#काफिरोफोबिया :तब्लीगियों की गलती को उजागर करना इस्लाम विरोधी कैसे ?

    दिनांक 28-अप्रैल-2020
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राहुल कौशिक 
देश में कुछ लोग मानसिक महामारी से पीड़ित हैं। चायनीज वायरस को जो जमाती बढ़ा रहे हैं, उनके बचाव में वे लोगों को डराने और ‘इस्लामोफोब’ ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली से दुबई तक एक अजीब माहौल बनाने की काशिशें की जा रही हैं
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एक अप्रत्यक्ष शत्रु से लड़ते हुए दुनिया में स्थितियां कुछ ऐसी हो चली हैं, जिसमें बड़े से बड़े देश का राष्ट्राध्यक्ष भी घुटने टेक दे रहा है। इसके बावजूद भारत बहुत ही मजबूती से लड़ रहा है और आगे भी बढ़ रहा है। आबादी के लिहाज से दुनिया का दूसरा और घनत्व के हिसाब से एक जटिल देश भारत चायनीज वायरस से लगातार लड़ कर अमेरिका, इटली और चीन जैसे देशों से बेहतर प्रयास कर रहा है, यह अपने आपमें एक सफलता है। और यही कुछ लोगों की आंख की किरकिरी बना हुआ है।
देश के अंदर ‘अल्लाह की एनआरसी’; ‘मोदी की चाल’ तो कहीं ‘दीन के लोगों को कोरोना नहीं होता’ जैसी बातें इस तेजी से फैलीं कि यह अपने आपमें भारत के अंदर एक महामारी बन चुकी है, मानसिक महामारी! जब इस देश के लोगों ने हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई को चरितार्थ करने के हर प्रयास किए तब कुछ लोग ऐसे भी थे, जो इस विश्वास को तोड़ने में लगे थे। भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ मुसलमान कभी अरबी शेखों के पग नहीं पखारता है, लेकिन एक सोच ऐसी डाली गई जिसमें इस देश के मुसलमानों को इस देश की संस्कृति से इतर जाकर ऐसा महसूस कराया गया जैसे यह धरती उनके लिए कोई युद्धक्षेत्र है, जिसे उन्हें जीतना है। ऐसा दिखाने का प्रयास किया जाता है, जैसे देश के अल्पसंख्यक आबादी में अकेले वही हैं, जबकि वे इस देश के दूसरे बड़े बहुसंख्यक हैं।
तब्लीगी जमात का मामला कुछ वैसा ही था, जहां ऐसी ही सोच के लोगों के जमावड़े ने पूरे देश में चायनीज वायरस का दंश फैला दिया। लेकिन उससे भी खतरनाक वह सोशल मीडिया था, जहां इस प्रकार के जहर को हवा दी गई। कोई मेरठ के बाजारों में घूमता हुआ दिखाई दिया, तो कोई देश के प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए, किसी को मास्क मात्र ‘एक कपड़े का टुकड़ा’ लगता है, तो किसी को यह ‘अल्लाह की एनआरसी’ लगती है। पढ़े-लिखे लोगों को इसमें यदि तब्लीगियों की गलती लगती भी है, तब भी वे सरकार को ही दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि आखिर सरकार क्या कर रही थी ? जबकि प्रशासन और सरकार द्वारा हर गली, मोहल्ले में यह घोषणा की जा रही थी कि कोई भी विदेशी यदि छुपा हुआ है तो उसको हमारे हवाले कर दें, हम उनका इलाज करेंगे। आश्चर्य तब होता है जब मुक्केबाज विजेंद्र सिंह जैसा व्यक्ति ऐसी विचारधारा को प्रोत्साहित करता दिखता है। वह व्यक्ति जिससे सार्वजनिक जीवन में लोग बेहतर उदाहरण रखने की अपेक्षा रखते हैं।?
अब एक नया चलन शुरू हुआ है। विदेशों में और विशेष रूप से खाड़ी देशों में नौकरी कर रहे एक विशेष समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ‘इस्लामोफोबिया’ नाम का एक ऐसा शब्द उछाल कर उन सभी लोगों की नौकरियों को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है, जिन्होंने गलत को गलत कहने का साहस किया था। पिछले कुछ दिनों से उन सभी भारतीयों के एकाउंट्स को सोशल मीडिया पर रिपोर्ट किया जा रहा है, जिन्होंने तब्लीगी जमात और मौलाना साद के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई थी। खाड़ी देशों में नौकरी कर रहे लोगों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि वे ऐसे राष्ट्र में हैं, जहां बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों की है।
 

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प्रख्यात गायक सोनू निगम द्वारा पांच वक्त की अजान पर किया गया आग्रह और उसके बाद उनका सिर कलम करके लाने वाले को इनाम दिए जाने की घोषणा करने वाले मौलाना की खबर अधिक दिन पुरानी नहीं है। सोनू का इतना कहना था कि, ‘क्या ईश्वर से आप लाउडस्पीकर पर अजान देने से ही जुड़ सकते हैं ? कहा जाता है कि देश में सबको अपने मत-पंथ पर चलने का अधिकार है, ठीक भी है, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आपके अधिकारों के साथ क्या आपको अपनी जिम्मेदारियों का आभास है ?’
आजकल सोनू दुबई में हैं और उनको वहां परेशान करने के लिए बाकायदा ट्विटर, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंच से आह्वान किया जा रहा है। क्या मुस्लिमों को यह महसूस होता है कि यदि उनके किसी कार्य से लोगों को तकलीफ होती है तो वे उसका समाधान निकालें ? यह प्रश्न सभी के मन में है, बस सोनू निगम ने यह बात स्पष्ट रूप से बोल डाली जिसके बाद इतना अधिक दबाव बनाया गया कि उनको अपना एकाउंट हटाना पड़ा। स्वयं वह जिस क्षेत्र में काम करते हैं उसी क्षेत्र का बुद्धिजीवी वर्ग इस पूरी घटना पर शांत था। यह वर्ग आज भी शांत है, जैसे वह कोई मूकदर्शक हो। स्पष्ट है कि यदि आप हमारे किसी गलत कार्य के विरुद्ध बोलेंगे, तो आपका यही अंजाम होगा।
ऐसा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है, जैसे इस देश के अंदर ‘इस्लाम विरोधी’ लहर चल पड़ी है। सवाल यह है कि तब्लीगियों की गलती को उजागर करना इस्लाम विरोधी कैसे ? दुनिया में जब चायनीज वायरस जैसी भयंकर बीमारी चल रही है, तब इस देश में कुछ लोग भगवान के रूप में कार्य कर रहे चिकित्सकों पर थूकते हैं, पत्थर मारते हैं, तब प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि इस प्रकार की जाहिलियत आखिर फैली कैसे ?
सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात से होता है, जब प्रख्यात लोगों द्वारा इस घटना पर चुप्पी साध ली जाती है। कई लोग तो इस बात का सबूत मांगने लग जाते हैं कि अस्पताल के वार्ड में तब्लीगी जमातियों ने वैसा घृणित कार्य किया भी है या नहीं ? दु:ख होता है कि जो व्यक्ति आपकी जान बचाने के लिए लगा है, उसकी जगह आप उन लोगों के लिए सबूत मांग रहे हैं, जो आपकी जान के दुश्मन बने हुए हैं ? जैसे कि देश के चिकित्सक झूठे हैं ? और सबूत दिखाएं भी तो किनको ? जिन्हें स्पष्ट रूप से फलों पर थूकता हुआ फलवाला दिखाई नहीं देता ? टिक टॉक पर स्पष्ट रूप से तालाबंदी को तोड़ने का संदेश देने वाले लोग दिखाई नहीं देते ? सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि सभी प्रकार की सुविधाएं देने के लिए जिस प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा किया जाता है, वही प्रधानमंत्री जब आपके स्वास्थ्य के लिए एक आग्रह करता है तो आप उसको ही नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं ? तालाबंदी को निरंतर असफल बनाने के प्रयास होते हैं और मुख्यत: उन जगहों पर जहां एक विशेष समुदाय के लोगों की आबादी अधिक है।
देश में चायनीज वायरस फैलाने के पीछे मुख्यत: कौन हैं, यह पूरा देश जानता है। मीडिया जब वह खबर दिखाता है तो उसको ‘गोदी मीडिया’ जैसा काल्पनिक नाम भी उन महानुभाव द्वारा दिया जाता है, जो स्वयं उसी मीडिया का हिस्सा हैं। इसी कुंठा को लिए हुए वे चीन का भी बचाव करते दिखाई देते हैं, जैसे दुनिया में वायरस फैलाने का मुख्य कारण चीन नहीं, अपितु भारत हो ? एक व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अपनी ओछी सोच दिखाने जैसी दयनीय स्थिति बताती है कि भारत इस समय एक बड़े संकट से जूझ रहा है।
इन सबसे सावधान रहें, जाहिलियत से दूर रहें। हम विजयी अवश्य होंगे, लेकिन विजय को प्राप्त करने हेतु चल रहे इस युद्ध में उन सभी पर नजर रखिए, जो इस समय भारत को हराने के लिए कार्यरत हैं।
(लेखक सोशल मीडिया विश्लेषक हैं)