कोविड-19 अमेरिका ने फैलाया ! चुपकर झूठे !

    दिनांक 25-अप्रैल-2020
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अरविंद
दुनिया को वायरस-आतंकवाद का शिकार बना चुका चीन परेशान है। परेशान इसलिए नहीं कि उसके कारण दुनिया में इतनी मौतें हो गईं। परेशान इसलिए कि दुनिया उससे सवाल कर रही है। उससे हिसाब मांग रही है, मुआवजा मांग रही है। इसी कारण चीन आए दिन उल्टे-सीधे तर्क लेकर सामने आ खड़ा होता है

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पूरी दुनिया चाइनीज वायरस के कारण बर्बाद हो गई है। किसी को नहीं पता कि जब कोविड-19 का यह तूफान थमेगा तो तबाही का कैसा मंजर होगा। कितने लोग मौत की नींद सो चुके होंगे, कितने देशों का अर्थतंत्र गर्त में समा चुका होगा। ऐसे में चीन के खिलाफ दुनिया का गुस्सा जायज है। चीन को भी पता है कि अगर उसके खिलाफ उमड़ती-घुमड़ती इस भावना की दिशा नहीं मोड़ी गई तो उसके लिए आने वाले दिन मुसीबत भरे हो सकते हैं। इसी मंशा के साथ चीन की ओर से तमाम उलझाने वाले बयान आते रहते हैं। अब इस क्रम में एक के बाद एक कई अहम बयान आए हैं चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से। इसमें ‘तथ्यों’ के आधार पर यह बताने की कोशिश की गई है कि चीन को दुनिया का गुनहगार बताना सरासर गलत है और कोविड-19 तो अमेरिका की देन है। दरअसल, दुनिया तो चीन के साथ नाइंसाफी कर रही है।
तो जांच से क्यों भाग रहे
चीन के विदेश मंत्रालय के सूचना विभाग में उपमहानिदेशक हैं झाओ लिजियान। उन्होंने हाल ही में ट्वीट करके दावा किया कि कोविड-19 तो दरअसल अमेरिका में पनपा और अमेरिका ने कोविड-19 के संक्रमण के शुरुआती मामलों को छिपाया। वाकई वो दिन बड़ा अच्छा होता जब दुनिया चीन की मासूमियत की कसमें खाती। लेकिन अफसोस की बात है कि ऐसा बिल्कुल नहीं। अगर अमेरिका में ही इस वायरस का जन्म हुआ तो आपने वहां जाकर जांच करने की मांग क्यों नहीं की? क्या इसलिए कि ऐसा करने पर उसे वुहान की भी जांच करानी होगी ? अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी समेत दुनिया मांग कर रही है कि वुहान में जांच करने दें। जब आपके यहां से फैला ही नहीं तो आपको अनुमति देने में क्या दिक्कत है? अपनी भी जांच करा लो और अमेरिका की भी कर लो।
सवाल उठाकर बच नहीं सकते
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हैं जेंग शुआंग। उन्होंने हाल ही में एक के बाद कई ट्वीट किए जो ये बताने के लिए थे कि दुनिया तो नाहक हाथ धोकर चीन के पीछे पड़ी हुई है। उन्होंने मुख्यतः तीन सवाल उठाए। पहला सवालः एड्स सबसे पहले 1980 के दशक में अमेरिका में पाया गया और उसके बाद पूरी दुनिया में फैल गया। इससे पूरी दुनिया बड़ी भारी मुसीबत में फंस गई, लेकिन क्या किसी ने इसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया ? दूसरा सवालः एच1एन1 फ्लू 2009 में अमेरिका से शुरू हुआ और 214 देशों में फैला जिसमें करीब दो लाख लोगों की जान चली गई। क्या किसी ने अमेरिका से मुआवजा मांगा ? तीसरा सवालः सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर किशोर महबुबानी ने कहा है कि 2008 का वित्तीय संकट अमेरिका में लेहमन ब्रदर्स के दीवालिया हो जाने के कारण हुआ, लेकिन क्या तब भी किसी ने इसका खामियाजा अमेरिका को भुगतने को कहा ? जेंग शुआंग के सवालों का जवाब देना तो बनता है, तो आइए इनकी शंकाओं का समाधान करने की कोशिश करें।
एड्स सबसे पहले अमेरिका में हुआ
एड्स के बाद पूरी दुनिया ने इसकी जड़ें खोद डाली थीं और वैज्ञानिकों ने पश्चिम अफ्रीका में पाई जाने वाली चिंपैंजी की एक प्रजाति को इंसान में एचआईवी फैलाने का स्रोत माना। एचआईवी-1 के इंसान में संक्रमण का सबसे पुराना मामला कोंगो में मिलता है। 1959 में कोंगो के एक व्यक्ति के खून के सैंपल में एचआईवी के आरंभिक संक्रमण की बात सामने आई थी। अमेरिका में 1980 के आसपास अचानक इसके मामले आने शुरू हुए और तब जाकर अमेरिकी की पहल पर इस पर हो रहे शोध की रफ्तार को तेज किया गया। यानी, उस पर काम पहले से ही चल रहा था, और अमेरिका में उसका जन्म नहीं हुआ था। और जब चीन एड्स की बात कर ही रहा है तो फिर फ्रांस के वैज्ञानिक की बात भी प्रांसगिक हो जाएगी जिसने एड्स की खोज की थी। एड्स को खोजने वाले नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक लूक मॉण्टेग्नियर ने हाल ही में कहा है कि कोविड-19 एक इंसान निर्मित वायरस है और एड्स के वैक्सीन बनाने के क्रम में वुहान वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट में यह बना। तो इस पर क्या कहेंगे?
एच1एन1 पर अमेरिका से मुआवजा क्यों नहीं मांगा ?
यह सही है कि एच1एन1 फ्लू के सबसे पहले मामले अमेरिका में आए। लेकिन इसे छिपाना तो छोड़िए, उसने इसकी जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन को उस समय दी जब इससे सिर्फ गिनती के लोग संक्रमित हुए थे और मौत तो एक भी व्यक्ति की नहीं हुई थी। 25 अप्रैल, 2009 को अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन से आग्रह करता है कि एच1एन1 को जन स्वास्थ्य आपातकाल के तौर पर घोषित कर दे। लेकिन उस दिन तक अमेरिका में एच1एन1 के केवल 20 मरीज थे। दूसरी ओर चीन को देखिए। कोविड-19 को 30 जनवरी को पब्लिक इमरजेंसी घोषित किया गया लेकिन तब तक चीन में 9.6 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके थे और 213 लोगों की मौत हो चुकी थी। दोनों मामलों में अंतर देखिए। जाहिर सी बात है, अगर कोई संक्रमण होगा, तो कहीं न कहीं से इसकी शुरुआत होगी। यह कहीं से भी हो सकता है और किसी देश को इसके लिए अछूत नहीं करार दिया जा सकता कि उसके यहां किसी संक्रमण की शुरुआत हुई। लेकिन अगर कोई देश जानकारी छिपाए, आधी-अधूरी जानकारी दे, मामले पर लीपापोती करने की कोशिश करे तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती ? ये दोनों केस अपने आप में दोनों देशों के आचरण की कहानी कह देते हैं। और जब जिम्मेदारी बनेगी तो क्या मुआवजा देना नहीं बनेगा ?
लेहमन ब्रदर्स की आड़ से बाहर निकलो
चीन कहता है कि लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया होने के कारण पूरी दुनिया आर्थिक संकट में आ गई, तब तो किसी ने अमेरिका को दोषी नहीं ठहराया, उससे मुआवजा नहीं मांगा तो आज क्यों? क्योंकि दोनों में अंतर है। लेहमन ब्रदर्स के संकट को अमेरिका ने छिपाया नहीं। यह ग्लोबल विलेज के झंडे तले आर्थिक उदारीकरण के दौर में एक-दूसरे से जुड़े देशों की अर्थव्यवस्था का साझा संकट था। उसके कारण उन तमाम देशों को ज्यादा नुकसान हुआ जो ज्यादा खुले हुए थे, एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। यह किसी व्यवस्था के किसी दोष के बाहर आ जाने जैसा था।
उल्टी-सीधी दलीलों के साथ अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे चीन की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहां पारदर्शिता की कमी है। और यह वह चीज है जिसके नाम से जैसे चीन में जलजला आ जाता है। आया करे। आपके घर का मामला है। तमाम कम्युनिस्ट शासनों का जो हुआ, वह आपके साथ कब होगा, कैसे होगा यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन जब आप दुनिया से व्यवहार करते हैं तो आपको पारदर्शिता तो बरतनी होगी। खास तौर पर जब किसी विपत्ति की जड़ आप तक जाती दिखती हो। आज अमेरिका का मसौरी प्रांत आपसे मुआवजा मांग रहा है। यह इतिहास में पहली बार है जब आधिकारिक तौर पर किसी देश से मुआवजा मांगा जा रहा हो। आने वाले समय में इस तरह के और उदाहरण सामने आएंगे। घर के भीतर जो कर रहे हो, घर के बाहर भी करोगे तो कौन छोड़ देगा ?