कांग्रेस और सेकुलर दलों का सनातन व्यवस्था से नफरत का है पुराना इतिहास

    दिनांक 29-अप्रैल-2020   
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भगवा विरोधी गैंग किसी न किसी तरीके से अपनी साजिशों में जुटा रहता है। कभी ये देश में भगवा आतंकवाद का हौवा खड़ा करके स्वामी असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा जैसे निर्दोष भगवाधारियों को जेल में ठूंस देता है। कभी ये इस्लामोफोबिया का नारा लेकर मैदान में आ जाता है। इस रक्तबीज के लाखों चेहरे हैं। ये कभी अभिव्यक्ति की आजादी का गैंग बन जाते हैं, तो कभी अवार्ड वापसी। कभी ये ड्राइंगरूम में बैठकर प्रधानमंत्री तक की हत्या की साजिश रचते हैं, तो कभी हिंदू धर्म प्रतीकों का मजाक बनाते हैं। 
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इस देश में एक गैंग है। भगवा विरोधी गैंग। इसे आप अलग-अलग नाम से जानते हैं। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, नक्सली, मिशनरी, जिहादी, समाजवादी, सेकुलर, लिबरल... ये गैंग इच्छाधारी है। हिंदू संत, प्रतीकों, मान्यताओं, गर्व चिह्नों के साथ ये गैंग अलग-अलग रूप में मिलेगा। पालघर में जूना अखाड़े के दो संतों की लिंचिंग और उस पर कांग्रेस, शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की लीपापोती साबित करती है कि इस देश में एक बहुत बड़ा वर्ग सनातन विरोधी है। ये वह गिरोह है, जो कहीं चोरी करते पकड़े जाने पर क्रुद्ध भीड़ द्वारा पीटे गए किसी चोर के लिए या फिर किसी गोकश के लिए देश सिर पर उठा लेता है, लेकिन पुलिस की मौजूदगी में हुई संतों की लिंचिंग पर जुबान सिल लेता है। ऐसे सभी लोगों को पता होना चाहिए कि भारतीय इतिहास और राजनीति का एक सच यह है कि जिसने भी सनातन मानबिंदुओं पर कुठाराघात करने की कोशिश की, उसका विनाश ही हुआ है।
संतों के नरसंहार की जिम्मेदार इंदिरा
7 नवंबर 1966। कार्तिक शुक्ल की अष्टमी। गोपाष्टमी का शुभ दिन। देश के कोने-कोने से गोमाता की हत्या पर रोक की मांग को लेकर दिल्ली में हिंदू इकट्ठा हुए। संत थे, साधु थे, महिलाएं थीं, बच्चे थे और गऊ माता थीं। कांग्रेस पर काबिज होने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गो हत्या पर कानूनी रोक का वादा किया था। बाद में वह इससे मुकर गईं। इंदिरा की सरकार ने गो भक्तों, संतों और गऊ माता पर गोली चलाने का हुक्म पुलिस को दिया। सैंकड़ों लोग हताहत हुए। लिंचिंग इसे कहते हैं। लिंचिंग की परिभाषा ये है कि किसी बात पर गुस्सा होकर बिना कानून, सुनवाई की परवाह किए किसी को मार डालना। गो माता की हत्या रोकने की बात से भड़की इंदिरा गांधी की सरकार ने न संत देखे, न महिला-बच्चे। न ही गो माता। क्या ये संतों, भगवे, गो माता और हिंदुओं की सरकारी लिंचिंग नहीं थी ? ऐसा जघन्य नर और गऊ संहार, जिसे किसी उन्मादी भीड़ ने नहीं, सरकार ने अंजाम दिया था। ये गोरक्षा अभियान अनूठा था। केरल से लेकर कश्मीर तक से गोहत्या बंद करो की आवाज उठ रही थी। सभी संत, शंकराचार्य, सारे अखाड़े, संत, महंत, मंडलेश्वर मतभेद भुलाकर एक मंच पर थे। हिंदुओं की इसी एकता से तो कांग्रेस और उस जैसे मुस्लिम परस्त दलों को डर लगता है। धर्म के आधार पर देश बंट गया। हिंदुओं के हिस्से में जो देश आया, वह अपनी आराध्य गाय की हत्या रोकने की मांग तक नहीं कर सकते। इतिहासकार आचार्य सोहनलाल रामरंग लिखते हैं कि फायरिंग अंधाधुंध थीं। लाशें गिर रही थीं लेकिन कांग्रेस सरकार ने केवल 11 लोगों की मौत की बात कबूली। इस अभियान का नेतृत्व कर रहे संत करपात्री जी महाराज इस संहार से बहुत दुखी हुए। कहते हैं उन्होंने गांधी परिवार को श्राप तक दिया था।
 
