दस जनपथ वाले गिरोह का हिस्सा हैं इस्लामोफोबिया की आड़ लेकर सियासी रंग देने वाले सेवानिवृत्त अफसर

    दिनांक 27-अप्रैल-2020
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डॉ. अजय खेमरिया
इधर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर साम्प्रदायिकता का वायरस फैलाने का आरोप लगाया उधर पहले से तैयार स्क्रिप्ट को 101 सेवानिवृत्त अफसरों ने बांचना शुरू कर दिया। ठीक अवार्ड वापसी गैंग की तर्ज पर। मीडिया में खबर ब्रेक हो गई कोरोना संकट में मुसलमान फिर से विमर्श के केंद्र पर आ गए। इस बार मोर्चा संभाला दस जनपथ से सत्ता की मलाई चाटने वाले पूर्व ब्यूरोक्रेट्स गिरोह ने

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इधर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर साम्प्रदायिकता का वायरस फैलाने का आरोप लगाया उधर पहले से तैयार स्क्रिप्ट को 101 रिटायर अफसरों ने बांचना शुरू कर दिया।ठीक अवार्ड वापसी गैंग की तर्ज पर। मीडिया में खबर ब्रेक हो गई कोरोना संकट में मुसलमान फिर से विमर्श के केंद्र पर आ गए। इस बार मोर्चा संभाला दस जनपथ से सत्ता की मलाई चाटने वाले ब्यूरोक्रेट्स गिरोह ने।
101 का अंक यूं तो सनातन संस्कृति में बड़ा शुभ माना जाता है लेकिन लिबरल कम्पनी ने इसे क्यों चुना, यह समझ से परे है। इस गिरोह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ सुर में सुर मिलाकर क्या लिखा है, इस पर चर्चा करने से पहले आइये इन पूर्व अफसरों की विशिष्टताओं को जानने का प्रयास करें। इनकी निष्ठाओं को समझा जाये, क्योंकि पत्र के साथ यह विशेषण जोड़ा गया है कि वे सभी गैर राजनीतिक और निष्पक्ष अफसर है। सबसे पहले पूर्व कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर की निष्पक्षता को जानिये। सोनिया गांधी के रिमोट नियंत्रित मनमोहन सरकार ने इन्हें देश के सबसे बड़े अफसर के रूप में नियुक्ति दी। इनसे पहले इस पद पर दो वर्ष का कार्यकाल नियत था और सरकार छह छह महीने अधिकतम एक साल एक्सटेंशन दे सकती थी।जनाब सोनिया को इतने भाए की नया कानून ही बना दिया गया कि कैबिनेट सचिव का कार्यकाल 4 साल होगा।
बजाहत हबीबुल्ला भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त हुए थे 2005 में। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के चहेते अफसर। हाल ही में वे शाहीन बाग धरना समाप्त कराने के लिए वार्ताकार बनाकर भेजे गए थे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में आकर हलफनामा दाखिल किया कि शाहीन बाग का धरना शांतिपूर्ण है और विधिसम्मत। मोदी सरकार के लिए अपनी जहरीली मानसिकता को गाहे बगाहे हबीबुलल्ला जाहिर करते रहते है।
एस दुलत 1965 बैच के आईपीएस हैं। यह वही दुलत हैं जो पुलवामा हमले को मोदी की साजिश बता चुके है। सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने और अलगाववादी कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा वापसी पर ये रूदाली करते रहे हैं। मोदी सरकार के धुर विरोधी दुलत 2005, 2006, 2007 को संप्रग कार्यकाल का स्वर्णिम दौर बताते रहे हैं। फिर भी ये निष्पक्ष हैं।
अफसरी गिरोह के सदस्य दिल्ली के उपराज्यपाल रहे नजीब जंग मनमोहन सिंह के कृपापात्र रहे हैं। मध्य प्रदेश कैडर के इस पूर्व अधिकारी की पहचान कपिल सिब्बल के खास मित्र की भी है। चे ग्वारा का पेंडल गले मे पहनकर जामिया के वीसी रह चुके हैं। इन परम निष्पक्ष जंग की दलीलें नागरिकता कानून पर सबने सुनी और देखी हैं। नजीब का खानदान हैदराबाद निजाम की अर्दली करता था, जो सऊदी अरब से आकर भारत बसा है।
