पत्रकारिता की आड़ में प्रोपेगेंडा ? गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत तीन पत्रकारों पर हुई कार्रवाई

    दिनांक 24-अप्रैल-2020   
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कश्मीर घाटी की मीडिया को जो लोग लम्बे समय से पढ़ते-समझते आ रहे हैं वे जानते हैं कि कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में समाज में जो अवधारणा बनी है, उसके पीछे एक लम्बा सुनियोजित षड्यंत्र चला है। इस अवधारणा को गढ़ने में वहां के कथित पत्रकारों का बड़ा हाथ है। लेकिन अब ऐसे सभी पत्रकारों और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार फैलाने वालों पर प्रशासन सख्त कार्रवाई कर रहा है

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कश्मीर साइबर पुलिस इंचार्ज एसपी ताहिर अशरफ़ ने 16 अप्रैल को एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि कश्मीर ज़ोन में सोशल मीडिया के दुरुपयोग के 13 मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। उसी ट्वीट में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि फ़ेक न्यूज़, अफ़वाह फैलाने वाले और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले हर अकाउंट पर नज़र रखी जा रही है और जल्द ही इन पर कार्यवाई होगी। संदेश स्पष्ट था। कश्मीर विशेषज्ञ जानते हैं कि घाटी की असल “समस्या” दुष्प्रचार की ही है। सरकारी तंत्र ने अब इस समस्या को ख़त्म करने के लिए कमर कस ली है।
20 से 22 अप्रैल के बीच घाटी के तीन पत्रकारों पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मामले दर्ज किए गए हैं। फ़ोटो पत्रकार मसर्रत ज़हरा, द हिन्दू समाचार पत्र के पत्रकार पीरज़ादा आशिक़ और लेखक गौहर गिलानी पर सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैलाने और देश विरोधी पोस्ट को आपराधिक इरादे से साझा करने के लिए मामला दर्ज हुआ है।
गौहर गिलानी के बारे में जम्मू कश्मीर पुलिस ने यह भी कहा है कि उसके खिलाफ लोगों को डराने-धमकाने की कई शिकायतें भी मिली थीं। पुलिस के अनुसार गिलानी पर गैर कानूनी गतिविधियां, आतंकवाद का बखान करने, अराजक—आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली बातें करना, देश के प्रति अविश्वास पैदा करना और जनता के मन में भय पैदा करने का आरोप है। पुलिस ने कार्रवाई शुरू की है तो तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अंजाम तक भी पहुंचेगी।
सोशल मीडिया के जरिए देश विरोधी एजेंडे को दी जाती रही है हवा

