श्रेष्ठत्व की परीक्षा का समय

    दिनांक 24-अप्रैल-2020
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सच्चिदानंद जोशी
जब भी कभी आप किसी युवा से पूछे उसे क्या पसंद है तो अधिकांश युवा उत्तर देते हैं उन्हें चुनौती पसंद हैं। जो आज युवा नहीं हैं। वे भी अपने उन दिनों को याद करेंगे तो शायद उन्हें भी याद होगा कि उनकी भी अभिलाषा चुनौती का सामना करने की होती थी

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वैसे ही हर व्यक्ति चाहता है कि उसे उसके श्रेष्ठतम के प्रदर्शन का अवसर मिले। ये मनुष्य स्वभाव है। उसे चुनौतियों से जूझना और अपने श्रेष्ठतम का प्रदर्शन अच्छा लगता है, लेकिन नियति ऐसे अवसर हर एक को प्रदान नही करती। ज्यादातर लोग इसी हताश में अपने जीवन पथ का अंत कर देते हैं कि उन्हें चुनौतियों का सामना करने का अवसर नही मिला या वे अपने श्रेष्ठतम का प्रदर्शन नहीं कर पाए। जिन भाग्यशालियों को मिलता भी है ऐसा अवसर तो वे उसके उन्माद में ही इतने लीन हो जाते हैं कि उसकी अच्छाई को समाज के साथ साझा नहीं कर पाते।
आज समूचा विश्व जिस दौर से गुजर रहा है वो चुनौती भी है और आहवान भी है अपने श्रेष्ठतम के प्रदर्शन का। ये एक वैश्विक संग्राम है। घोषित रूप से तो ये एक महामारी है जिससे बचने का प्रयास विश्व के लगभग सभी देश कर रहे हैं, लेकिन गहराई में जाकर देखें तो ये एक महासंग्राम है जिसमें समूचा विश्व जीवित रहने के लिए उस वायरस से लड़ रहा है, जिससे पार पाने का कोई ठोस उपाय अभी तक किसी के पास नही है। इस महासंग्राम में अभी सभी बचाव की मुद्रा में हैं , कोई कम तो कोई ज्यादा।
ऐसी चुनौती संभवतः किसी के भी सामने पहली बार आई होगी जब उसे ऐसे शत्रु के साथ सामना करना है जो अदृश्य है और जिसकी चालें भी प्रकट रूप से समझ नही आती। अंदाज़ और अनुमान वो भी पूर्व के अनुभव के आधार पर लगाया जाता है जो कई बार सही तो कई बार गलत भी होता है।
लेकिन मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठतम कृति है और उसकी श्रेष्ठता इसी से प्रमाणित है कि वह ईश्वर की बनाई कृतियों का पुनर्निर्माण कर सकता है और अपनी बुद्धि और कौशल से ईश्वर की अन्य कृतियों पर विजय पाने की क्षमता रखता है। आज उस मनुष्य की उस श्रेष्ठता की परीक्षा की घड़ी है। कैसे कोई वायरस मानव जीवन में प्रवेश कर जाता है और कैसे वह समूचे विश्व को भयाक्रांत कर देता है इसका प्रत्यक्ष अनुभव हम सबको हो रहा है।
लेकिन मनुष्य स्वभाव हार मानने का नहीं है , पीछे हटने का नहीं है। यदि यह परीक्षा की घड़ी है तो उसे भी मनुष्य अच्छी तरह निभाएगा और उसमें से सफल होकर निकलेगा। दरकार इस बात की है कि इस दौरान वह अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखे और श्रेष्ठता का प्रदर्शन करे। इस संग्राम में तभी विजय होगी जब समाज का हर घटक अपना श्रेष्ठतम देने का प्रयास करे।
आज भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक तो इस वायरस से देश को मुक्ति दिलाने की और दूसरी विश्व को इससे मुक्ति का स्थाई समाधान सुझाने की। चुनौती बड़ी है लेकिन भारत समर्थ है ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए। भारत की शाश्वत ज्ञान परंपरा और संस्कृति के मूल में व्यक्ति की क्षमता और श्रेष्ठत्व को उजागर करके उसे विश्व कल्याण में लगाने के सूत्र निहित हैं। भारतीय मानस उस रूप में ढला है और अपने दायित्व को समझता है। हमें संस्कारो में जो बातें घुट्टी के रूप में पिलाई जाती थी उन्हीं के परीक्षण का समय है। विश्व के तमाम वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी माना है कि भारत इसका तात्कालिक और स्थाई समाधान सुझा सकता है। इसलिए आज भारत के सामने मानव जाति के लिए समाधान और सुरक्षा सुझाने की चुनौती है।
भारत विश्व गुरु रहा है। भारत भूमि से ज्ञान के स्रोतों का प्रवाह हुआ है जिसका लाभ पूरे विश्व ने लिया है। कोई भी विषय हो हमारी समृद्ध ज्ञान परंपरा उसमे विपुल संदर्भ और साहित्य उपलब्ध कराती है। अंतरिक्ष विज्ञान, खगोलशास्त्र, गणित , विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण , शिल्प , स्थापत्य ज्ञान की कोई विधा नहीं जिसमे हमारे यहां शोध न हुआ हो और हमने उसका समाधान न खोज निकाला हो। अभी भी इस महामारी का निदान और समाधान हम खोज ही निकलेंगे।
आवश्यकता इस बात की है कि हम जहां भी हैं , जिस भी स्थान पर कार्य कर रहे है, जो भी कार्य कर रहे हैं उसमें श्रेष्ठत्व प्राप्त करने की कोशिश करें। आज समय की यही मांग है कि हमारी क्षमता को उसकी पराकाष्ठा तक परख लें। भूमिका सभी की है और बराबरी की है। ऐसा नहीं है कि अभी सिर्फ चिकित्सा से जुड़े या सुरक्षा से जुड़े या सफाई से जुड़े या आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति से जुड़े या मीडिया से जुड़े या शासन प्रशासन से जुड़े लोगों की ही भूमिका है। लॉकडाउन के कारण अपने अपने निवास स्थानों में रुके उन असंख्य लोगों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारा घर में रहना और नियम निर्देशों का पालन करते हुए समाज के अन्य लोगों को सहायता पहुंचाना भी अभी उतना ही महत्वपूर्ण काम है।
हमें कुछ समय के लिए अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, महत्वाकांक्षा और अहम को दरकिनार रख कर सिर्फ और सिर्फ देश के हित में सोचना होगा। चिकित्सक अपना काम करे, वैज्ञानिक अपना काम करे, प्रशासन अपना काम करे, आपूर्ति वाले अपना काम करे, सफाई वाले अपना काम करे, मीडिया अपना काम करे इसके लिए जरूरी है कि बाकी लोग उसके लिए सकारात्मक और उपयुक्त वातावरण तैयार करें। हमारी जरा सी भूल, असावधानी, लापरवाही, या महत्वाकांक्षा पूरे देश के लिए संकट पैदा कर सकती है। इसका एक उदाहरण अभी हमने देख ही लिया जब कुछ लोगों ने देश और समाज हित से बढ़कर मजहब को माना और अपनी अज्ञानता से देश के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर दी। कल्पना कर सकते हैं यदि कुछ लोगों ने अपनी जहालत का प्रदर्शन न किया होता तो आज हम कितनी बेहतर स्थिति में हो सकते थे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अधिकारी अपनी अफसरी छोड़ अपने कर्तव्यों पर ध्यान दें। अधिकार और सुविधाएं तो बाद में भी मिल जाएंगी लेकिन आज जब अपने कर्तव्य के श्रेष्ठतम का प्रदर्शन का अवसर आया है तो उसे गवाने में कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में इसके उदाहरण देखने को मिल गए है कि अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत हित को ऊपर रखने से कितना नुकसान हो सकता है । पुलिस अपनी पुलिसिया शैली में बदलाव लाकर क्या समाज के मित्र और सहयोगी की भूमिका निभा सकती है क्या ये देखने का अवसर है। चिकित्सा से जुड़े लोगों को तो लोग भगवान मानते हैं। आज उनके सामने भी अपने देवत्व को सिद्ध करने का समय है। मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका निभा कर समाज में खोया हुआ विश्वास प्राप्त कर सकता है। एक समय था जब अखबार को गज़ट की संज्ञा दी जाती थी। उससे फिसलकर आज मीडिया एजेंडा सेटिंग और सुपारी मीडिया की भूमिका में आ गया है। क्या एक बार फिर मीडिया देश के लिए अपनी कोई सकारात्मक और सहयोगी भूमिका तय कर सकता है ये सोचने का समय है। क्या हमारे राजनीतिक दल अपने राजनीतिक हितों तो ताक पर रख कर और अपने क्षुद्र मतभेदों को भुलाकर इस संकट के समय एक साथ खड़े होकर देशवासियो में विश्वास और साहस का संचार कर सकते हैं।
व्यवसाय से जुड़े लोग जो इस समय आपूर्ति के काम में लगे हैं क्या वो इस समय लाभ , और संग्रहण का विचार त्याग कर समाज हित में निरपेक्ष भाव से वितरण का काम कर सकते है। लाभ अर्जित करने के और भी अवसर आएंगे , बाजार में अपना महत्व बढ़ाने के भी और अवसर आएंगे लेकिन ये अवसर अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का है। घर बैठे सभी लोगों का भी दायित्व है कि वो अपना समय श्रेष्ठतम रचनात्मक गतिविधियों में गुजारे और एक दूसरे का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करे। संग्रहण और भंडारण की प्रवृत्ति से बचकर सहकार और सहजीवन के मंत्र को अपनाना इस समय की आवश्यकता है। दायित्व सभी का है। अभी कुछ लोग मैदान में डटे हैं। चिकित्सक, स्वास्थ्य कर्मी कई दिनों तक घर नहीं जा पा रहे हैं। पुलिस और अन्य सुरक्षा कर्मी दिन रात अपनी परवाह किये बगैर हमारी सुरक्षा में लगे हैं , अधिकारी 18 से 20 घंटे काम करके इस संकट से उबरने के लिए योजनाए बना रहे हैं। पूरा प्रशासनिक अमला उसके क्रियान्वयन में लगा है। प्रधानमंत्री हम सबके लिए मोर्चे पर डटे हैं और भारत ही नहीं समूचे विश्व का नेतृत्व कर रहे हैं इस आपदा के समय। विभिन्न मुख्यमंत्री भी रात दिन अपने अपने राज्यों की स्थिति का जायजा लेकर सुधार करने में लगे हैं खाद्यान्न आपूर्ति , सब्जी दूध फल और दवा आपूर्ति में लगे लोग बिना अपनी सुविधा देखे हमारे लिए आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं। स्वयंसेवक पूरी निष्ठा से सेवा कार्यो में लगे हैं शिक्षक अपने विद्यार्थियों को शिक्षा देने के काम में जुटे हैं, अगली कक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं। कला और संस्कृति से जुड़े लोग भी अपने रचनात्मकता से समाज का मनोबल ऊंचा रखने में लगे हैं। इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़े लोग सारी यंत्रणाएं ठीक रखने के तथा अबाध रखने के प्रयास में लगे है।
जब हम इस संकट से अंशतः उबर जाएंगे तब उन लोगों का काम शुरू होगा जो अभी घरों में बैठे हैं, क्योंकि तब उन्हें मोर्चा संभालन होगा। हमारी अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाना होगा, उद्योगों को शुरू करना होगा , उत्पादन बढ़ाना होगा, पैदावार बढ़ानी होगी, कृषि कार्यो में तेज़ी लानी होगी| ऐसे कई काम और व्यवसाय जो इस महामारी के कारण बंद हो गए उनमें विश्वास जगा कर उन्हें फिर से शुरू करना होगा| हमारे श्रेष्ठतम कलाकार संस्कृति कर्मी फिर वो चाहे कला के किसी भी माध्यम से जुड़े हों और जो हमारी संस्कृति के ध्वजवाहक है इसके कारण प्रभावित हैं , उनके अंदर असुरक्षा का भय व्याप्त है, अपने भविष्य को लेकर चिंताएं है। उनका रचनाकर्म फिर शुरू हो और वे असुरक्षा के भय से मुक्त हो उनका भविष्य आशादायी हो ये भी देखना होगा।
इसलिए ये समय हम सबकी श्रेष्ठत्व की परीक्षा का समय है। और ये समय लंबा चलने वाला है। इसमें कहीं भी किसी छूट की गुंजाइश अभी लंबे समय तक नही है| लॉकडाउन तो कभी न कभी खत्म होगा ही। भगवान करे जल्दी खत्म हो। कोरोना भी अंततः भाग ही जाने वाला है, लेकिन चुनौतियों का ये काल लंबे समय तक रहने वाला है| ये काल एक भारत वासी के रूप में हमारे सत्व की परीक्षा है। इस परीक्षा में हमे अपनी पूरी सकारात्मक क्षमता के साथ उतरना होगा तभी हम सफल हो पाएंगे। संयम ,साहस और संकल्प का समय है ये। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्तियां इस समय शायद हमारा मनोबल बढ़ाने में सहायक हो:
ऐसे समय में,
जब सब कुछ टूट रहा है और सड़ रहा है,
मेरा विश्वास बढ़ रहा है ,
प्रसन्न मन , अविचल निष्ठा और परिपूर्ण विनय में।
समय मे शक्ति नही है ,मुझे तोड़ने की
अगर गलती न करूं मैं ही,
प्रसन्नता , निष्ठा और विनय छोड़ने की।
और होकर क्षण से त्रस्त ,हटा न लूं
दूर क्षितिज से अपनी आंखें ।
पूरे साहस के साथ उड़ने के बदले ,
सिकोड़ न लूं अपनी पांखें।
समय मे शक्ति नहीं है
मुझे तोड़ने की।