जुलियो रिबेरो पंजाब के डीजीपी औऱ मुबई के पुलिस कमिश्नर रहे हैं। हिन्दू आतंकवाद की नकली थ्योरी गढ़ने के लिए इनके योगदान को भी समझने की जरूरत है। साध्वी प्रज्ञा के मामले में एनआईए की जांच पर सवाल उठाने वाले रिबेरो कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय को तानाशाही और चालाकी भरा बता चुके। मोदी के सत्ता में आते ही इन्होंने कहा था कि अब भारत भी पाकिस्तान बन जायेगा। हिन्दू तत्व हावी हो जाएंगे।
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस वाय कुरैशी की निष्ठा तो स्वयंसिद्ध है ही। दिल्ली चुनाव में इनकी अतिशय सक्रियता को कैसे एक उप निर्वाचन अधिकारी ने आईना दिखाया था, सबको पता ही है। सचाई यह है कि 101 अफसरों का यह गैंग कांग्रेस और वामपंथ की बी टीम है।
भारत में इस कमिटेड ब्यूरोक्रेसी की शुरुआत इंदिरा गांधी ने की थी। 1971 में उन्होंने न केवल अफसरशाही बल्कि प्रतिबद्ध न्यायपालिका की मंशा को भी सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त किया था। जिन 101 अफसरों ने यह पत्र मुसलमानों के भेदभाव को मुद्दा बनाकर लिखा है, उनमें अधिकतर इंदिरा गांधी के दौर से संबंधित हैं और वही कर रहे हैं, जो उनकी प्रतिबद्धता मांगती है। हर्ष मन्दर, अशोक वाजपेयी, अरुणा राय जैसे तमाम नाम हैं जो 2014 से ही अपना संतुलन खो बैठे हैं। अशोक वाजपेयी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के चहेते अफसर रहे हैं। उन्होंने अवार्ड वापसी गिरोह का नेतृत्व किया था अखलाक की लिंचिंग पर। आजकल वे चुप हैं पालघर की घटना पर।क्योंकि अब वहां शिवसेना और उद्धव ठाकरे कांग्रेस की गोद में बैठे हैं। साहित्य की आड़ में अशोक वाजपेयी ने अपनी अफसरी प्रतिबद्धता को साबित करने में कोई कसर नही छोड़ी।
सवाल यह है कि इन 101 अफसरों ने सोनिया गांधी के साथ ही आवाज उठाना क्यों मुनासिब समझा ? क्या वाकई मुसलमान कोरोना में भेदभाव का शिकार हो रहे है ? क्या सरकार ने ऐसा कोई कदम उठाया है, जो मुसलमानों के विरुद्ध है ? क्या जानबूझकर कोरोना संक्रमण को छिपाना महामारी एक्ट में अपराध नही है ? क्या सरकार ने मुसलमानों को इलाज से वंचित रखने की कोई मंशा जाहिर की है ? कोई ऐसा मामला देश भर में है, जहां किसी मुस्लिम को जांच से मना किया गया हो ? हकीकत तो यह है कि तबलीगी जमात ने कोरोना संक्रमण को जिहादी मानसिकता के साथ फैलाने का अपराध किया है। कांग्रेस की छत्रछाया में बिषबेल की तरह आच्छादित वामपंथी बुद्विजीवियों को अल्पसंख्यक के नाम पर केवल मुसलमान ही नजर आते हैं, क्योंकि वे पारसी, जैन, सिख की तुलना में सियासत को निर्णायक सूरत देने के सक्षम है। बेहतर होता यह अफसर अपनी सेकुलर अपील का प्रयोग मुसलमानों के लिए कोरोना लड़ाई में सहयोग के उद्देश्य से जारी करते। लेकिन मोदी से नफरत और अपनी सुविधा परस्त प्रतिबद्धता के चलते इन अफसरों के लिए ऐसा करना असंभव है।
2014 में असहिष्णुता के नाम पर खुली दुकानदारी 2019 में जनता ने बंद कर दी है। मोदी को बदनाम करने की वैश्विक हरकतों से भी ब्रांड मोदी कमजोर नहीं हो पा रहा है। तब इस्लामोफोबिया खड़ा कर भारत और मुस्लिम ब्रदरहुड देशों में वातावरण खराब करने के लिए यह नया पैंतरा लिबरल—लेफ्टिस्ट—कांग्रेस गठबंधन ने रचा है। इस्लामोफोबिया के जरिये, भारत के बाहर अप्रवासियों की मुश्किलें खड़ी की जाएं और बुनियाद मोदी की तथाकथित मुस्लिम विरोधी कोरोना जंग को बनाया जाय। यही इस गिरोह का उद्देश्य है। मोदी से दुश्मनी निभाने के लिए यह वर्ग किसी भी हद तक जा सकता है। याद कीजिये कैसे 50 साहित्यकारों ने अशोक वाजपेयी के नेतृत्व में ब्रिटिश पीएम तक को पत्र लिखकर अवार्ड वापसी पर मोदी से चर्चा का आग्रह तक कर डाला था। इन 101 अफसरों की कुंठा को आज आम भारतीय समझ चुका है। ऐसे में इनकी हरकतों से भारत का जनमानस अब प्रभावित नहीं होता है।