पत्रकारिता पर हमले से आंख फेरता सेकुलर मीडिया

    दिनांक 28-अप्रैल-2020
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पालघर की घटना में साधुओं की निर्मम हत्या का सच छुपाने वाले मीडिया की निष्ठाएं देश से इतर देश विरोधी ताकतों के पास गिरवी रखी हैं। मीडिया के इस वर्ग को न सच दिखायी देता है,न पत्रकारिता के मूल्यों से कोई सरोकार है
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एक समय था जब यूरोपीय समाज में पोप पद आलोचना से परे माना जाता था। बड़े-बड़े सम्राट उसके आगे सिर झुकाते थे और पोप का कहा ही कानून माना जाता था। दुनिया ने उस व्यवस्था को नकार दिया, लेकिन भारत में एक पूरा तंत्र है जो पोप प्रणाली में जी रहा है। उनकी पोप सोनिया गांधी हैं। मुख्यधारा मीडिया का एक अलिखित नियम है कि सोनिया गांधी की आलोचना नहीं की जा सकती। मनमोहन सरकार के घोटाले हों या कांग्रेस शासित राज्यों की कुव्यवस्था, सोनिया गांधी सवालों से परे हैं। सोनिया गांधी की केंद्र में सत्ता गए छह साल होने को हैं, लेकिन यह व्यवस्था आज भी कायम है। रिपब्लिक चैनल के संपादक अर्णब गोस्वामी ने इसी पोप प्रणाली को चुनौती दे दी। महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की निर्मम हत्या पर उन्होंने सीधे सोनिया गांधी से सवाल पूछने की हिम्मत कर ली। इसके बाद जो तूफान खड़ा हुआ उसी से आप समझ सकते हैं कि इस व्यवस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह मुद्दा उठाने के लिए अर्णब गोस्वामी और उनकी पत्नी को भी निशाना बनना पड़ा। यह सब जब हो रहा था तब मीडिया का वह गिरोह तालियां बजा रहा था जिसे देश में अभिव्यक्ति की आजादी कम लगती है।
सारे हंगामे के बीच पालघर हत्याकांड कहीं पीछे छूट गया। इकलौते रिपब्लिक चैनल पर आप इससे जुड़ी खबरें पाएंगे। राष्ट्रवाद की फसल काटने वाले कुछ दूसरे मीडिया समूहों ने भी किसी अज्ञात भय से इस खबर को ज्यादा महत्व नहीं दिया। सोनिया गांधी को पोप मानने वाले मीडिया समूहों जैसे इंडिया टुडे, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस से तो वैसे भी ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं की जाती। साधुओं की हत्या के बाद मीडिया के बड़े वर्ग ने उन्हें 'चोर' करार दिया था। सबने इस बात को छिपाया कि वे साधु थे। तीन दिन बाद घटना का वीडियो सामने आ गया तब भी मीडिया के रवैये में कोई अंतर नहीं आया। पूरे देश ने देखा कि कुछ दिन पहले झारखंड में एक चोर की हत्या पर दुनिया भर में कोहराम मचा देने वाला मीडिया का यह वर्ग साधुओं की निर्मम हत्या पर कैसे मन ही मन मुस्कुरा रहा था। बताया जाने लगा कि घटना को सांप्रदायिक रंग न दिया जाए। प्रश्न उठता है कि क्या कल देश में किसी अन्य मत के सम्मानीत व्यक्ति के साथ ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना हो तब भी मीडिया उसे सांप्रदायिक रंग नहीं देगा?