दीपावली के दिन शंकराचार्य को गिरफ्तार कराने वाली ताकतें कौन थीं !
सिर्फ पालघर क्यों, सोनिया गांधी को तो बहुत से जवाब देने चाहिए। मसलन उन्हें बताना चाहिए कि कांची पीठ के शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के पीछे किसका हाथ था। कांग्रेस नवंबर, 2004 में सत्ता में आई। चंद दिन बाद ही दीवाली के मौके पर हत्या के एक झूठे आरोप में शंकराचार्य जी को गिरफ्तार कर लिया गया। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द कोएलेशन इयर्स 1996-2012 में इस बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है- मैं इस गिरफ्तारी से बहुत नाराज था। मैंने यह मसला कैबिनेट की बैठक में उठाया। मैंने पूछा कि देश में पंथनिरपेक्षता का पैमाना क्या सिर्फ हिंदू संतों के लिए है ? क्या राज्य की पुलिस ईद के मौके पर किसी मुस्लिम मौलाना को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखती है ? प्रणब मुखर्जी के इस खुलासे से साफ है कि शंकराचार्य की गिरफ्तारी सिर्फ जयललिता का कारनामा नहीं थी, इसमें सोनिया गांधी के रिमोट से चलने वाली मनमोहन सरकार भी शामिल थी। वजह थी मिशनरी। शंकराचार्य के नेतृत्व में मिशनरियों के राजफाश का अभियान चल रहा था, उनकी जड़े हिल रही थीं। इसीलिए शंकराचार्य को जेल भेजकर मिशनरी का रास्ता साफ करने की कोशिश थी। लेकिन शंकराचार्य को गिरफ्तार करने वाली जयललिता आज कहां हैं ? उसके बाद वह एक पल चैन से न रह सकीं। चुनाव जीतीं, तो भी गद्दी पर न रह सकीं। असमय मृत्यु हुई।
कहां गए वे मुलायम, जिनका जलवा कायम था
भगवाधारियों का संहार उत्तर प्रदेश में भी हुआ। उत्तर प्रदेश में तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। हिंदू साधु-संत अयोध्या कूच कर रहे थे। उन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ अयोध्या पहुंचने लगी थी। प्रशासन ने अयोध्या में कर्फ्यू लगा रखा था, इसके चलते श्रद्धालुओं को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। पुलिस ने बाबरी मस्जिद के 1.5 किलोमीटर के दायरे में बैरिकेडिंग कर रखी थी। कारसेवकों की भीड़ बेकाबू हो गई थी। पहली बार 30 अक्टबूर, 1990 को कारसेवकों पर चली गोलियों में दर्जनों हताहत हुए, लेकिन सरकार ने सिर्फ 5 लोगों की मौत की बात मानी। इस घटना के बाद अयोध्या से लेकर देश का माहौल पूरी तरह से गर्म हो गया था। इस गोलीकांड के दो दिनों बाद ही 2 नवंबर को हजारों कारसेवक हनुमान गढ़ी के करीब पहुंच गए। उमा भारती, अशोक सिंघल, स्वामी वामदेव जैसे बड़े संत और नेता नेतृत्व कर रहे थे। 2 नवंबर को सुबह हनुमान गढ़ी के सामने पुलिस ने सामने से आ रहे कारसेवकों पर फायरिंग कर दी। सैंकड़ों लोग हताहत हुए। लाशें सरयू में ठिकाने लगा दी गईं। मुलायम सरकार ने सिर्फ ढेड़ दर्जन लोगों की मौत की बात मानी। इसी गोलीकांड में कोलकाता से आए कोठारी बंधुओं की भी मौत हुई थी। आज मुलायम कहां हैं ? मुलायम की गति पूरी दुनिया ने देखी। कैसे उनके बेटे अखिलेश ने ही उन्हें सरेआम बेइज्जत करके तख्ता पलट कर दिया। मुलायम सिंह यादव, जिनके नाम का कभी नारा लगता था, जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। आज कहां हैं मुलायम!
कहां गए संतों पर लाठी चलवाने वाले अखिलेश
अखिलेश यादव को हिंदू विरोध पिता से विरासत में मिला। नई सरकार बनी थी। अखिलेश जोश में थे। सितंबर 2015 की बात है। गणेश विसर्जन को लेकर विवाद हुआ। संत धरने पर बैठ गए। रात के दो बजे थे। अखिलेश के आदेश पर संतों पर जमकर लाठीचार्ज हुआ, जिसमें शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समेत दर्जनों लोग घायल हो गए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद लाठीचार्ज के खिलाफ अड़े रहे। उन्होंने कहा- मारो कितना मार सकते हो पर उनकी बात को अनसुना करते हुए पुलिसकर्मी उनपर लाठियां बरसाते रहे। उनके ही साथ का एक संन्यासी कई लाठियां पड़ने के कारण बेसुध होकर गिर पड़ा। अविमुक्तेश्वरानंद के साथ आये श्रीविद्यामठ के कई बटुक भी पीटे गये। यहीं से अखिलेश सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। लेकिन अखिलेश माने नहीं। कभी कावड़ यात्रा में डीजे पर पाबंदी, कभी मंदिरों के विवाद में सरकारी दखल। आखिरकार जनता ने उन्हें घर बैठा दिया। अखिलेश सबक सीख गए हैं। अब भगवा और हिंदू धर्म के खिलाफ बोलते डरते हैं।
 
