मजहब की आड़ में भारत के खिलाफ साजिश ?
   दिनांक 03-अप्रैल-2020
अनिल पांडेय
देशभर में फैल गए हैं। कुछ दिनों में कोरोना के मामले देशभर में अचानक से बढ़ गए हैं। इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं जो तब्लीगी जमात से जुड़े हैं

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कुछ लोग अपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं, एक अपराध गलती से होता है। कभी-कभी आवेश और भावावेश में भी अपराध होते हैं। लेकिन, कुछ अपराध साजिशन भी किए जाते हैं, जो कहीं ज्यादा खतरनाक होते हैं। तब्लीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद के मरकज में मजहबी तकरीरों के जो आडियो सामने आ रहे हैं, उसे सुनकर साफ लग रहा है कि मौलाना मोहम्मद साद ने देश-दुनिया में कोरोना की बीमारी फैलाने की साजिश रची। साफ पता चल रहा है कि मौलाना ने लोगों को लॉक डाउन के दौरान सरकार के आदेशों को न मान कर मस्जिद में नमाज पढ़ने और मजहबी आयोजनों को न रोकने के लिए भड़काया।
एक आडियो में मौलाना कह रहा है कि डॉक्टर की बात नहीं माननी। डॉक्टर अल्लाह के काम को रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
इससे पहले मार्च के पहले हफ्ते में दिल्ली जैसा मरकज मलेशिया में भी हुआ था। उसके बाद वहां मरकज में शामिल 620 मौलवियों और मजहबी प्रचारकों में कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इसकी खबर विदेशी मीडिया में प्रमुखता से छपी भी थी। इसके अलावा कई और देशों में भी तब्लीगी जमात की मरकज में शामिल लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए। ऐसा हो नहीं सकता कि इस खबर से मौलाना साद अच्छी तरह वाकिफ नहीं होंगे।
कानून और संविधान की धज्जियां उड़ा कर तब्लीगी जमात का आयोजन और फिर इसकी वजह से देशभर में कोरोना का फैलाव भयावह है। तब्लीगी जमात के मौलवियों और मजहबी तकरीरों ने देश को खतरे में डाल दिया है। दिल्ली सरकार के धारा 144 लगाने, किसी स्थान पर 20 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा न होने और फिर केंद्र सरकार के लॉक डाउन की घोषणा के बाद भी मरकज चल रहा था। जिसमें देश-विदेश के 2000 से ज्यादा लोग शिरकत कर रहे थे। दिल्ली पुलिस ने भी जमात को इस जलसे को रद्द करने और सोशल डिस्टेसिंग बनाने के लिए कई बार चेतावनी दी। लेकिन मौलाना के कान में जूं तक नहीं रेंगी।
सवाल यह है कि क्या तब्लीगी जमात और इसके मुखिया मैलाना साद खुद को कानून और संविधान से ऊपर मानते हैं? नई दिल्ली के हजरत निमाजुद्दीन इलाके में तब्लीगी जमात का मुख्यालय है। जमात की शाखाएं दुनियाभर के कई देशों में फैली हुई हैं और इससे दुनियाभर के कई करोड़ लोग जुड़े हुए हैं।

