आद्य शंकराचार्य जयंती- वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक

    दिनांक 28-अप्रैल-2020
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पूनम नेगी
 
आदि शंकराचार्य का आगमन ऐसे समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के हमलों और षड्यंत्रों के कारण सनातन संस्कृति अपना ओज खो रही थी। ऐसे में उन्होंने न केवल वैदिक धर्म-संस्कृति की रक्षा की, बल्कि राष्ट्रीय भावना को मुखरित और जाग्रत करने के लिए चार धामों की स्थापना भी की
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आदि शंकराचार्य का आगमन उस समय हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं के षड्यंत्रों के कारण सनातन धर्म-संस्कृति खतरे में थी। 32 वर्ष की अल्पायु में वैदिक चिंतन और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने जो प्रयास किए उससे न केवल देश में राष्ट्रीय भावना मुखरित व जाग्रत हुई, बल्कि उन्होंने देश के चार कोनों में चार धामों– ब्रदीनाथ (उत्तर), रामेश्वरम (दक्षिण), जगन्नाथपुरी (पूरब) और द्वारिका (पश्चिम) की स्थापना कर देश में सांस्कृतिक जागरण का अपना दायित्व निभाया। साथ ही, राष्ट्रवाद की भावना को भी बलवती बनाया। इन धामों की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य राष्ट्र और संस्कृति को बचाना था।
शंकराचार्य का जन्म करीब 1200 साल पहले केरल के एक ब्राह्मण परिवार में बैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। उनके पिता शिवगुरु तैतरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। महज तीन-चार वर्ष की आयु में ही शंकराचार्य की बौद्धिक प्रतिभा दिखने लगी थी। सात वर्ष की आयु में वह कई शास्त्रों के ज्ञाता बन गए। उस युग के ख्यातिनाम ज्योतिषियों ने कुंडली देख कर बताया कि बालक अत्यंत दुर्लभ महापुरुष होगा, लेकिन इसकी आयु बहुत कम होगी। यह सुनकर शंकर की मां चितिंत हो गईं। एक ओर बालक शंकर अपना जीवन देश को अर्पित करने को तत्‍पर थे तो दूसरी ओर मां बेटे को अपने से अलग नहीं होने देना चाहती थी। बालक शंकर ने युक्ति से काम लिया। एक दिन वह मां के साथ नदी स्नान करने गए। तैरते-तैरते वह बीच नदी में पहुंच गए और चिल्लाने लगे,‘‘मां, मगरमच्छ ने मुझे पकड़ लिया है। अब केवल भगवान शंकर ही मेरी रक्षा कर सकते हैं। यदि तू मुझे उनको अर्पित कर दे तो मेरी जान बच सकती है।’’ मां के पास बेटे की बात मानने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। इस तरह, मात्र आठ वर्ष में घर त्याग कर वह मीलों का कष्टकारी सफर तय कर वेदांत के प्रकांड विद्वान महायोगी गोविंदपाद के पास पहुंचे। उनसे गुरु दीक्षा व संन्यास ग्रहण किया और दो वर्ष में ही अपनी शिक्षा पूरी कर ली।
इसके बाद गुरु आज्ञा से अपने वयोवृद्ध गुरु भाइयों के साथ काशी में जब उन्होंने वेदांत के गूढ़ रहस्यों पर प्रवचन दिया तो वहां हलचल मच गई। उन्होंने बड़े-बड़े पंडितों की शंकाओं का समाधान कर वेदांत-मत का प्रतिपादन किया। उस समय उनकी आयु 11 वर्ष थी। काशी प्रवास के दौरान ही उनका छुआछूत पर अहंकार भी टूटा था। हुआ यूं कि एक दिन शंकराचार्य प्रात:काल नदी में स्नान कर लौट रहे थे कि एक चांडाल से छू गए। चांडाल पर अपवित्र करने का आरोप लगाते हुए उसे भला-बुरा कहने लगे। इस पर चांडाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘महाराज! संन्यास लेकर संत तो बन गए। वेद पढ़कर पंडित भी बन गए, पर तुच्छ देह का अभिमान नहीं गया। सबके शरीर में एक ही आत्मा का निवास है, इस सत्य को जाने बिना आपका संन्यास दिखावा है।’’ उसकी बातों ने शंकाराचार्य की आंखें खोल दीं।
शंकराचार्य के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर म्लेच्छों की दृष्टि थी। ऐसे संक्रमण काल में देश में विलुप्त वैदिक संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा करना उनकी राष्ट्र निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण अंग था। उन्होंने देशभर में वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णुगुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित कर उनके सहयोग से वेद धर्मानुयायियों की एक विशाल धर्म सेना बनाई और पूरे भारत में धर्म सुधार किया। इससे पूरे देश में फिर से वैदिक धर्म का शंखनाद गूंजने लगा। भगवान बुद्ध ने धर्म में आए गतिरोध व कुरीतियों को दूर करने के लिए बौद्ध मत की स्थापना की थी, लेकिन बौद्ध मतावलंबी ही जब हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने लगे और बौद्ध मठ वामाचार के केंद्र बनने लगे तो शंकराचार्य ने पूरे देश में पदयात्रा कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। बौद्धों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के बाद उन्होंने वैदिक धर्म के उत्कर्ष के लिए पाशुपत, शाक्त, तांत्रिक, शैव, माहेश्वर, वैष्णव आदि संप्रदायों के मठाधीशों को चुनौती दी, जिन्होंने धार्मिक कुरीतियों का प्रचार कर लोगों को कुमार्गी बना दिया था। उन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैतरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद के भाष्य लिखकर नई विचार क्रांति को जन्म दिया। मंडन मिश्र और कुमारिलभट जैसे समकालीन बौद्ध विद्वानों से धर्म की उपादेयता पर शास्त्रार्थ कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया। इसके बाद उन्होंने जगन्नाथपुरी, उज्जयिनी, द्वारिका, कश्मीर, नेपाल, बल्ख, कांबोज तक पदयात्रा की और वैदिक धर्म का जयघोष किया।
बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान आचार्य मंडन मिश्र के साथ भी उनका शास्त्रार्थ हुआ। शर्त थी कि शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र पराजित हुए तो उन्हें संन्यास ग्रहण करना पड़ेगा, जबकि शंकराचार्य पराजित होते तो उन्हें गृहस्थ जीवन स्वीकार करना था। शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने निभाई। एक रोचक घटनाक्रम में शंकराचार्य विजयी हुए और मंडन मिश्र को संन्यास लेना पड़ा। इस तरह शंकराचार्य ने वैदिक ज्ञान की सर्वोच्चता साबित की। देश भ्रमण के दौरान जब वह बद्रीनाथ धाम पहुंचे तो उन्हें मूर्तिविहीन देवालय की दुर्दशा का पता चला। बौद्धों ने नारद कुंड में मूर्ति फेंक दी थी। उन्होंने स्वयं नारद कुंड से देव प्रतिमा निकाली, पर विग्रह का एक पांव खंडित था। पंडितों ने खंडित विग्रह की स्थापना का विरोध किया, पर शंकराचार्य के तर्कों से वे निरुत्तर हो गए। अंतत: मूर्ति जोड़कर पुन: उसकी प्रतिष्ठा की गई। जीवन के अंत समय तक शंकराचार्य धर्म को प्रतिष्ठित करने में लगे रहे और अल्पायु में जगद्गुरु की पदवी पााई।
ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या के प्रतिपादक
अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य का चिंतन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इसके अनुसार, परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण, दोनों ही स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने वेदों को ईश्वर की वाणी कहा और पूरे देश में उसका प्रचार-प्रसार किया। उनके अनुसार सत्य वही है जो जैसा है वैसा ही दिखे। इसी आधार पर उन्होंने ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या बताया। उनका कहना था कि संसार में सब कुछ बदलता रहता है। नहीं बदलता है तो केवल आत्मा और ब्रह्म। उन्होंने पांच अद्भुत सूत्र दिए- सेवा, साधना, सत्कर्म, स्वाध्याय और परमात्मा के प्रति समर्पण भाव। उन्होंने कहा कि जन्म से हर आदमी शूद्र है, उसकी जाति का निर्धारण कर्मानुसार होता है।
शंकराचार्य मंदिर: कला-संस्कृति की अनुपम धरोहर
जम्मू-कश्मीर स्थित भव्य शंकराचार्य मंदिर कला-संस्कृति व पुरातात्विक दृष्टि से भी अति विशिष्ट है। श्रीनगर में डल झील के पास पहाड़ी पर स्थित हजारों साल पुराने इस अष्टकोणीय मंदिर को प्रस्तर वास्तु शिल्प का नायाब नमूना माना जाता है। इस शिव मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कश्मीर के राजा गोपादित्य ने ई.पू. 371 में कराई थी और इसकी देखरेख व पूजापाठ का जिम्मा स्थानीय अग्रवर्ती ब्राह्मणों को सौंपा था। शुरू में इस मंदिर का नाम गोपादारी मंदिर था जो बाद में शंकराचार्य मंदिर हो गया। कहते हैं कि पदयात्रा के क्रम में शंकराचार्य कश्मीर भी गए थे और श्रीनगर के इस पहाड़ी शिव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की थी। उस समय अग्रवर्ती ब्राह्मणों से उनका शास्त्रार्थ भी हुआ था। शास्त्रार्थ में जीतने के बाद अग्रवर्ती ब्राह्मणों ने पारितोषिक के तौर पर मंदिर ही शंकराचार्य को समर्पित कर दिया।