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के ताबूत में कील
30 अप्रैल, 1982 की सुबह। आनंद मार्ग के 11 साधक, जिनमें एक महिला शामिल थी, वाहनों से खींचकर सड़क पर निकाले गए। इन्हें जिंदा जला दिया गया। ये सभी लोग आनंद मार्ग के तिलजला स्थिति मुख्यालय जा रहे थे। तीन अलग-अलग जगहों पर हजारों लोगों की मौजूदगी में ये घटना हुई। तब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार थी। वामपंथियों का दशकों पुराना ये किला दरकने लगा था। वामपंथियों की निर्विरोध सत्ता को हमेशा से बंगाल में भगवा से चुनौती मिलती रही थी। खासतौर पर आनंद मार्ग वामपंथियों की आंख में खटकता था। जैसा पालघर में हुआ, वैसा ही दक्षिण कोलकाता में हुआ था। आप घटनाओं में समानता देखिए। पालघर की तरह ही दक्षिण कोलकाता में अफवाह फैलाई गई कि कुछ लोग साधुओं के वेश में आकर बच्चों को उठा ले जाते हैं। कुल 11 साधकों की हत्या हो गई और पूरे देश को सात दिन तक पता नहीं चला। स्टेट्सैन अखबार ने घटना के सात दिन बाद 11 साधकों को जिंदा जला डालने वाली इस लोमहर्षक घटना का खुलासा किया। जिस तरीके से महाराष्ट्र सरकार पालघर में साधुओं की हत्या की लीपापोती में लगी है, वैसा ही रुख तत्कालीन वाममोर्चा सरकार का था। इस मामले में जो जांच हुई, वाम मोर्चा की सरकारों ने अडंगा लगा दिया। वामपंथियों के सौजन्य से हुए इस हत्याकांड में आज तक कोई सजा नहीं हुई।
 
तो क्या अब टूटेगा ममता का दंभ
पश्चिम बंगाल वामपंथियों के दंभी राज से आजाद हुआ, तो वहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में एक घनघोर भगवा विरोधी सरकार आ बैठी। बंगाल में आज दुर्गा पूजा तक सरकार और स्थानीय मौलानाओं की मंजूरी लेकर करनी पड़ती है। यहां दुर्गा पूजा मनाने का अंजाम क्या होता है, ये हर साल नजर आता है। 10 अक्टूबर, 2019 को दुर्गा नवमी के पूजन के बाद नादिया के बागदेवी से पुजारी सुप्रियो बनर्जी लापता हो गए। अगले दिन उनकी लाश मिली. इसी तरह की घटनाओं में अब तक आधा दर्जन से ज्यादा मौत हो चुकी हैं। लेकिन किसी भी मामले में अभी तक दोषियों को सजा नहीं मिली है। तो क्या ये मान लिया जाए कि ममता बनर्जी ने भगवा विरोधियों के अंजाम से कुछ नहीं सीखा है। यदि उन्होंने नहीं सीखा है, तो समय जरूर सिखाएगा।
 
स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या कौन भूल सकता है!
देश के कोने-कोने में भगवा इस गैंग का निशाना रहा है। ओडिसा में 2008 में जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या कर दी गई। उनके चार शिष्यों को भी ए.के. 47 की गोलियों से छलनी कर दिया गया। इस हत्याकांड में बीजू जनता दल और कांग्रेस के बड़े ईसाई नेता शामिल थे। स्वामी लक्ष्मणानंद मिशनरियों की राह का रोड़ा थे और आदिवासियों के बीच उन्होंने ईसाइयों के सामने बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। ये भगवा विरोधी गैंग यही करता है। ये किसी न किसी तरीके से अपनी साजिशों में जुटा रहता है। कभी ये देश में भगवा आतंकवाद का हौवा खड़ा करके स्वामी असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा जैसे निर्दोष भगवाधारियों को जेल में ठूंस देता है। कभी ये गैंग इस्लामोफोबिया का नारा लेकर मैदान में आ जाता है। इस रक्तबीज के लाखों चेहरे हैं। ये कभी अभिव्यक्ति की आजादी का गैंग बन जाते हैं, तो कभी अवार्ड वापसी। कभी ये ड्राइंगरूम में बैठकर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचते हैं, तो कभी हिंदू धर्म प्रतीकों का मजाक बनाते हैं। लेकिन ये सनातन है। युगों से अच्छाई और बुराई के बीच ये जंग चल रही है। यकीन रखिए, ये भगवा विरोधी उसी अंजाम को प्राप्त होंगे, जो अंजाम हमारे शास्त्र बताते हैं।