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मार्च आखिर में देश और विदेश से मरकज में शामिल हुए हजारों लोग यहां से निकल कर देशभर में फैल गए हैं। कुछ दिनों में कोरोना के मामले देशभर में अचानक से बढ़ गए हैं। इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं जो तब्लीगी जमात से जुड़े हैं और निजामुद्दीन के मरकज में शामिल हुए थे। इसकी भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में कोरोना पॉजिटिव करीब 219 केस पाए गए हैं। इनमें से 108 तब्लीगी जमाती हैं। यानी तकरीबन आधे।
अंडमान निकोबार के तकरीबन सभी 10 मामले दिल्ली मरकज में शामिल हो कर यहां से गए तब्लीगी जमात के लोगों के ही हैं। जम्मू कस्मीर में कोरोना से जिस मौलवी की मौत हुई है, वह भी जमात से ही जुड़ा था और दिल्ली मरकज में शामिल होकर कश्मीर लौटा था।
ये लोग कितनी जगहों पर गए होंगे...? यात्रा और नमाज आदि के दौरान कितने लोगों को संपर्क में आए होंगे...? उपदेशों और धर्म प्रचार के दौरान बहुत से लोगों से मिले होंगे.... उनमें से कितने लोग संक्रमित हुए होंगे...? फिर वे लोग कितने और लोगों से संपर्क में आए होंगे...? इसका अंदाजा लगाना ही, मन में भय और खौफ पैदा कर देता है।
जाहिर है, एक तरह से ये लोग कोरोना के “डायनामाइड” हैं। पुलिस और सरकार की अपील के बाद भी ये लोग मस्जिदों में छुपे बैठे हैं और जांच में सहयोग नहीं कर कर रहे हैं। पुलिस जब इनकी पहचान कर जांच के लिए लेने जा रही है तो इन पर जानलेवा हमला कर रहे हैं, मेडिकल स्टाफ पर थूक रहे हैं और नर्सों को छेड़ रहे हैं। यह रवैया बताता है कि आप अपने अंधविश्वास और करतूतों से देश के लाखों लोगों की न केवल जान जोखिम में डाल रहे हैं, बल्कि देश को एक भयानक त्रासदी की तरफ ले जा रहे हैं। अगर कोरोना वाइरस की यह चेन नहीं टूटी तो भारत भी इटली और स्पेन बन जाएगा। देश में लाशें बिछ जाएंगी।
देश के बुद्धिजीवियों का एक तबका इसे अंधविश्वास का परिणाम बता रहा है और इसे हिंदू-मुसलमान का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। वे यह आरोप लगा रहे हैं कि इसकी आड़ में मुसलमानों पर निशाना साधा जा रहा है। कुछ तो इसे मुसलमानों के खिलाफ मोदी की साजिश करार देने से भी नहीं बाज आ रहे हैं। लेकिन, हमें इसे हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखने की बजाए आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से देखना चाहिए और इसी आधार पर जांच होनी चाहिए। तब्लीगी जमात का इस्लामिक जेहाद और आंतकवाद से तार जुड़ते रहे हैं। इसी वजह से खुफिया एजेंसियों से लेकर आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञ तक इसमें एक गहरी साजिश देख रहे हैं। कुछ तो “कोरोना जेहाद” की आशंका जता रहे हैं। कहीं यह आंतकी संगठनों की कोरोना के मामले में सफल अगुआई करने वाले भारत को तबाह करने की चाल तो नहीं है? खुफिया एजेंसी इस नजर से जांच भी कर रही है।

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तब्लीगी जमात पर साजिश के शक की गहरी वजह भी है। इसके तार अलकायदा जैसे कई इस्लामिक आंतकवादी संगठनों से जुड़ते रहे हैं। इस संगठन पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि यह कटरपंथी इस्लामी आतंकवादी संगठनों की भर्ती और स्लीपर सेल तैयार करने के लिए जमीन तैयार करता है। विकिलीक्स दस्तावेजों के मुताबिक तब्लीगी जमात का संबंध दुनिया के कई इस्लामिक आंतकी संगठनों से रहा है। अमेरिका द्वारा हिरासत में लिए गए 9/11 हमले के कुछ अलकायदा संदिग्ध कई साल पहले निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात परिसर में रुके थे। तब्लीगी जमात का पाकिस्तान के आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल जिहाद अल इस्लामी यानी हूजी, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद से भी जुड़ाव का लंबा इतिहास रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के तब्लीगी सदस्य इन संगठनों से जुड़े रहे हैं। हरकत उल मुजाहिदीन के संस्थापक तब्लीगी जमात के सदस्य थे।
हरकत उल मुजाहिदीन ने अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ की सत्ता को उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाद में हरकत उल मुजाहिदीन और हूजी कश्मीर में सक्रिय हुए और सैकड़ों बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया। मसूद अजहर के नेतृत्व में बने आतंकी संगठन जैश ए मुहम्मद में भी तब्लीगी जमात के सदस्यों की अच्छी खासी तादाद थी। सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि देश में मुस्लिम युवाओं को जेहाद के लिए ब्रेनवॉश करने और स्लीपर सेल तैयार करने के लिए तब्लीगी जमात के इन धर्म उपदेशकों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब तब्लीगी जमात के लोग मस्जिद बनाने की आड़ में धन संग्रह कर आतंकी और चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद कर रहे थे।
तब्लीगी जमात का यह अपराध अक्षम्य है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हर बार की तरह इस बार भी गहरे संकट के दौर में कथित बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका जमात की करतूतों को छुपाने और इसे बचाने में सक्रिय हो गया है। इसे एक मामूली चूक बताया जा रहा है। इसे महज एक चूक कहना किसी बड़े खतरे से आंखे मूंदना है। यह चूक नहीं है। यह किसी गहरी साजिश की तरफ इशारा कर रहा है। इसलिए इस पूरे प्रकरण और मौलाना साद की भूमिका की जांच होनी चाहिए.... कहीं यह मजहब की आड़ में भारत के खिलाफ अभियान तो नहीं चल रहा है? दुनिया बदल रही है और युद्ध और आंतकवाद के तरीके भी। जिस तरह से कोरोना के “जैविक हथियार” होने की आशंका जाहिर की जा रही है, वैसे ही कहीं यह “कोरोना आतकंवाद” तो नहीं....
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )