सेवा, सत्यनिष्ठा, समर्पण की मिसाल है संघ

    दिनांक 24-अप्रैल-2020
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ललिता निझावन
कोरोना महामारी में मां भारती की हर संतान की सेवा के संकल्प के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी सहयोगी संस्था सेवा भारती सेवा के कीर्तिमान स्थापित करने में जुटे हैं

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देश में सरकार के बाद संघ ही सबसे बड़ी सेवा संस्था के रूप में उभरा है। सरकारी कर्मचारियों को तो उनके कर्तव्यपालन के लिए वेतन मिलता है, लेकिन स्वयंसेवक तो अपने वेतन से धन देकर, अपने स्वास्थ्य को स्वेच्छा से जोखिम में डाल कर लोगों की सेवा कर रहे हैं। सरकार की बात उठी है तो यहां यह बताना भी प्रासांगिक होगा कि खुद को प्रधानसेवक बताने वाले यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संघ के प्रचारक रह चुके हैं और उनके सेवाभावी संस्कारों का प्रेरणास्रोत भी संघ ही है ।
जैसे ही देश में कोरोना महामारी की आहट सुनाई दी और सरकार ने लाॅकडाउन और कफ्र्यु जैसे उपायों की घोषणा की, संघ और उसके सहयोगी संगठन सेवा भारती ने चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए पीड़ित और प्रभावित लोगांे के सेवाकार्य की विस्तृत योजना तैयार की। ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’ और ‘मां भारती की कोई भी संतान भूखी न सोए’ ये संघ के ध्येय वाक्य और लक्ष्य बने। इसके साथ ही संघ के स्वयंसेवक और डाॅक्टर और मेडिकल स्टूडेंट देश के कोने-कोने में सक्रिय हो गए। वर्तमान में संघ 25 प्रदेशों में सेवाकार्य में संलग्न है। इसके उचित प्रबंधन के लिए प्रदेशों को विभिन्न जोन में बांटा गया है। सिर्फ स्वयंसेवक ही प्रभावित लोगों तक नहीं पहुंच रहे, अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ने और प्रभावित लोगों की समस्याओं को सुनने और उनका निवारण करने के लिए अनेक काॅलसेंटर बनाए गए हैं और विद्यार्थियों तथा दिव्यांगों के लिए भी हेल्पलाइन शुरू की गईं हैं।

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वर्तमान में देश भर में संघ के 1,88,000 कार्यकर्ता सेवाकार्य में जुटे हैं। वो 34,000 स्थानों पर राहत कार्य चला रहे हैं और 25 लाख परिवारों तक सहायता पहुंचा चुके हैं। अगर एक परिवार में चार लोग भी हों तो वो एक करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंच चुके हैं। वो शहर-शहर में सैकड़ों रसोइयां और पैकिंग यूनिट चला रहे हैं। वो करीब 80 लाख फूड पैकेट, 17 लाख राशन किट, 25 लाख सैनेटाइजर-मास्क आदि वितरित कर चुके हैं। अनेक शहरों में कार्यकर्ता सड़कों और मलिन बस्तियों में सैनेटाजेशन कर रहे हैं और जनजागरण अभियान चला रहे हैं। ये सेवाकार्य सिर्फ उत्तर भारत में ही नहीं चल रहा, दक्षिण के पांच राज्यों में संघ के 76,500 कार्यकर्ता कोन-कोने में सक्रिय हैं। वहां 2,815 कार्यकर्ता रक्तदान भी कर चुके हैं।
ये व्यवस्था सिर्फ फुटपाथ पर सोने वाले आश्रयहीनों, मलिन बस्तियों के निवासियों, दिहाड़ी मजदूरों और यहां-वहां फंस गए लोगों के लिए ही नहीं, यौनकर्मियों, ट्रांसजेंडरों, घुमंतु जातियों, वनवासियों आदि के लिए भी की गई। स्वयंसेवक सिर्फ मनुष्यों के लिए ही नहीं, आवारा पशुओं, पक्षियों और गौवंश का भी ध्यान रख रहे हैं। उन्हें जहां भी, जो भी प्रभावित दिखाई दे रहा है, निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा कर रहे हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा लेकिन ये सत्य है कि स्वयंसेवक अस्पतालों और आइसोलेशन वार्डों के रखरखाव और सफाई में भी सहयोग दे रहे हैं।
 
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कोरोना महामारी में अप्रतिम योगदान के लिए आज हर ओर फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं या कोरोना वारिअर्स का सम्मान हो रहा है। जनता डाॅक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों आदि की कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा कर रही है। लेकिन आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि स्वयंसेवक राष्ट्रसेवा में समर्पित इन फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की सेवा में भी जुटे हैं। जहां संभव हो रहा है, इन्हें और इनके परिवारजनों की सहायता कर रहे हैं।
संघ किस प्रकार कार्य कर रहा है, इसे दिल्ली प्रांत के उदाहरण से समझा जा सकता है। यहां संगठनात्मक दृष्टि से आठ विभाग हैं जिनमें 30 जिले हैं। हर जिले में नौ नगर और हर नगर में तीन से चार मंडल हैं। हर मंडल में चार से पांच शाखाएं हैं। संघ ने आपदा प्रबंधन में बहुत कल्पनाशीलता से इस संगठनात्मक ढांचे का उपयोग किया। एक केंद्रीय हेल्पलाइन आरंभ की जिसमें 150 टेलीकाॅलर्स रोज 12,000 से अधिक काॅल रिसीव करते हैं और जानकारियां संबंधित जिला संपर्क प्रमुखों तक पहुंचाते हैं। जिला संपर्क प्रमुख अपने क्षेत्र के नगर कार्यवाह अथवा मंडल या शाखा के कार्यकर्ताओं को जानकारी देते हैं जिसके बाद स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्र में आवश्यकतानुसार राशन, तेल, मसाले, दवाईयां, मास्क, सैनीटाजर आदि पहुंचा देते हैं। ध्यान रहे ये सारी सेवा निःशुल्क होती है।
दिल्ली में स्वयंसेवकों ने घुमंतु जाति के 2,700 परिवारों के लिए राशन किट का वितरण किया और गरीब बच्चों के लिए रोजाना दूध की व्यवस्था की। यही नहीं यहां गौवंश के लिए हजारों टन चारे की व्यवस्था की गई और आवारा कुत्तों को भी भोजन और पानी दिया। दिल्ली में संघ के सेवाकार्य में सिख संगत ने भी अभूतपूर्व सहायता की।
दिल्ली में संघ करीब 10,000 स्वयंसेवकों के माध्यम से अब तक 13 लाख से अधिक लोगों की सहायता कर चुका है। इनमें फुटपाथ पर रहने वाले, दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाने वाले, असहाय वृद्ध आदि शामिल हैं। स्वयंसेवकों ने गरीबों और झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वालों की ही नहीं, लाॅकडाउन में फंसे छात्रों और अन्य लोगों की भी मदद की। यहां संघ ने 179 स्थानों पर सामुदायिक रसोइयां आरंभ कीं जिनके माध्यम से प्रभावित लोगों के लिए भोजन तैयार किया गया। अब तक तीस लाख से अधिक भोजन के पैकेट पीड़ित लोगों तक पहुंचाए जा चुके हैं।
बहुत से स्थानों पर पका-पकाया भोजन पहुंचाना संभव नहीं था। वहां कि लिए राशन किट तैयार की गईं जिनमें आटा, चावल, चीनी, तेल, दाल, चाय, दूध, गरम मसाला, हल्दी, नमक और नूडल्स शामिल थे। राशन किट तैयार करते समय चीजों की क्वालिटी का खास ध्यान रखा गया। ज्ञात हो कि दिल्ली में आठ स्थानों पर पैकिंग यूनिट शुरू की गईं जहां मांग पूरी करने के लिए दिन-रात काम किया गया।
संघ ने दिल्ली में दिव्यांगजनों और पूर्वोत्तर  राज्यों के लोगों के लिए अलग से हेल्पलाइन शुरू कीं। पूर्वोत्तर राज्यों के करीब 5,000 परिवार लाॅकडाउन के कारण समस्या का सामना कर रहे थे। स्वयंसेवकों ने उन्हें राशन और अन्य आवश्यक वस्तुओं उपलब्ध करवाईं।
स्वयंसेवकों ने न केवल हर प्रभावित वर्ग की सहायता की, डाॅक्टरों, नर्सों, पैरामैडिकल स्टाफ, पुलिसकर्मियों और सफाई कर्मचारियों जैसे कोरोना वारिअर्स को भी 150 स्थानों पर जाकर सम्मानित किया और उनका मनोबल बढ़ाया।
आशा है अगले साल-डेढ़ साल में कोरोनावायरस का टीका और दवाईयां तैयार हो जाएंगी और इसका प्रकोप कम हो जाएगा। लेकिन लोग जब भी कोरोना की विकरालता का उल्लेख करेंगे, वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके सेवा भारती जैसे संगठनों की निस्वार्थ सेवा का स्मरण भी अवश्य करेंगे। कहते हैं किसी व्यक्ति अथवा संस्था की पहचान उसके आचरण से होती है, उसके कर्माें से होती है। कोरोना महामारी की इस विषम घड़ी में संघ ने अपने निस्वार्थ सेवाभाव से एक बार फिर साबित किया है कि मनुष्य मात्र का सकारात्मक विकास और उसकी सहायता ही उसका एकमात्र लक्ष्य है।
( लेखिका शिक्षाविद् और समाजसेवी हैं )