ऐसे लोगों को मानव बम न कहा जाए तो और क्या कहा जाए ?
    दिनांक 03-अप्रैल-2020
मलिक असगर हाशमी
ऐसा क्यों होता है कि देश हित में जब सरकार कोई निर्णय लेती हैं तो भारतीय मुसलमान अलग खड़ा नजर आता है? कोरोना जैसी महामारी के दौर में भूमिगत हुए जमातियों को मानव बम न कहा जाए तो और क्या कहा जाए ?

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तब्लीगी जमात की हठधर्मिता और नासमझी से भारत में कोरोना वायरस (कोविड-19) संक्रमितों की संख्‍या और इससे होने वाली मौतों के आंकड़ों में अचानक तेजी आई है। अपनी करतूतों का खुलासा होते ही अधिकांश जमाती भूमिगत हो गए, जिससे भारत में कोरोना वायरस के तीसरे चरण में पहुंचने का खतरा बढ़ गया है। इससे भी ज्‍यादा चिंताजनक बात यह है कि इस्‍लामिक धर्मगुरु, मुस्लिम बुद्धिजीवी और तथाकथित सेकुलर पार्टियां भूमिगत जमातियों को निकालने का कोई प्रयास नहीं कर रही हैं, न ही उनकी ओर से अपील की जा रही है कि वे सामने आकर अपने स्वास्थ्य की जांच कराएं और सरकार की सहायता करें ताकि वायरस के फैलाव के क्रम को तोड़ा जा सके। इसके उलट मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है।
जमातियों की करतूत छिपाने की कोशिश
उर्दू अखबार एक सुर में आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र और दिल्ली सरकार अपनी नाकामियां छिपाने के लिए तब्लीगी जमात के दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मुख्यालय, जिसे मरकज कहा जाता है, में कुछ लोगों के कोरोना संक्रमित पाए जाने पर वायरस के फैलाव के लिए उन्‍हें जिम्‍मेदार ठहराया जा रहा है। इसके विपरीत, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्‍यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह और इसके बाद दो दिन तक लाखों लोग सड़कों पर निकले तब कोरोना संक्रमण नहीं फैला? क्या ऐसे सवालों से जमातियों या मुसलमानों की जिम्मेदारी कम हो जाती है? ऐसा क्यों होता है कि देश हित में जब सरकारें कोई निर्णय लेती हैं तो भारतीय मुसलमान अलग खड़ा नजर आता है? ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। ताजा मामले में समझदारी इसी में थी कि भूमिगत जमाती गलती स्‍वीकार कर सामने आते और इस जानलेवा वायरस के खिलाफ लड़ाई में एकजुटता दिखाते। सवाल यह भी है कि हर मामले को मजहबी चश्मे से देखने वाले ऐसे मुसलमानों को कौन समझाए?
अभी भी वोटबैंक की चिंता
देश में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो मुल्ला-मौलवियों के इशारे पर चलते हैं, इसलिए आज सब चुप्पी साधे हुए हैं। मुसलमानों को हिंदुओं का डर दिखाकर उनका वोट बटोरने वाली पार्टियां भी मरकज मामले में चुप हैं। उन्‍हें अच्छी तरह पता है कि ऐसे लोगों के विरूद्ध बोलने का मतलब है बड़ा वोटबैंक खो देना। ऐसे कठमुल्लाओं को खुश करने के लिए ये पार्टियां समय-समय उन्हें राज्यसभा, विधान परिषद् में भेजती रहती हैं।

