विदेशी कंपनी से करार कर फंसे पिनरई विजयन

    दिनांक 29-अप्रैल-2020
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नवीन कुमार शर्मा 
केरल सरकार ने कोविड-19 के मरीजों केे परीक्षण, उपचार संबंधी आंकड़ों के संग्रहण और विश्‍लेषण के लिए अमेरिकी कंपनी स्प्रिंकलर इंक के साथ करार किया है। लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी नहीं ली। राज्‍य सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए राज्‍य के एक अधिवक्‍ता ने केरल उच्‍च न्‍यायालय में इस करार के विरुद्ध एक याचिका दायर की है।

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केरल सरकार और अमेरिकी कंपनी के बीच एक समझौता मुख्‍यमंत्री पिनरई विजयन के लिए गले की फांस बना हुआ है। दरअसल, कोविड-19 के मरीजों के परीक्षण, उपचार संबंधी आंकड़ों के संग्रहण और उनके विश्‍लेषण के लिए केरल सरकार ने अमेरिकी कंपनी स्प्रिंकलर इंक के साथ एक अनुबंध किया है। लेकिन राज्य सरकार ने केंद्रीय विधि विभाग से इस बाबत कोई सलाह नहीं ली। अमेरिकी कंपनी की उस शर्त को भी मान लिया, जिसमें कहा गया है कि भविष्‍य में करार की शर्तों के उल्लंघन पर कोई विवाद हुआ तो उसका न्यायिक क्षेत्राधिकार न्यूयॉर्क होगा न कि भारत। यही नहीं, स्प्रिंकलर इंक राज्‍य के कोविड-19 के मरीजों से जुड़ी संवेदनशील सूचनाएं विदेशी सर्वर पर रख रही है। इस समय उसके पास डेढ़ लाख से अधिक लोगों के आंकड़े हैं। इस समझौते पर सवाल उठाते हुए एक ओर केरल उच्‍च न्‍यायालय में याचिका दायर की गई है, वहीं इस पर राजनीतिक बहस भी छिड़ी हुई है। दिलचस्‍प बात यह है कि केरल सरकार ने जिस कंपनी के साथ अनुबंध किया है, उस पर उसकी पूर्व सहयोगी ओपल ने अमेरिका की ही एक अदालत में उस पर तकनीक चोरी करने का आरोप लगाते हुये 50 मिलियन डॉलर हर्जाने का मुकदमा दायर कर रखा है।
समझौते को अदालत में चुनौती
हाल ही में अधिवक्ता बालू गोपालकृष्‍णन ने पिनराई विजयन सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर स्प्रिंकलर इंक के साथ करार रद्द करने की मांग की है। इसके मुताबिक, राज्य सरकार ने स्प्रिंकलर इंक के साथ करार करने से पहले, न तो विधि विभाग से कोई चर्चा की और न ही उससे आवश्‍यक मंजूरी ली। याची का कहना है कि यदि कोई विदेशी कंपनी राज्‍य के नागरिकों का रिकॉर्ड विदेशी सर्वर पर रख रही है तो यह राज्‍य सरकार की जिम्‍मेदारी है कि वह अपने नागरिकों के बारे में इस बारे में बताए। यह भी बताए कि उनके द्वारा दी जाने वाली जानकारियों या सूचनाओं का तीसरा पक्ष किस तरह दुरुपयोग कर सकता है। सवाल है कि जब राज्‍य व केंद्र सरकार के पास इन आंकड़ों को सुरक्षित रखने के लिए संसाधन उपलब्‍ध है, तब पिनरई सरकार को विदेशी कंपनी के साथ करार करने की जरूरत क्‍यों पड़ गई ? यह नागरिकों की निजता के अधिकार का उल्‍लंघन है।
याचिका में इस बात की आशंका जताई गई है कि राज्‍य सरकार अपने नागरिकों का जो संवेदनशील डाटा स्प्रिंकलर इंक को दे रही है, वह बहुत कीमती है और वैश्विक बाजार में इसे बेचकर लाखों डॉलर कमाए जा सकते हैं। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि दलगत और वैचारिक मत भिन्नता के कारण साम्‍यवादी दलों की गठबंधन सरकार के मुखिया ने केंद्र सरकार से सलाह लेना जरूरी नहीं समझा हो। यही नहीं, सरकार ने जो समझौता किया है, वह सूचना तकनीक अधिनियम 2000 के प्रावधानों का भी उल्‍लंघन करता है। सबकुछ जानते-समझते हुए भी राज्‍य सरकार ने जिस तरह चोर दरवाजे से स्प्रिंकलर इंक के साथ जल्‍दबाजी में करार किया है, वह न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि बदनीयत का एक उदाहरण भी है। देखा जाए जो पिनराई सरकार जनता से जुड़ी संवेदनशील सूचनाएं विदेश की एक निजी कंपनी को सौंप कर उनकी निजता को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर रही है। याची ने उच्‍च न्‍यायालय से इस करार को रद्द करने, स्प्रिंकलर इंक को कोविड-19 के मरीजों का डाटा एकत्र कर उसे अपने सर्वर पर रखने से रोकने और डाटा किसी सरकारी आईटी संस्थान द्वारा संग्रहित कर उनका विश्लेषण करने का निर्देश देने की मांग की है। साथ ही, केंद्र सरकार से इस करार का फॉरेंसिक ऑडिट करा कर राज्‍य सरकार की मंशा पता लगाने की प्रार्थना भी की है।
क्‍या कहा अदालत ने?
याचिका पर न्‍यायमूर्ति दीवान रामचंद्रन और न्‍यायमूर्ति टी.आर.रवि की खंडपीठ ने राज्य सरकार को चेताते हुए कहा, ‘‘हम स्प्रिंकलर इंक के साथ समझौते को रद्द भी कर सकते हैं। लेकिन हम नहीं चाहते कि कोविड-19 से लड़ी जाने वाली लड़ाई में राज्‍य पिछड़े।’’ खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए अमेरिकी कंपनी के साथ डाटा संरक्षण और उसके विश्‍लेषण के लिए राज्‍य सरकार द्वारा किए गए अनुबंध को पूरी तरह से गैर जिम्‍मेदाराना और नियमों की अनदेखी करने वाला निर्णय करार दिया। साथ ही, खंडपीठ ने यह भी माना कि याचिका में ऐसी बहुत सी चिंताएं व्‍यक्‍त की गई हैं, जिन पर बाद में बहस की जा सकती है। अदालत ने राज्‍य के नागरिकों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार के सभी तर्कों को न केवल खारिज किया, बल्कि स्प्रिंकलर इंक को कई प्रतिबंधात्‍मक दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्‍य किया है। इसमें राज्‍य सरकार द्वारा उपलब्‍ध कराए गए डाटा को किसी अन्‍य पक्ष के साथ साझा नहीं करने का आदेश भी शामिल है। राज्‍य सरकार को दिशा-निर्देश देते हुए कहा गया है कि कोविड-19 से जुड़े हर प्रकार का डाटा सीधे राज्‍य सरकार के सर्वर पर एकत्र किए जाएं। सीधे-सीधे कोई भी डाटा कंपनी को उपलब्‍ध न कराया जाए। अदालत के अं‍तरिम आदेश के अनुसार, राज्य सरकार डाटा को पहले वर्गीकृत करेगी, फिर उसमें से लोगों की निजी जानकारियां हटाने के बाद स्प्रिंकलर को विश्‍लेषण के लिए उपलब्‍ध कराएगी। राज्‍य सरकार के इस तर्क पर कि स्प्रिंकलर इंक के पास उसका कोई डाटा नहीं है, खंडपीठ ने कहा कि स्प्रिंकलर इंक के पास जो भी अवशिष्ट या सेकेंडरी डाटा है, उसे वह राज्‍य सरकार के सुपुर्द करे।
यही नहीं, खंडपीठ ने कहा कि स्प्रिंकलर इस विवादित करार की गोपनीयता की शर्तों के तहत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डाटा की गोपनीयता का उल्लंघन नहीं करेगा और न ही राज्य सरकार द्वारा दिए गए डाटा को किसी भी तीसरे पक्ष के साथ विज्ञापन या अन्य माध्यम से साझा करेगा। यानी अमेरिकी कंपनी व्‍यावसायिक लाभ के लिए इन आंकड़ों का उपयोग या दोहन नहीं कर पाएगी। इसके अलावा, अदालत ने स्प्रिंकलर इंक को आदेश दिया कि वह अपने प्रचार-प्रसार में राज्‍य का नाम या राज्‍य प्रतीक (लोगो) का इस्‍तेमाल नहीं करेगी और अनुबंध समा‍प्‍त होने या काम पूरा होने के बाद समय पर पूरा डाटा राज्‍य सरकार को लौटा देगी।
पिनरई विजयन सरकार के गले की फांस
केरल की साम्यवादी सरकार के लिए यह समझौता गले की फांस बन गया है। याचिका पर पहली सुनवाई में ही अदालत ने जिस प्रकार सख्‍त रुख अपनाया है, उसे देखकर नहीं लगता कि आने वाले दिनों में उसकी मुश्किलें कम होंगी। अदालत ने नागरिकों की निजता की गोपनीयता को लेकर सरकार को न केवल फटकार लगाई, बल्कि विदेशी कंपनी के साथ अनुबंध करने से पहले केंद्रीय विधि विभाग की संस्तुति नहीं लेने तथा न्यायिक क्षेत्राधिकार न्यूयॉर्क स्वीकार करने पर राज्‍य सरकार से स्‍पष्‍टीकरण भी मांगा है। अदालत ने राज्‍य के सूचना प्रौद्योगिकी सचिव एम.शिवशंकर की उस स्वीकृति को गंभीरता से लिया है, जिसमें उन्‍होंने विधि विभाग की सहमति के बिना ही स्प्रिंकलर इंक के साथ करार की बात कही है। करार पर केंद्र सरकार ने भी अपना पक्ष रखा है। केंद्र का कहना है कि नागरिकों से जुड़े संवेदनशील डाटा के संग्रहण एवं विश्‍लेषण के लिए यथासंभव सरकारी संस्‍थानों का उपयोग किए जाने की नीति है। खंडपीठ को इस पर भी आश्‍चर्य हुआ कि आशा कार्यकर्ता मोबाइल एप्‍लीकेशन के जरिए कोविड-19 से जुड़ी सभी संवेदनशील जानकारियां एकत्र कर सीधे स्प्रिंकलर इंक के सर्वर पर भेज रही हैं। राज्‍य सरकार ने जब यह कहा कि कोविड-19 के मरीजों के बारे में एकत्र की जा रही जानकारियों में संवेदनशील कुछ भी नहीं है, जिससे किसी को कोई व्‍यक्तिगत नुकसान हो। इस पर खंडपीठ ने राज्य सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में डाटा की गोपनीयता की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए राज्य सरकार की इस स्वीकारोक्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ये कोई संवेदनशील डाटा नही हैं। स्वास्थ्य से संबंधित जानकारियों का डाटा संवेदनशील ही होता है। यदि कंपनी इस डाटा का दुरुपयोग करती है तो इसके लिए राज्य सरकार ही जिम्‍मेदार होगी। साथ ही, कहा कि अदालत की समझ मे यह बात नहीं आई कि राज्‍य सरकार ने करार में न्यूयॉर्क के न्यायिक क्षेत्राधिकार की शर्त क्‍यों मानी? यदि किसी वजह से अनुबंध टूटता है तो राज्य सरकार को न्यूयॉर्क जाना होगा! यही नहीं, खंडपीठ ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जब राज्य में कोविड-19 के मरीजों की संख्या मे कमी आ रही है, तब भी वह ‘क्लाउड प्लेटफॉर्म’ का उपयोग क्‍यों कर रही है?