#जिहादी_वायरस :अफवाहों के उस्ताद लगे हैं तब्लीगी जमात पर लगी कालिख धोने में

    दिनांक 28-अप्रैल-2020   
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अफवाह फैलाने में पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) का कोई मुकाबला नहीं है। तब्लीगी जमात पर लगी कालिख धोने के लिए पीएफआई का अफवाह तंत्र सोशल मीडिया पर निर्लज्जता के साथ कुतर्क और गाली-गलौज कर रहा है
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मुरादाबाद में मुस्लिमों के हमले से घायल एक डॉक्टर। कहा जाता है कि यह हमला अफवाह के कारण किया गया था।
 
इन दिनों पूरा देश जमातियों की हरकतों की निंदा कर रहा है, लेकिन इस्लामी कट्टरवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) ने तब्लीगी जमात का समर्थन किया है। इसका कहना है, ‘‘तब्लीगी जमात ने कुछ भी गलत नहीं किया है। एक साजिश के तहत अफवाह फैलाकर जमात को बदनाम किया जा रहा है।’’ पीएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा,‘‘तब्लीगी जमात का मामला सिर्फ इसलिए उछाला गया,ताकि तालाबंदी के बुरे नतीजों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके।’’ पीएफआई ने जमात के अमीर मौलाना साद और अन्य जमातियों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर की भी निंदा की। इसके साथ ही सोशल मीडिया से लेकर चैनलों तक में बहुत सारे लोग आने लगे और वे जमात के बचाव में कुतर्क भी करने लगे। फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर, वाट्सअप के जरिए तब्लीगी जमात का बचाव किया जाने लगा। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के मुसलमान और अन्य सेकुलर तब्लीगी जमात के पक्ष में ऐसे-ऐसे ‘पोस्ट’ करने लगे कि एक वर्ग तय नहीं कर पा रहा है कि सच क्या है और गलत क्या है। इन सबकी कड़ियों को आपस में जोड़ने से पता चलता है कि इस भ्रम को पैदा करने में पीएफआई की भूमिका है।
आपको ध्यान होगा कि जब दिल्ली में सीएए के विरोध में प्रदर्शन और दंगे हो रहे थे, उस समय आतंकी संगठन आईएसएस के एक आतंकी दम्पति को गिरफ्तार किया गया था। यह दम्पति आईएसएस और पीएफआई के बीच समन्वय का काम करता था। तब्लीगी जमात और आईएसएस के संबंध भी जगजाहिर हैं। दोनो संगठनों के पास पैसा जमा करने और मीडिया प्रबंधन का तंत्र भी एक जैसा है। धरती को अभी भी चपटी मानने वाले और दुनिया को 1,400 वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में ले जाने का ख़्वाब देखने वाले इन दोनों संगठनों के प्रगतिवाद में भी कोई विरोधाभास नहीं है। संगठन के तौर पर भले ही ये दोनों अलग दिख रहे हैं, लेकिन इनकी जड़ें एक हैं।
 
पीएफआई भले ही अपने आपको एक प्रगतिवादी इस्लामिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता हो, लेकिन उसकी तुलना हाफिज सईद के नेतृत्व वाले आतंकी संगठन ‘जमात-उद-दावा’ से करने में कोई हर्ज नहीं है। जमात-उत-दावा ही लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहममद जैसे आतंकी सगंठनों के बीज का अंकुरण केंद्र है। ऐसे संगठनों के लिए प्रगतिवाद एक मुखौटा मात्र है, जिसका इस्तेमाल ये अपनी मारक क्षमता को और बढ़ाने के लिए करते हैं। बता दें कि पीएफआई के पास मीडिया प्रबंधन का अपना तंत्र है। उसके पास मीडिया से जुड़े पेशेवर लोगों की एक फौज है। इसी के जरिए वह अपना और अपने मजहबी संगठनों के बचाव में उतर जाता है। जमात के मामले में भी उसने अपने पेशेवरों को उतार दिया है।
 
पीएफआई प्रतिबंधित संगठन सिमी का नया रूप है। सिमी के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दिकी वेस्टर्न इल्लिनीयोस यूनिवर्सिटी, यू.एस. में पत्रकारिता और जनसंपर्क विभाग में अध्यापक हैं। यही कारण है कि सिमी ने अपने प्रचार तंत्र पर खूब जोर दिया था और उसका लाभ अब पीएफआई को मिल रहा है। पीएफआई के पास अलग मीडिया कंपनी है। पीएफआई की ही कंपनी है ‘इंटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’, जो ‘तेजस पब्लिशिंग चेरिटेबल ट्रस्ट’ के अधीन है। तेजस पीएफआई के मलयालम दैनिक का नाम है, जिसका प्रकाशन जनवरी, 2006 से प्रारंभ हुआ था। पीएफआई मलयालम, तमिल और कन्नड़ में चार समाचार पत्रों का प्रकाशन करता है। पुस्तकें भी छापता है। पीएफआई ने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी में प्रकाशन के लिए ‘एम्पॉवर इंडिया प्रेस’ की स्थापना भी की है।
इसका एक अन्य संगठन मीडिया रिसर्च एंड डवलेप्मेंट भी है, जो आडियो, विजुअल और वृत्तचित्रों का निर्माण भी करता है। तेजस के कार्यकारी संपादक एनपी चेक्कुट्टी कहते हैं, ‘‘हम राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए मीडिया को एक वाहन के रूप में देखते हैं।’’ जल्दी ही तेजस सऊदी अरब में एक संस्करण शुरू करने वाला है।
 
तेजस को लेकर 25 नवंबर, 2009 को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गुप्त पत्र जारी किया गया था। इसमें लिखा गया था, ‘‘तेजस एक इस्लामिक प्रकाशन नेटवर्क का हिस्सा है, जो कुछ निश्चित संगठनों के सांप्रदायिक एजेंडे को पूरा करता है। यह प्रकाशन कश्मीर में मुस्लिमों की दशा और अमेरिका एवं इजरायल के साथ भारत के संबंधों जैसे मुद्दों पर सरकार विरोधी रुख अपनाता है। कभी-कभी यह सरकार के उग्रवाद विरोधी प्रयासों की राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के रूप में भी व्याख्या करता है, जिससे आतंकवादी तत्वों के रुख का समर्थन होता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें समकालीन विकास और मुद्दों को हमेशा सांप्रदायिक कोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है।’’
पीएफआई के पास सोशल मीडिया का भी तंत्र है और इसके जरिए वह किसी भी अफवाह को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाता है। इन दिनों भी यही हो रहा है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास ऐसी जानकारी है कि भीमा कोरेगांव, रोहित वेमुला, अखिला अशोकन उर्फ हदिया, मुजफ्फरनगर दंगों सहित कई मामलों को लेकर अफवाह फैलाने में पीएफआई ने अपने इसी तंत्र का उपयोग किया था।
हर राज्य के लिए पीएफआई के पास एक अलग फेसबुक पेज भी है, जिसमें कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाली खबरें, तस्वीरें, वीडियो और पर्चे पोस्ट किए जाते हैं। भगोड़ा जाकिर नाइक के पीस टीवी के लिए पैसा सऊदी अरब से आता था। पीएफआई के मुखपत्र का भी सऊदी संबंध है। जाकिर नाइक के मामले से इन संगठनों ने सीख ली है और अपने प्रचार तंत्र को विकेंद्रित किया है। पीएफआई के पास अपनी एक विकसित वेबसाइट भी है। इस वेबसाइट पर ‘रोहिंग्याओं का जातीय संहार’, ‘चीन में उइगर मुस्लिमों के उत्पीड़न’, ‘अफस्पा का निरस्तीकरण : निर्दोषों की रिहाई’, ‘दलितों पर जातीय अत्याचार की निंदा’, ‘बाबरी ढांचा मुद्दा’, ‘एनआईए : संघ परिवार का एक संगठन’, ‘समान नागरिक संहिता का विचार त्यागना’, ‘असहिष्णुता’, ‘टीपू सुल्तान की अवमानना की निंदा’, ‘नव-औपनिवेशिक खतरे’ आदि की चर्चा है। इन मुद्दों का उल्लेख करने का एकमात्र उद्देश्य है संभावित अलगाववादी और आंदोलनकारी सहयोगियों को एकजुट करना। इसके जरिए पीएफआई हर एक मामले में भारत सरकार को एक ‘खलनायक’ की तरह प्रस्तुत करता है। इन दिनों पीएफआई का पूरा ध्यान जमात को बचाने और दुनिया को भ्रमित करने में लगा है। इसलिए इसकी करतूतों को उद्घाटित करना, समय की मांग है।
( लेखक पीएफआई पर शोध कर रहे हैं )