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2 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद लॉकडाउन के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी को दिल खोलकर कोसा। यहां तक कहा कि हड़बड़ी में लॉकडाउन का निर्णय लेने से जगह-जगह मजदूर फंस गए, पर तब्लीगी जमात के लोगों की हिमाकत पर एक शब्द भी नहीं कहा। क्यों? केवल इसलिए कि इससे मुस्लिम बिदक सकते हैं। इस मामले में वामदल और तमाम तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने भी चुप्‍पी साध रखी है। मीडिया में दो दिनों पहले ही आ चुका था कि मलेशिया की एक मस्जिद में तब्लीगी जमात के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन के बाद से कोराना वायरस लगभाग तमाम देशों में जोर पकड़ने लगा है।
जमा‍ती कहां-कहां गए, पता लगाना मुश्किल
इस अंतरराष्‍ट्रीय इस्लामिक आयोजन में मलेशिया, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, फ्रांस, चीन, बांग्लादेश सहित विभिन्न देशों के 20,000 मुसलमान शामिल हुए थे। इसके तुरंत बाद 27 फरवरी से एक मार्च तक बांग्लादेश, सिंगापुर आदि में तब्लीगियों का इजलास हुआ था जिसमें शामिल होने वाले विभिन्न देशों के जमाती भी कोरोना संक्रमित पाए गए। पिछले महीने तमाम बंदिशों के बावजूद पाकिस्तान के लाहौर में तब्लीगी जमात का वार्षिक सम्मेलन हुआ, जिसमें ढाई लाख लोग सम्मलित हुए थे। इसमें काफी संख्‍या में ऐसे लोग भी शामिल हुए थे, जिनमें कोरोना के लक्षण पाए गए हैं। बड़ी चुनौती यह पता लगाने की है कि ऐसे लोग कहां-कहां गए और किस-किस से मिले, ताकि इनकी पहचान कर रोग के विस्तार की श्रृंखला को तोड़ा जा सके।
निजामुद्दीन के मरकज को जब पुलिस ने खंगाला तो उसमें 2300 से अधिक लोग लोग पाए गए। इससे पहले यहां एक इस्लामिक कार्यक्रम हुआ था जिसमें शामिल लोग बाद में देशभर में इस्लाम का प्रचार करने निकल गए थे। उनमें से कुछ को देश के विभिन्न शहरों एवं कस्बों की मस्जिदों, मदरसों से खोज निकाला गया है, पर अभी भी बहुतेरे भूमिगत हैं। यहां तक कि तब्लीगी जमात के मुखिया मोहम्मद साद भी भेद खुलने के बाद भूमिगत हो गए थे।
जमातियों के इस रवैये से देश पर कितनी बड़ी आपदा आने वाली है, इस्लामिक संगठनों एवं सेकुलर जमातों ने इसकी भी अनदेखी की। एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जैनुल हैरिश कहते हैं कि देशहित और अपने परिवार-समाजहित में भूमिगत जमातियों को खुद ही आगे आ जाना चाहिए था।
नाजुक मौके पर भी इस्‍लामिक संगठन बंटे
दूसरी तरफ, विभिन्न फिरकों के इस्लामिक संगठन भी ऐसे मौके पर बंटे नजर आ रहे हैं। वे सरकार को जानलेवा लोग से लड़ने में सहयोग करने की बजाए मरकज विवाद में एक-दूसरे की टांग खिंचाई में लगे हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खालिद रशीद फिरंगी महली भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं। भूमिगत जमातियों को आगे लाने की पहल करने की बजाए ऐसे बयान देकर उन्हें डराते रहे कि जिम्मेदार लोगों को जवाबदेही तय कर इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। भला ऐसे बयानों के बाद कौन सामने आगे आना चाहेगा? जवाबदेही जब तय होगी तब तय होगी। पहली प्राथमिका तो ऐसे लोगों को चिन्हित कर उन्हें कोरेंटाइन करना होता है। जमियत उलेमा-ए-हिंद के सदर मौलाना सैयद अरशद मदनी भी मुसलमानों को भड़का कर रहे हैं। उन्होंने बजाब्ता बयान जारी कर कहा है कि मरकज मामले को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। इससे कोराना के विरूद्ध जंग कमजोर होगी। उन्होंने तब्लीगी जमात की हिमायत करते हुए कहा कि अचानक लॉकडाउन होने से वहां कई लोग फंस गए थे। देश की मीडिया एकतरफा तस्वीर पेश कर रही है। इस मामले में मुसलमानों के तथाकथित झंडाबरदार एआईएमएमआई मुखिया असदुद्दीन ओवैसी भी जमायत के हिमायत में खड़े नजर आए। उनसे जब प्रतिबंध के बावजूद विदेशियों सहित हजारों लोगों को मरकज में इकट्ठा करने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसका जवाब देने की बजाए यह बताना शुरू कर दिया कि वे सरकार के साथ मिलकर तलंगाना में किस तरह गरीब-गुरबा की सेवा में लगे हैं। बैरिस्टर होने के नाते ओवैसी को अच्छी तरह पता है कि इस मामले में तब्लीगी जमात का रवैया गैर जिम्मेदाराना रहा है।
 
छोटी-छोटी टुकडि़यों में बंटे मानव बम
 
कोराना वायरस के चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरी दुनिया में जलसा-जुलूस पर चेतावनी जारी कर रखी है। इसके बावजूद तब्लीगी जमात के लोग विश्व के अलग-अलग देशों में इजतमा करते रहे। इस क्रम में मरकज में भी कार्यक्रम आयोजित किया गया। फिर छोटी-छोटी टुकड़ियों में वे हिंदुस्तानभर में फैल गए। अब ऐसे लोगों को मानव बम न कहा जाए तो और क्या कहा जाए? कहने को तब्लीगी जमात में ईमान और इस्लाम के बताए रास्ते पर चलने की सीख दी जाती है। मगर इस मामले में तब्लीगी जमात के सदर साद और इनके लोग झूठ पर झूठ बोलते रहे। पहले कुछ कागजात मीडिया में जारी कर कहा कि उन्होंने पुलिस प्रशासन से मरकज में फंसे लोगों को निकल जाने के लिए वाहन की मांग की है। लेकिन पुलिस ने वीडियो जारी कर स्पष्ट कर दिया कि मरकज के लोग झूठ बोल रहे हैं। सच तो यह है कि 23 मार्च को उन्‍हें मरकज खाली करने के आदेश दे दिए गए थे।
मरकज पहले से कहता रहा है कि उसके यहां 700-800 लोग रह रहे हैं, लेकिन इनकी संख्‍या 2300 से अधिक निकली। बसों से अस्‍पताल ले जाते समय जमाती अमानवीयता की सारी हदें पार कर गए। वे पूरे रास्‍ते थूकते गए ताकि दूसरे लोगों में भी संक्रमण फैले। क्या इस्लाम यही सिखाता है? तब्लीगी जमात मुसलमानों को क्‍या यही शिक्षा देती है? केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्‍तार अब्बास नकवी कहते हैं कि जमातियों का यह मामला तालिबानी है, इसलिए इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई जरूरी है ताकि उन्हें सीख मिल सके।