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नवम्बर, 2019 से ही मीडिया में चर्चा है की जम्मू-कश्मीर पुलिस घाटी में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कड़ी नजर रखे हुए है। घाटी की स्थिति के बारे में जानकारी देने वाले सोशल मीडिया अकाउंटस, अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल्स और एजेंसियों के अकाउंट्स पर कड़ी नजर रखी जा रही है। यहां तक कि सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकारों और नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी कड़ी निगरानी की जा रही है। पिछले कई दशकों से घाटी में मीडिया की आड़ में दुष्प्रचार होता रहा है । क्षेत्र में सही रूप से शांति और विकास हो पाए इसके लिए आवश्यक है कि इस समस्या को घाटी से पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए। डिजिटल युग में मीडिया के अलावा सोशल मीडिया की भी बड़ी भूमिका है और दोनों परस्पर सबंधित हैं। यही कारण है कि साइबर पुलिस को अब और मुस्तैद किया गया है।
कश्मीर घाटी की मीडिया को जो लोग लम्बे समय से पढ़ते-समझते आ रहे हैं वे जानते हैं कि कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में समाज में जो अवधारणा बनी है, उसके पीछे एक लम्बा सुनियोजित षड्यंत्र चला है। इस अवधारणा को गढ़ने में वहां के कथित पत्रकारों का बड़ा हाथ है। अगस्त, 2019 से पहले आतंकी संगठन, अलगाववादी संगठन, स्थानीय मीडिया, कुछ सरकारी अफ़सर और नेताओं की मिलीभगत से ही घाटी की ख़बरें बाहर जा सकती थीं। यह सुनिश्चित किया जाता था कि अलगाववाद का पक्ष लेते हुए समाचार ही सामने आएं। इस साठ—गांठ में स्वाभाविक रूप से अन्तर्राष्ट्रीय ताक़तें दिशा निर्देश देती थीं। कश्मीरियों की छवि जहां अलगाववादियों के रूप में सामने आती थी, वहीं सुरक्षाबलों को बदनाम करने के लिए कई हथकंडे अपनाए जाते थे। एक तरफ़ा ख़बरों का राज था, इसलिए कश्मीर के अलावा किसी अन्य राज्य से आए पत्रकार को घाटी में टिकने नहीं दिया जाता था। ये सब अनुच्छेद 370 की आड़ में चलता था और घाटी के राष्ट्रभावी मत को दबा दिया जाता था।
राष्ट्रभावी लोगों की बहुतायत है घाटी में
कश्मीर में राष्ट्रभावी मत कभी कम नहीं था। सुरक्षा बलों में कश्मीरी युवकों का योगदान इसका बहुत बड़ा परिचायक है। सब जानते हैं कि कश्मीर क्षेत्र में आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाई में जम्मू—कश्मीर पुलिस का बहुत बड़ा योगदान है। कश्मीर में नियुक्त पुलिसकर्मी स्थानीय युवक ही होते हैं,जो सदा डटकर आतंकी और अलगाववादी ताक़तों का मुक़ाबला करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने बड़ी तादाद में बलिदान भी दिया है। इसी प्रकार भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बलों में भी कश्मीर के युवक जोश से भर्ती होते रहे हैं और देश की सेवा करते रहे हैं।
मीडिया का दायित्व है कि वह समाज के सभी पक्षों और पहलुओं को समान रूप से सामने लाए।किंतु क्या आपने कभी कश्मीरी मीडिया को इन राष्ट्रभावी कश्मीरियों के बारे में ख़बर देते हुए सुना या पढ़ा ? नहीं सुना होगा, क्योंकि यहां सब एक पक्षीय ‘एजेंडा पत्रकारिता’ के अनुसार होता था। ऐसे में यहां पत्रकारिता न होकर प्रोपेगंडा चलाया जाता था।
मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी और इसके दुरुपयोग में बहुत सूक्ष्म अंतर है। इसी सूक्ष्मता का फ़ायदा कुछ पत्रकारों ने ख़ूब उठाया है। क़ानून भी मीडिया की आज़ादी को ज़रूरी मानते हुए बहुत उदार रहा है। कश्मीर के संदर्भ में देश को इस उदारता की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। जो एजेंडाधारी  पत्रकार वर्तमान पुलिस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं, वे कश्मीर के उन अफ़सरों पर भी उंगली उठा रहे हैं, जिन्होंने पत्रकारों पर कार्यवाई की है। ये लोग इन अफ़सरों को नीचा दिखाने के लिए उनके कुछ पुराने सोशल मीडिया पोस्ट निकाल रहे हैं, जो मात्र उन के राजनीतिक दृष्टिकोण दर्शाते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण और देशभक्ति दो अलग पहलू हैं। ऐसे में दोनों को साथ जोड़कर सिर्फ़ भ्रमित करने का प्रयास हो रहा है। ये लोग भूल रहे हैं कि सरकार ने इन अफ़सरों को राष्ट्रविरोधी ताक़तों को दूंढ निकालने का दायित्व दिया है। और ये अफ़सर मूलतः कश्मीरी ही हैं!
 
ख़ैर, कश्मीर पुलिस की कार्रवाई से अब मीडिया बिरादरी में ये संदेश ज़रूर चला गया है कि ‘प्रेस फ़्रीडम’ के नाम पर चलाया जा रहा प्रोपेगंडा अब क़ानून के निशाने पर होगा और कार्यवाई भी होगी। पत्रकारिता को बदनाम करने वाले अब भी सही राह पकड़ लें तो भला होगा।
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कह गए हैं:—
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीति।।
( लेखिका वरिष्ठ पत्रकार एवं जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र की निदेशक (मीडिया) हैं )