मीडिया अपनी सरकार पर तरह-तरह के सवाल उठा रहा है। पत्रकार मुर्तजा अली शाह कहते हैं कि निश्चित ही मरम्मत कार्य में घटिया सामग्री इस्तेमाल की गई होगी। करतारपुर गुरुद्वारे के गुंबद-मीनार गिरने की घटना को लेकर भारत भी पाकिस्तान से नाराजगी जता चुका है। हादसे के तुरंत बाद फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गेनाइजेशन द्वारा मरम्मत कार्य करने पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। सरकार ने हादसे की जांच के लिए जब कमेटी गठित कर दी है तो उसे घटनास्थल के निरीक्षण का मौका क्यों नहीं दिया गया ? पाकिस्तान के मजहबी मामलों के मंत्री नूरुल हक कादरी का कहना है कि घटना के बाद सिख समुदाय की ओर से आशंकाएं जाहिर करने पर उन्होंने इसके बारे में तत्काल सरकार को अवगत करा दिया था, जिसके तुरंत बाद विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री फव्वाद चौधरी ने जांच कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया था। करतारपुर गुरुद्वारा के कार्यवाहक सरदार इंद्रजीत सिंह, सरदार मंजीत सिंह और सरदार परताब सिंह का कहना है कि इस हादसे की निष्पक्षता से जांच होनी चाहिए ताकि सिखों की तमाम तरह की आशंकाएं खारिज की जा सकें।