पालघर में संतों की जघन्य ह्त्या पर क्यों चुप्पी साधे हैं जेएनयू के तथाकथित बुद्धिजीवी

    दिनांक 30-अप्रैल-2020
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डॉ. अंशु जोशी
 पुलिस संरक्षण में महाराष्ट्र में दो साधुओं की पीट—पीट कर जघन्य ह्त्या कर दी जाती है। पुलिस हाथ पर हाथ रखे सारा तमाशा देखती रहती है पर करती कुछ नहीं। लेकिन इस घटना पर न मोमबत्ती ब्रिगेड जागती है न आतंकवादियों के मानवाधिकारों पर धरना देने वाले झोलाछाप ही कुछ कहते दिखाई देते। जेएनयू के तथाकथित बुद्धिजीवियों को तो मानों सांप ही सूंघ जाता है।
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पिछले दिनों कोरोनाकाल में ओछी राजनीति के नए सोपानों के दर्शन हुए। तब्लीगी जमात के जमाती या कहूं जिहादी कोरोना का संक्रमण लेकर पूरे देश में फ़ैल गए।
 
कोरोना से लड़ने के सरकार और जनता के अब तक के प्रयासों पर पानी या लिखूं कोरोना फिर गया। पर तथाकथित पंथनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति करने वालों ने जमातियों की खूब पीठ थपथपाई। जमातियों ने ऐसा क्यों किया, ये तो उनकी बाद की हरकतों से पता चल ही जाता है जिसमें वे अस्पताल में नियमों की धज्जियां उड़ाते दिखते हैं, नर्सों और महिला डॉक्टरों के साथ अश्लील हरकतें करते हैं, थूकते हैं, गाली—गलौज करते हैं और खुश दिखते हैं कि वे काफिरों में कोरोना फैला रहे हैं।
 
इन जमातियों को एक शब्द कहना तो कौम के लोग इनके समर्थन में उतरकर घिनौनी हरकतों जस्टीफाई करते हैं। कई तो सरकार के प्रयासों को विफल करने के लिए ख़म ठोंककर मैदान में खड़े दिखते हैं। और तो और जमाती महिलाएं भी पुलिस प्रशासन पर ईटें फेंकती नज़र आती हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अशिक्षा इसके पीछे का कारण नहीं है। कारण है इस अराजक तत्वों में राष्ट्र के प्रति भरी नफरत की भावना। दीन के नाम पर भरा ज़हर। और फिर पकड़े जाने पर अल्पसंख्यक का विक्टिम कार्ड खेलने की आदत। उस पर भी तुर्रा यह कि जब संक्रमित जमातियों की बात की जा रही थी, तब ये कहा गया कि संक्रमित व्यक्तियों को किसी एक संगठन से न जोड़ा जाए पर जब इनमें से कुछ ने अपने प्लास्मा डोनेट करने की बात की तब इसे पूरी जमात की उपलब्धि बताया गया। मतलब जब फैलाओ तो हम साथ नहीं और जब आंशिक सहयोग करो तब पूरी जमात का नाम हो।

कहां हैं बात—बात पर ढफली बजाने वाले ?
बहरहाल अगर कहीं यह कार्य कुछ हिन्दुओं की ओर से हो गया होता तो समूचे हिन्दू धर्म को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता। सवालों की झड़ी लग गई होती और सनातन धर्म को लक्षित करके हमले हो रहे होते।
 
खैर सनातन धर्म से पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या याद आ जाती है। पुलिस संरक्षण में महाराष्ट्र में दो साधुओं की पीट—पीट कर जघन्य ह्त्या कर दी जाती है। पुलिस हाथ पर हाथ रखे सारा तमाशा देखती रहती है पर करती कुछ नहीं। विडिओ और फोटो देखकर अश्रु नहीं रुकते। पर इस पर भी गंदी राजनीति। न मोमबत्ती ब्रिगेड जागती है न आतंकवादियों के मानवाधिकारों पर धरना देने वाले झोलाछाप ही कुछ कहते या करते हैं।
 
जेएनयू के तथाकथित बुद्धिजीवियों को तो सांपसूंघ जाता है। यही घटना गलती से कश्मीर में हो जाती और मरने वाले हिन्दू न होते तो पूरे देश में कोहराम मचा दिया जाता। कोरोना से उपजे संकट के बीच भी धर्म के नाम पर यह राजनीति जारी है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार अब चुप क्यों ?
इसी बीच देश का एक पत्रकार—जमातियों को बौद्धिक बताने और संतों की हत्या पर चुप्पी साध लेने वाले इन राजनीतिज्ञों से सवाल कर लेता है तो उनके निशाने पर आ जाता है। खबरों में पढ़ा और सुना कि सोनिया गांधी का वास्तविक नाम लेने की ज़ुर्रत करने वाले इस पत्रकार से मुंबई में घंटों पूछताछ की गयी, क्योंकि उसने गुस्ताखी कर कर दी थी अपने ऊपर हुए हमले के बारे में बताकर। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार इस पर एक शब्द नहीं बोले। जेएनयू में किसी ने ढफली नहीं बजायी न जुलूस निकाला। शाहीन बाग़ और जमातियों के समर्थन में पोस्टर निकालने वाले गायब हो गए। इस पत्रकार को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी क्योंकि वह तथाकथित बुद्धिजीवियों के दल का हिस्सा नहीं है।
ये कैसा बुद्धिजीवी वर्ग है जो घटना पर नहीं लोगों के नाम पर प्रतिक्रिया देता है ? ये कैसी विचार धारा है जो पंथनिरपेक्षता के नाम पर सनातन धर्म को कोसने और मजहब विशेष को विक्टिम दिखाने की राजनीति करता है ? ये कैसे जागृत लोग हैं जो जिहादी हरकतों को देखते हुए भी सोये रहते हैं ? ये कैसे स्वतन्त्रता के पैरोकार हैं, जिनसे एक पत्रकार का सवाल सहन नहीं होता? सबसे बड़ी बात ये कैसे इंसान हैं जो एक जघन्य हत्याकांड पर भी चुप रहते हैं क्या सिर्फ इसलिए कि मरने वाले साधु थे ?
कोरोना काल में राष्ट्र जिन चुनौतियों से हर दिन जूझ रहा है ये तमाम सवाल कोरोना से न जुड़े होते हुए भी सम्बंधित हैं। ये वे चुनौतियां हैं जो परोक्ष रूप से कोरोना से हमारी लड़ाई को कमज़ोर कर रही हैं। राष्ट्र का हर व्यक्ति इस समय अपना सकारात्मक योगदान देने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में प्रशासन के लिए हर दिन परेशानी पैदा करते जमाती हों या तथाकथित बुद्धिजीवी या नफरत की राजनीति करते राजनीतिज्ञ, इनके बारे में न सिर्फ बात की जानी चाहिए बल्कि इनका समाधान ढूंढकर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोरोना के विरुद्ध, नफरत के विरुद्ध और आगे बढ़ने की यात्रा के लिए चल रहे राष्ट्र के यज्ञ को कोई भंग न कर पाए।
( लेेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं )