संयम बरतें, शांत रहें कोरोना से भी पार पा लेंगे

    दिनांक 27-अप्रैल-2020
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आलोक कुमार
28 अप्रैल मंगलवार को जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की जयंती हैं। एकात्मता का सन्देश, मनुष्य मात्र की समता, इसका अध्यात्मिक आधार कि सब मनुष्यों में वही ईश्वर रहते हैं, उन्होंने दिया था। कर्मकांड का विरोध किया था। अद्वैत ब्रह्म की पुनर्स्थापना की थी। भारत को संगठित किया था

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विश्व कोरोना से जूझ रहा हैं। नंगी आंखों से अदृश्य एक छोटा वायरस पूरी मानवता को चुनौती दे रहा है। इसके पहले भी समाज ने बहुत सारे संकटों को झेला है। कभी अकाल पड़ता है, कभी अतिवर्षा होती है, कभी तूफान आता हैं, भूकंप आते हैं, ज्वालामुखी फटते हैं। परन्तु इस बार की चुनौती प्रकृति या ईश्वर के द्वारा नहीं लाई गई है।
मनुष्य के विनाश का प्रयत्न करने वाले, कम से कम उसके साजो सामान इकठ्ठा करने वाले चीन में केमिकल वेपन्स बनाने के लिए प्रयोग करने वाली प्रयोगशाला में से यह वायरस उचक और छिटक कर बाहर आ गया और दुनिया भर में फ़ैल रहा है। इसलिए इस बार यह प्रकृति का कोप नहीं है यह मनुष्य की दुष्टता की लीला हो रही है।
अभी तक जब कभी विपदाएं आती थी तो पिछड़े और विकासशील देशों पर बड़ा प्रहार करती थी। इस बार अफ्रीका का नाम नहीं आ रहा, सब-सहारन देशों का नाम नहीं आ रहा। भारत भी इससे लड़ने में अपने आप को तैयार है। इस बार का नुकसान कहां हो रहा है ?
हम देखें कि जो दुनिया के सिरमौर बनते हैं, जिनके जीवन में गति है; निरंतर हवाई जहाज के द्वारा यहां से वहां भागना; जिनके पास में प्रचंड कर्म है, जो संपन्न हैं, विश्व में लक्ष्मी की सम्पूर्ण सम्पदा अपने पास समेटने की होड़ लगाते हैं, जो प्रगत हैं, सुविधा और लक्ज़री के सब सामानों को अपने चारो ओर इकठ्ठा करके ऐश्वर्य का जीवन जीते हैं: जिनका आधिपत्य माना जाता है: विश्व को खेमों में बांट कर अपने बल का, सामर्थ्य का प्रसार दिखाते है : वही बिलबिला रहे हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, ईटली, दुनिया की बादशाहत करने वाले देश इस वायरस के सामने लाचार खड़े हैं।
तो फिर इससे बचाव कैसे हो ? हमारे भारत का अनुभव कैसा है? क्या करना पड़ेगा बचने के लिए? कोई दवा ? न तो कोई दवा है न कोई वैक्सीन? फिर क्या ?
तो एक प्रगत जीवन के लिए जो आवश्यक समझा जाता है उस सब से दूर हो जाओ।
गति कम करो, भाग-दौड़ बंद करो, शांत हो जाओ, अपने घर में रहो, अपने परिवार के साथ रहो। घर में सीमाबद्ध हो करके। डिप्रेशन नहीं हो, इसके लिए थोड़ा ईश्वर को स्मरण करो, थोडा आसन व्यायाम करो, परिवार से बात करो, संयम करो। तो जिस गति को और प्रचंडता को हमने प्रगति का निशान माना था उस गति और प्रचंडता से दूर होना। अपने आप को वापिस लेना: अकेला यही मार्ग है।
और हम सबको घर में बैठा कर भगवान अपनी प्रकृति में आवश्यक मरम्मत कर रहे हैं हवा शुद्ध हुई है, नदियों का जल शुद्ध हो गया है ओज़ोन की लेयर अपने आप को ठीक कर रही है। प्रकृति स्वस्थ हो रही है।
प्रकृति अस्वस्थ तो हमने की थी न फिर? हमने बिगाड़ा था यह सब। श्रीमद शंकराचार्य के जन्म जयंती पर हमको विचार करना चाहिए कि जिसको हम प्रगति कहते हैं वो प्रगति है कि नहीं पैसा कमाना, पैसे से वस्तुएं खरीदना, अनावश्यक संग्रह करना, आराम के साधन बढ़ाये जाना, पैसा नहीं हो तो क्रेडिट पर जीना, उधार ले-लेकर चीज़ें इकठ्ठी करना। अपने हाथ से श्रम न करना पड़े, अपने शरीर को मेहनत न करनी पड़े; सब काम मशीन करे; ऐसे साधन क्या संग्रह, संग्रह के लिए भाग-दौड़ यही प्रगति है? यही प्रगति होती तो भरभरा के इस तरह ताश के पत्तों की तरह सब ढह न रहा होता ?
आजकल कहते हैं विदेश होकर आए हो न, तो सबको गौरव से मत बताना कि तुम विदेश होकर आए हो; लोग डर जाएंगे।
क्वारंटाइन में जाओ, अकेले रहो। क्यों अकेले रहो ? अकेले रहने से इलाज में तो कोई असर नही पड़ता ? अरे अकेले इसलिए रहो की बाकी सब लोग स्वस्थ रहें: बाकी सब लोग ठीक रहें। हम सब में वहीं आत्मा है। औरों को स्वस्थ रखना है इसलिए मैं क्वारंटाइन में रहूंगा। कहां पहुंच रहे हैं, उसी एकात्म भाव में न ?
भारत में एक अद्भुत अनुभव आया। प्रधानमंत्री ने शाम को घोषणा कि आज रात से लॉकडाउन है। हवाईजहाज, रेल, बस बंद हो गई। कारखाने लघु उद्योग बंद हो गए। दुकान, बाज़ार, मॉल बंद हो गए। रोज कमाने खाने वाले, रिक्शा वाले, रेहड़ी वाले इन सब के साधन बंद हो गए। भारत में एक चमत्कार दिखा। कुछ हफ्ते पहले एक सर्वे छपा कि भारत के 42 प्रतिशत लोगों पर भोजन खरीदने के पैसा नहीं हैं और उसमें से यह भविष्यवाणी छपी कि एक हफ्ते में लोग भोजन के लिए दंगे पर उतर आएंगे। सर्वे ने घोषित कर दिया कि फ़ूड रायट्स होंगे। ओहो!
कई हफ्ते बीत गये खाने के लिए दंगे नहीं हुए। ऐसा नहीं कि केवल संघ और विश्व हिन्दू परिषद् ने भोजन की व्यवस्था की है। हमारे मंदिर, हमारे मठ, हमारे गुरूद्वारे, डेरे, आश्रम सभी ने अपने भण्डार खोल दिए। कितना बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर, कितने साधन? सब खर्च हो जाने दो। कोई भूखा नहीं सोयेगा। आरडब्ल्यू, क्लब्स, छोटी मोहल्ले की व्यापार एसोसिएशनस, जिनको भी भगवान ने चार पैसे दिए हैं वो उसमें से दो पैसे इस बात के लिए बांटने पर तैयार कि जहां भोजन की आवश्यकता है, वहां पका हुआ भोजन या सूखा राशन दो।
काम धंधे तो बंद है कब तक चलेंगे पता नहीं। अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाएगी। इस कोविड का असर तो बाद तक भी होगा पैसा बचाओ। पर यह नहीं हुआ। पैसा तो लोग दान कर रहे हैं, अन्न दान कर रहे हैं कि कहीं कोई भूखा तो नहीं रह रहा।
इसकी प्रेरणा क्या हो सकती हैं? इसकी प्रेरणा भौतिकतावाद तो नहीं हो सकती। इसकी प्रेरणा अधिक से अधिक संग्रह और भोग की प्रवृति नहीं हो सकती। स्टैण्डर्ड ऑफ़ लाइफ नहीं हो सकती। इसकी प्रेरणा तो 'अहम् ब्रह्मास्मि त्वम् अपि' यही हो सकती है।
यह शुभ प्रेरणा हमको श्रीमद जगद्गुरु शंकराचार्य के उपदेशों से मिलती है। विवेकानंद जी के उपदेशों से मिलती है। स्वामीजी जिस समय प्लेग से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए जुटे हुए थे तो उन्होंने उस समय की भाषा में कहा था कि ये चांडाल, ये डोम, ये भंगी, ये मेहतर, माय पीपल्स, माय ब्रदर्स क्या माय ब्लड नहीं, तुम इनको छोटा क्यों कहते हो? अछूत क्यों कहते हो? मेरे भाई, मेरे परिवार मेरे रक्त के हैं। वेदांत कहता है सब मनुष्यों में ईश्वर विराजमान है।
इसलिए मैं भोजन करूं और मेरे पड़ोस का व्यक्ति भूखा रह जाये यह ईश्वर की अवज्ञा है, यह महापाप है। कल जो होगा भुगत लेंगे, जो समय आएगा निबटा लेंगे। कोई भूखा नहीं सोएगा, मेरे सारे साधन भगवान् ने दिए है, भगवान के काम में मैं उनको खर्च कर दूंगा। ऐसा शुभ संकल्प ये हमारे वेदांत के संस्कारों से हमें मिलता है।
एक तरफ आसुरी शक्ति है, जिसके तहत प्रयोगशाला में प्रयत्नपूर्वक ये वायरस पैदा किया जाता है, कैमिकल वैपन के प्रयोग से दुनिया पर कब्ज़ा करने की आकांक्षा। इन आकांक्षाओं की स्पर्धा से शांति नहीं आयेगी, सुख नहीं आएगा। संतोष नहीं आएगा। इससे निकलना होगा। संग्रह और भोग की मानसिकता से निकलना होगा। संयम होना, जीवन का उद्देश्य होना, वह उद्देश्य मानव की प्रगति के साथ में समस्वर होना। इस प्रकृति में ईश्वर देख कर के इसका नुकसान नहीं करना। सब मनुष्यों में ईश्वर देख करके सबके साथ बढ़ने की कामना करना। इसी एकात्म बोध को हम शंकराचार्य जी की जयंती पर पुनः अपने मनों में स्थिर करें, भक्तिभाव से धारण करें तो कोरोना संकट निबटेगा और बाद की दुनिया शुभ और आनंद की दुनिया होगी।
लेखक विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष हैं