कर्ज माफी की अफवाह के पीछे क्या है असली खेल

    दिनांक 30-अप्रैल-2020
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चंद्र प्रकाश 
 
मीडिया का एक वर्ग हर वर्ष झूठ फैलाता है कि केंद्र सरकार बड़े उद्योगपतियों का कर्ज माफ कर रही है। यह सफेद झूठ के अलावा और कुछ नहीं है। लोगों को भ्रमित करने के लिए ऐसा किया जाता है। सचाई तो यह है कि यह सरकार बैंकों के फंसे हुए कर्ज को वापस लाने के लिए दिन-रात काम कर रही है

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सांकेतिक चित्र में बताया गया है कि किस तरह आयकर के अधिकारी घोटालेबाजों को खोज रहे हैं। 
इन दिनों फिर एक बार झूठ फैलाया जा रहा है कि केंद्र सरकार बड़े कारोबारियों का कर्ज माफ कर रही है। 2016 से मीडिया का यह सालाना पर्व है। हर साल इस समय के आसपास ऐसा झूठ फैलाया जाता है। यह वह झूठ है जिसकी पोल हर साल खुलती है। इसके बाद भी मीडिया का एक बड़ा वर्ग उसी झूठ को दोहराता है। कभी रिजर्व बैंक के सूत्रों के हवाले से, तो कभी सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के आधार पर। हर साल की तरह इस साल यह खबर उड़ाई जा चुकी है कि मोदी सरकार ने 50 उद्योगों के 68,000 करोड़ रुपए के कर्ज ‘राइट आफ’ कर दिए। इनमें भगोड़ा हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी भी शामिल है। ‘राइट आफ’ का हिंदी अनुवाद बट्टा खाते में डालना होता है। यह एक तकनीकी प्रक्रिया है, जिसके बाद कंपनियों से डूबे हुए कर्ज की वसूली के दूसरे तरीके अपनाए जाते हैं। हैरानी की बात है कि पैसा वापस लेने की इस तय कानूनी प्रक्रिया को लेकर हर साल भ्रम पैदा करने की कोशिश होती है। विपक्षी पार्टियां इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के लिए इस्तेमाल करती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मीडिया ने कभी इस झूठ के तथ्यों की जांच करने की आवश्यकता नहीं समझी। साथ ही आरोप लगाने वालों से कभी पूछा नहीं गया कि डूबा हुआ यह कर्जा इन कंपनियों को दिया किसने था ?
क्या है ‘राइट आफ’ का सच ?
कई अखबार और चैनल ‘राइट आफ’ शब्द को ‘वेव आफ’ यानी कर्जमाफी बताते हैं। जबकि ‘राइट आफ’ या बट्टा खाता बैंक के बही-खाते को दुरुस्त करने की एक पूर्व निर्धारित प्रक्रिया है। फिर भी मीडिया का एक वर्ग यह ‘फर्जी खबर’ फैलाता है, जिसका उद्देश्य है कि लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा करना। इस देश की बैंकिंग प्रणाली में इतने घोटाले हो चुके हैं कि अक्सर लोग इन झूठ को सच भी मान लेते हैं। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले बांटे गए कर्जों की वसूली का काम लगातार जारी है। मोदी सरकार ने पिछले पांच साल में इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को पुख़्ता बनाया और कार्रवाई का दबाव लगातार बनाए रखा। इसी का परिणाम है कि डूबे हुए कर्जों की वापसी लगातार जारी है। अकेले इसी वित्त वर्ष में निजी कंपनियों को बांटे गए 2.04 लाख करोड़ रुपए वापस वसूले जा चुके हैं। जबकि पिछले वित्त वर्ष में वसूली का यह आंकड़ा 3.59 लाख करोड़ रुपए था। इसका मतलब हुआ कि किसी उद्योगपति का एक भी पैसा माफ नहीं किया गया है, बल्कि कांग्रेस के बांटे गए इन लाखों-करोड़ों के कर्जों की वसूली जारी है।

 
 
 
झूठ के पीछे क्या है मंशा ?
मीडिया में कई बार जानकारी के अभाव या भ्रम के कारण कुछ गलत खबरें चल जाती हैं। लेकिन बैंक ऋणों की माफी को लेकर यह झूठ साल दर साल फैलाया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब भारतीय रिजर्व बैंक कई बार इस बारे में बयान जारी कर चुका है। संसद में सरकार कई बार तथ्य बता चुकी है। इससे पता चलता है कि इस झूठ के पीछे की मंशा बेहद खतरनाक है, क्योंकि जब कोई अखबार या चैनल यह समाचार देता है कि सरकार ने कुछ उद्योगपतियों के करोड़ों रुपए छोड़ दिए तो किसानों, छोटे उद्यमियों और सामान्य वेतनभोगी लोगों का भरोसा टूटता है। उन्हें लगता है कि सरकार ने उनसे छल किया है। अक्सर किसान इस झांसे में आकर अपने कर्ज की किस्त लौटाना बंद कर देते हैं। इसके बाद उन्हें आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है। ऐसी घटनाओं का परिणाम होता है कि किसानों का कर्ज माफ करने का दबाव बनना शुरू होता है। यदि देश का विपक्ष कांग्रेस जैसा कोई गैरजिम्मेदार और संदिग्ध निष्ठाओं वाला दल हुआ तो वह इस आग में घी डालकर देश का अहित करने का मौका नहीं छोड़ता। पिछले पांच साल से कांग्रेस लगातार यह काम कर भी रही है। राहुल गांधी अपनी रैलियों में बार-बार दोहराते हैं कि मोदी सरकार ने कुछ उद्योगपतियों के कई लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए, जबकि तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं।

बैंकिंग प्रणाली के खिलाफ षड्यंत्र
 
बैंकों का फंसा हुआ ऋण एक संवेदनशील मामला है। इसमें हर किसी को एक डंडे से हांका भी नहीं जा सकता। निश्चित रूप से कुछ घोटालेबाज होते हैं, लेकिन कुछ ऐसे उद्योग भी होते हैं जो किन्हीं कारोबारी कारणों से संकट में आ गए और पैसे लौटा नहीं पा रहे। ऐसे में कार्रवाई के लिए रिजर्व बैंक ने एक प्रणाली विकसित की है। बैंक फंसे हुए ऋण को तीन तरह से देखते हैं- पहला, यह कि क्या कंपनी अभी किसी तात्कालिक कारण से पैसे नहीं लौटा पा रही और आगे स्थितियां ठीक होने की आशा है। ऐसे में बैंक उसको हरसंभव मदद करता है। दूसरा, यह कि ऋण लेने वाली कंपनी ने गलती नहीं की, लेकिन अब व्यापार में उसे कुछ समस्या आ रही है और पैसा निकलने की उम्मीद नहीं। ऐसे मामले में अब नए दिवालिया कानून (आईबीसी) के तहत कार्रवाई शुरू होती है। कंपनी बेच कर पैसा निकाला जाता है। तीसरा मामला वह होता है, जिसमें बैंक ग्राहक को ‘जानबूझ कर ऋण न चुकाने वाला’ मान लेता है। ऐसी कंपनियों और उनके मालिकों की सारी संपत्तियां बेचकर उगाही की जाती है और हो सकता है कि उन्हें जेल भी जाना पड़े।
प्रश्न यही उठता है कि इस तर्कसंगत प्रणाली को लेकर भ्रम फैलाने वालों को कब तक इसकी छूट मिलती रहेगी ? ऐसी छूट से देश में भ्रम फैलता है। इसलिए ऐसे लोगों के खिलाफ समय रहते कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसी में भारत और भारतीयों का हित छिपा है। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)