ममता के मुस्लिम प्रेम के चलते पश्चिम बंगाल में बढ़ रहा है सामुदायिक संक्रमण का खतरा?

    दिनांक 28-अप्रैल-2020
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मनोज वर्मा 
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपत्ति के इस काल में भी राजनीति कर रही हैं। उन्हें आपत्ति है कि केंद्र सरकार द्वारा महामारी का जायजा लेने के लिए पश्चिम बंगाल में दल भेजना संघीय ढांचे के विरुद्ध है। ममता को समझना चाहिए कि यह वक्त राजनीति का नहीं, बल्कि मिलकर महामारी को परास्त करने का है
 
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विपत्ति के इस काल में भी राजनीति कर रही हैं। उन्हें आपत्ति है कि केंद्र सरकार द्वारा महामारी का जायजा लेने के लिए पश्चिम बंगाल में दल भेजना संघीय ढांचे के विरुद्ध है। ममता को समझना चाहिए कि यह वक्त राजनीति का नहीं, बल्कि मिलकर महामारी को परास्त करने का है।
एक तरफ जहां पूरी दुनिया वैश्विक महामारी से लड़ रही है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ऐसे समय में भी टकराव की राजनीति कर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सियासत करने के साथ-साथ संक्रमण से मरने वालों का असल आंकड़ा छिपाने के आरोप भी लग रहे हैं। यह भी आरोप है कि ममता सरकार तालाबंदी का सख्ती से पालन नहीं करवा रही है। सबसे गंभीर मामला तो यह है कि देश के सभी राज्य इस संकट काल में केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का लगभग पालन कर रहे हैं, पर पश्चिम बंगाल सरकार अपना अलग ही राग अलाप रही है। यह हाल तब है जब राज्य की राजधानी कोलकाता और हावड़ा में वायरस पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है और लोग कहने लगे हैं कि पश्चिम बंगाल ‘कोरोना बम’ पर बैठा है। क्या पश्चिम बंगाल में सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है ?
हावड़ा में संक्रमण बढ़ने के साथ ही राज्य सरकार के उस फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसमें फूलों के कारोबार को तालाबंदी के नियमों से छूट दी गई थी। खुद ममता बनर्जी भी यह कह चुकी हैं,‘‘अगर तालाबंदी लागू करने में सख्ती नहीं बरती गई तो इन इलाकों (हावड़ा और कोलकाता) में हालात बेकाबू होकर सामुदायिक संक्रमण फैलने का अंदेशा है।’’
दरअसल, यही अंदेशा केंद्र सरकार को भी है और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को भी। इतना ही नहीं, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को वायरस के मरीजों की जांच में तेजी लाने और इसकी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि वह नियमित रूप से इस बात की निगरानी करेगा कि राज्य सरकार महामारी से लड़ाई कैसे लड़ रही है। यही जानने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्यों में अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल (आईएमसीटी) भेजा तो उसे ममता सरकार ने कोलकाता के प्रभावित इलाकों में जाने से रोक दिया। केंद्रीय दल के प्रमुख और रक्षा मंत्रालय में अपर सचिव अपूर्व चंद्रा ने राज्य सरकार पर असहयोग का आरोप लगाया। इसके बाद केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को कड़ा पत्र लिखकर केंद्रीय दल को पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया। केंद्र ने यहां तक कहा कि यह आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत जारी आदेशों का साफ उल्लंघन है और राज्य को सहयोग करना ही होगा। इसके बाद राज्य सरकार झुक गई। राजीव सिन्हा ने केंद्रीय दल से मिलकर उन्हें प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने की अनुमति दे दी। इसके बाद केंद्रीय दल ने कोलकाता पुलिस के अधिकारियों के साथ कोलकाता के विभिन्न इलाकों का दौरा किया।

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तालाबंदी के दौरान कोलकाता में यह हाल देखने को मिला बसों का। (फाइल चित्र)
केंद्रीय गृह सचिव ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि संज्ञान में आया है कि कोलकाता और जलपाईगुड़ी में केंद्रीय दलों को राज्य और स्थानीय अधिकारियों द्वारा अपेक्षित सहयोग नहीं दिया गया। केंद्रीय दल का काम राज्य में महामारी की वजह से पैदा हुए हालात को देखना और राज्य सरकार को सहायता उपलब्ध कराना था। इससे पहले केंद्रीय दल के प्रमुख चंद्रा ने राज्य सरकार पर कई बड़े गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, ‘‘केंद्र सरकार ने आईएमसीटी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे राज्यों में भेजी। इनमें राज्य सरकारों का पूरा सहयोग मिला। इन राज्य सरकारों को भी बंगाल जैसा नोटिस भेजा गया था, मगर उन्हें काम शुरू करने के बाद से कोई परेशानी नहीं हुई।’’
ममता बनर्जी ने कहा था कि वह केंद्रीय दल को इजाजत नहीं दे पाएंगी, क्योंकि यह संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ है। यह कुछ उसी तरह की राजनीति थी जैसे ममता अक्सर राज्यपाल पर सवाल उठा देती हैं, तो कभी केंद्र सरकार को सियासी मुद्दों पर घेरने की कोशिश करती हैं।
वैसे केंद्र की ओर से बंगाल के अलावा महाराष्ट्र के मुंबई-पुणे, मध्य प्रदेश के इंदौर और राजस्थान के जयपुर के लिए भी समान आदेश जारी किया गया था। पर ममता बनर्जी के अलावा बाकी किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस कदम का विरोध नहीं किया। केंद्रीय दल के विरोध में ममता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा। मगर इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजे दो-दो पत्रों में राज्य में तालाबंदी में ढिलाई पर गहरी चिंता जताते हुए इसे सख़्ती से लागू करने का निर्देश दिया था। पत्र में इस बात पर आपत्ति जताई गई थी कि राज्य में गैर-जरूरी वस्तुओं की दुकानें खोलने की इजाजत दी गई है और पुलिस ने मजहबी जमावड़े की भी इजाजत दी है। इसे ही ममता ने राजनीति करार दिया था।
असल में केंद्र सरकार को लेकर ममता सरकार का रवैया जगजाहिर है। कई मुद्दों पर वह पहले भी टकराव का रास्ता अपनाती रही हैं। इसलिए उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने केंद्रीय दल के दौरे को ‘एडवेंचर ट्ूरिज्म’ करार दिया। वहीं तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन और सुदीप बंद्योपाध्याय ने दावा किया कि केंद्रीय दल के कोलकाता पहुंचने के करीब तीन घंटे बाद इसकी जानकारी मुख्यमंत्री को दी गई, जो कि अस्वीकार्य है। वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की भूमिका की तुलना नंदीग्राम आंदोलन के दौरान माकपा कार्यकर्ताओंं की भूमिका के साथ की है। उन्होंने कहा, ‘‘आंकड़े छिपाने से परिस्थिति नहीं बदलती। यह मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध है।’’
पश्चिम बंगाल में संक्रमण के 400 मामले मिलने और 12 मरीजों की मौत के बीच एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए नमूने लेने और जांच में तेजी लाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने सरकार को चिकित्सा कर्मचारियों और डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है। लेकिन जब लगभग यही बात राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ कहते हैं तो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को इसमें राजनीति लगती है। मसलन राज्यपाल धनखड़ ने तालाबंदी का सख़्ती से पालन नहीं होने पर नाराजगी जताते हुए इसके लिए केंद्रीय बलों को बंगाल में तैनात करने का सुझाव दिया था, लेकिन ममता बनर्जी ने इस पर नाराजगी जताई थी। राज्यपाल धनखड़ ने अपने एक ट्वीट में कहा था, ‘‘महामारी से निपटने के लिए तालाबंदी का पूरी तरह पालन करना होगा। पुलिस और प्रशासन के जो लोग तालाबंदी को ठीक से लागू नहीं कर सके हैं उनको बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।’’ लेकिन मुख्यमंत्री ने राज्यपाल की इस सलाह को भी राजनीति के चश्मे से ही देखा और उनको संकट के इस दौर में राजनीति नहीं करने की सलाह दे डाली। वहीं राज्यपाल धनखड़ कहते हैं कि ममता राजभवन के साथ किसी भी तरह की सूचना साझा नहीं करती हैं, मुख्यमंत्री का आचरण अलोकतांत्रिक है और इससे महामारी के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ रही है।
 