मीडिया एक तरफ तब्लीगी जमात की करतूतों पर पर्दा डालता है, महाराष्ट्र में साधुओं की हत्या का समाचार छिपाता है और दूसरी तरफ बताता है कि मुस्लिम समुदाय कितना ‘उदार’ है। भले ही इसके लिए झूठ का सहारा लेना पड़े। एनडीटीवी ने झूठ फैलाया कि कोरोना वायरस का टीका ढूंढने वाला एक मुसलमान है। जबकि अभी तक न तो टीका ढूंढा जा सका है और न ही दवा। पाञ्चजन्य में ही हमने इस झूठ की पोल खोली थी कि एनडीटीवी ने जिसे टीका बनाने वाला बताया वो वास्तव में वह वैज्ञानिक ही नहीं है।
टाइम्स आॅफ इंडिया ने समाचार छापा कि तेलंगाना में एक हिंदू बेटे ने जब अपनी मां का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया तो एक मुस्लिम परिवार ने पूरे रीति-रिवाज के साथ यह जिÞम्मेदारी संभाली। इसे सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल के तौर पर प्रचारित किया गया। टाइम्स आॅफ इंडिया से यह फेक न्यूज देखते ही देखते कई अखबारों और बीबीसी तक पहुंच गई। इस बीच उस महिला के बेटे का बयान सामने आया, जिसने तस्वीरों और दूसरे दस्तावेजों के साथ यह बताया कि अंतिम संस्कार तो उसी ने किया था, न कि किसी अन्य व्यक्ति ने। जब पड़ताल हुई तो पता चला कि पड़ोस में रहने वाले आम आदमी पार्टी से जुड़े एक व्यक्ति ने मीडिया की सहायता से यह झूठ फैलाया। उसने अंतिम यात्रा की फोटो मीडिया को यह बताते हुए दी कि शव को ले जा रहे लोग मुसलमान हैं। मीडिया ने आंख मूंदकर भरोसा कर लिया। इस झूठ के कारण महिला के बेटों को समाज में तरह-तरह के तानों का सामना करना पड़ा। लेकिन इसे छापने वाले टाइम्स आॅफ इंडिया ने परिवार से क्षमा मांगने तक की औपचारिकता नहीं की।
लॉकडाउन के बीच मीडिया के अफवाहबाज अपने काम में दिन-रात जुटे हैं। यह स्थिति तब है जब सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि मीडिया सिर्फ सरकार की तरफ से पुष्टि के बाद ही समाचार प्रसारित करे। टाइम्स आॅफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, अमर उजाला, पंजाब केसरी जैसे अखबारों ने रेलवे और दूसरे केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में कटौती का झूठ फैलाया। जब सरकार ने पीआईबी के माध्यम से इन गलत खबरों का खंडन किया तो इनमें से ज्यादातर ने उस खंडन को प्रकाशित नहीं किया। कुछ ने तो सरकार के स्पष्टीकरण के बाद भी यही झूठ फैलाना जारी रखा।
दिल्ली हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा अफवाहें फैलाने वाली स्क्रोल नाम की प्रोपोगेंडा वेबसाइट ने दावा किया कि बिहार में लॉकडाउन के कारण बच्चे मेंढक पकड़कर खाने को मजबूर हैं। एक वीडियो जारी किया गया जिसमें वे बच्चे मेंढक पकड़ रहे हैं और संवाददाता उनसे बात कर रहा है जिसमें वे बता रहे हैं कि भूख मिटाने के लिए उन्हें मेंढक खाना पड़ रहा है। अगले दिन पता चला कि संवाददाता ने बच्चों को पैसे देकर यह बात कहवाई थी। बच्चे गरीब घरों के थे, लेकिन ऐसा नहीं था कि उन्हें मेंढक खाने को मजबूर होना पड़े। जब तक सच्चाई सामने आई झूठ पूरी दुनिया में फैलाया जा चुका था। कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के स्थानीय अखबार ने गरीबों के घास खाने का झूठ फैलाया था, जबकि वे चने के झाड़ से चने खा रहे थे।
लॉकडाउन में भुखमरी के ऐसे ही झूठ को एनडीटीवी ने अपने ज्यादा व्यापक एजेंडे के साथ फैलाया। एनडीटीवी ने अरुणाचल प्रदेश में सांप पकड़ने वाली एक जनजाति की तस्वीर छापी और दावा किया कि वहां पर चावल न मिलने के कारण लोग सांप खाने को मजबूर हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने स्तर पर जांच की तो सच्चाई सामने आ गई। उन्होंने ट्वीट करके एनडीटीवी को चेताया कि प्रदेश के लोगों को लेकर इस तरह से झूठ फैलाना ठीक नहीं है। यह कोई आम फेक न्यूज नहीं थी। सांप और चमगादड़ जैसे खानपान के कारण चीन के लोग दुनिया भर में हंसी का पात्र बने हुए हैं। ऐसे में अगर अरुणाचल के लोगों के साँप खाने का झूठ फैलाया जाए तो इससे कहीं न कहीं भारतीयों की छवि भी धूमिल होगी। साथ ही ऐसी खबरें जब देश में फैलेंगी तो हो सकता है कि देश के कुछ दूसरे क्षेत्रों में उत्तर-पूर्व के लोगों को लेकर कुछ पूर्वाग्रह पैदा हो जाएं। एनडीटीवी वैसे भी इन दिनों चीन का प्रवक्ता बनकर काम कर रहा है। उसके एक तथाकथित पत्रकार ने तो अपने कार्यक्रम में खुलकर चीन का पक्ष लिया और कहा कि ‘भारत सरकार चीन को खलनायक बना रही है’।
उम्मीद की जाती थी कि देश के लिए इस संकटकाल में मीडिया थोड़ा संयम से काम लेगा और अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। लेकिन यह उम्मीद भी बेकार साबित हो रही है। विशेष रूप से सेकुलर मीडिया के लिए यह सुअवसर है, खासकर तब जब वह हर काम ऐसे कर रहा है जिससे देश की छवि बिगड़ती है और अराजकता की स्थिति पैदा होती है।