धनखड़ ने एक अन्य ट्वीट में ममता बनर्जी को लिखी अपनी चिट्ठी साझा की है। इस चिट्ठी के जरिए उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार पर राशन घोटाला करने का आरोप लगाया है और दावा किया है कि सरकार के इस नकारात्मक रवैये की वजह से महामारी के समय राज्य के लोग पीड़ित हैं और स्थिति गंभीर होती जा रही है। राज्यपाल ने लिखा है कि ऐसे समय में जब सबको मिल जुलकर आपदा से मुकाबला करने की जरूरत है, तब राज्य सरकार के साथ मेरी न्यूनतम बातचीत भी नहीं हुई है। स्थिति अति गंभीर है और बार-बार कहने के बावजूद ममता बनर्जी अपना संवैधानिक दायित्व नहीं निभाती हैं।
धनखड़ ने याद दिलाया है कि ममता ने 22 मार्च को दावा किया था कि केंद्र सरकार उन्हें पर्याप्त जांच किट उपलब्ध नहीं कराती है, लेकिन उसके बाद जब धनखड़ ने खुद केंद्र सरकार से संपर्क साधा तो पता चला कि मुख्यमंत्री झूठ बोल रही थीं और बंगाल में पर्याप्त संख्या में जांच किट थे। इसी तरह से राशन वितरण प्रणाली का राजनीतिक अपहरण हो चुका है। अपनी चिट्ठी में राज्यपाल ने लिखा है,‘‘23 मार्च को ही केंद्रीय वित्त मंत्री ने 3 महीने के लिए नि:शुल्क राशन की घोषणा कर दी थी, लेकिन बाद में पता चला कि पश्चिम बंगाल सरकार लोगों के लिए केंद्र की ओर से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मिलने वाला राशन नहीं ले रही थी।’’
यह भयावह स्थिति है। राज्यपाल ने कहा कि हाल की कुछ घटनाओं से इस बात की जानकारी मिली है कि पश्चिम बंगाल सरकार के अधिकारियों की चूक की वजह से राशन वितरण में कालाबाजारी और मुनाफाखोरी हुई है। यह एक बड़ा घोटाला है। उन्होंने लिखा है कि ममता बनर्जी को समय निकालकर उनसे मुलाकात करनी चाहिए और राज्य सरकार की तैयारियों से अवगत कराना चाहिए। राज्यपाल ने पत्र में यह भी लिखा कि आपदा के समय में ममता बनर्जी का यह अहंकारपूर्ण बर्ताव स्वीकार्य नहीं होगा। राज्यपाल ने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा, ‘‘स्वास्थ्य योद्धाओं और सरकार के बीच अविश्वास है, यह एक चिंताजनक स्थिति है। मुझे चिकित्सकों और उनके लोगों द्वारा ये संकेत दिए गए हैं कि महामारी से मरने वालों की घोषणा करने लिए आखिर ‘आॅडिट कमेटी’ क्यों बनाई गई है।’’
असल में कोई दो हफ्ते पहले ममता बनर्जी ने पांच सदस्यीय एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। यह समिति संक्रमण के बाद मरने वालों के चिकित्सकीय विवरण की जांच करेगी। समिति यह पुष्टि करेगी कि मौत की वजह वायरस है या कोई दूसरी बीमारी। इससे भाजपा सहित वाम दल खपा हैं। उनका कहना है कि यह मौत को छिपाने का जरिया है। इसलिए पिछले दिनों वाम दलों ने राज्य सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन भी किया था।
इसमें दो राय नहीं है कि तालाबंदी का पालन कराने में ममता सरकार ने लापरवाही दिखाई है। ममता ने तालाबंदी को भी अपने मुस्लिम वोट बैंक समीकरण से जोड़कर देखा। मुस्लिमों को शबे बारात मनाने के लिए मजहबी जलसे की अनुमति प्रदान कर बंगाल को संकट में धकेलने का काम किया। इतना ही नहीं कुछ बाजारों को भी खोलने की अनुमति दे दी। इस कारण कोलकाता, हावड़ा आदि जगहों पर तालाबंदी का मजाक उड़ा और वायरस को मौका मिल गया।
इसके बाद केंद्र सरकार ने हालत का जायजा लेने और राज्य सरकार को मदद करने के लिए केंद्रीय दल भेजा, लेकिन ममता हैं कि मान नहीं रही हैं। उन्हें समझना होगा कि राजनीति के लिए लोगों को मौत के मुंहाने पर नहीं धकेला जा सकता।
(लेखक लोकसभा टीवी में वरिष्ठ पत्रकार हैं)