जिहादियों के शायर, कठमुल्लों के ‘बुद्धिजीवी’

    दिनांक 04-अप्रैल-2020   
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डॉक्टरों पर थूकने वाले और अस्पताल में नंगे घूमने वाले तब्लीगियों के शायर बनाकर आए मुनव्वर राणा जैसे लोग. पुलिस पर पत्थर बरसाने वाले जिहादियों के समर्थन में कईयों ने संभाला मोर्चा. “विक्टिम कॉम्प्लेक्स” के हथियार से देश पर हमला

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अंग्रेजी में एक मुहावरा चलता है- जिहाद अपॉलोजिस्ट. जिसका अर्थ है जिहादी आतंकियों के समर्थन में तर्क-वितर्क करने वाला. सारी दुनिया में वामपंथी और बुद्धिजीविता का लबादा ओढ़े हुए कुछ जिहादी तत्व जिहाद अपॉलोजिस्ट का काम करते हैं. भारत में भी बहुतेरे हैं, जो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को जायज ठहराते हैं, जिहादी दंगाइयों को पीड़ित दिखाते हैं. आज बात निकली है सोनिया गांधी की विरुदावली गाकर शायर कहलाए मुनव्वर राणा की.
जब कोरोना संक्रमण काबू में आता दिख रहा था तब अचानक तबलीगी जमात की हरकतों के कारण देश के कोने-कोने से नए कोरोना के मामले निकलकर सामने आने लगे. शुक्रवार, 3 अप्रैल को, देश में एक दिन में ही 460 नए कोरोना पॉजिटिव सामने आ गए, और दूसरी तरफ जिहादियों ने जुमे की नमाज के नाम पर देश में जगह-जगह उपद्रव मचाया. पुलिस पर हमले किए. इंदौर, हुबली, कन्नौज और अलीगढ़ में पुलिस और स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले किए गए हैं. इधर तब्लीगी जमात वालों की मचाई गंद को सारा देश मिलकर साफ़ कर रहा है, उधर तब्लीगी उनकी सेवा करने आई नर्सों से अश्लील हरकतें कर रहे हैं, अस्पताल में नंगे घूम रहे हैं और डॉक्टरों और पुलिस वालों पर थूक रहे हैं. ये कठमुल्ले, क्वारंटाइन किए गए हैं, लेकिन सुधरने को तैयार नहीं. हॉस्पिटल में भी इकट्ठे हो कर नमाज पढ़ रहे हैं.
सोशल मीडिया को भी ‘कोरोना जिहाद’ भड़काने का माध्यम बना लिया गया है. टिक-टॉक पर सैय्यद जमील नाम के मुस्लिम युवक ने 5 सौ के नोटों से अपनी नाक पोंछते हुए वीडियो पोस्ट किया जिसमें वो कैमरे को देखते हुए कह रहा है कि “कोरोना जैसी बीमारी का कोई इलाज नहीं है. ये बीमारी नहीं, ये अल्लाह का अजाब (सजा) है, .....आप लोगों के लिए.” एक अन्य वीडियो में मुस्लिम युवक दूसरे के चेहरे से नकाब हटाते हुए कह रहा है “आज कहते हैं (सामूहिक) नमाज छोड़ दो, कल कहेंगे इस्लाम छोड़ दो.. कोरोना का इलाज है नमाज.” देशभर में मौलाना मुस्लिमों को भड़काते दिख रहे हैं कि कोरोना झूठ है.ये मुसलमानों को नमाज से दूर करने की साजिश है.
देश इन हरकतों से हलाकान है. शांतिप्रिय और क़ानून का पालन करने वाले मुस्लिम भी इन हरकतों को देख शर्मिंदा हो रहे हैं, लेकिन शायर मुनव्वर राणा इस सबकी निंदा करने की जगह इन कठमुल्लों को आड़ देने का काम कर रहे हैं.
मुनव्वर राणा ने ट्वीट किया 
 
जो भी ये सुनता है हैरान हुआ जाता है, अब कोरोना भी मुसलमान हुआ जाता है.
देश में सेकुलर शायरों की एक जमात है, जो किसी बात के समर्थन में तर्क प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि कोई चलताऊ शेर अर्ज कर देती है. जहर भी उगल दिया, जवाबदारी से भी बच गए. मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी इसी दर्जे के दर्जे के शायर हैं.
राणा को उसी अंदाज में मुंहतोड़ जवाब दिया पत्रकार रोहित सरदाना ने. सरदाना ने लिखा
जब भी मुश्किल में मेरा देश कभी आता है, ये ‘मुनव्वर’ भी ‘मुसलमान’ ही हो जाता है.
सोशल मीडिया पर कई लोगों राणा की शायरी के अंदाज में ही अच्छी खबर ली.
एक यूज़र ने लिखा -
लोग घरों में बंद हैं और वो जमात लगाए बैठे हैं,
जहां इबादत में हाथ उठने थे, वहां पत्थर उठाए बैठे हैं,
जिन का अहसान मान लेना था, उन्हें गाली सुनाए बैठे हैं,
इंसानियत की चिंता होती, तो यूं मजमा ना लगाते,
अब जो बेपर्दा हुए, तो मजहब बीच में घुसाए बैठे हैं!
एक यूजर ने राहत इंदौरी के एक शेर की तर्ज़ पर जिहादियों और राणा दोनों की खबर ले डाली. राहत इंदौरी ने सीएए और एनआरसी पर अफवाह फैलाते हुए, और एक तरह से धमकाते हुए कहा था –
हमारे सर की फटी टोपियों पे तंज न कर, ये डाक्युमेंट हमारे अजायबघरों में रक्खे हैं...
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.
हमारे मुंह से जो निकले वहीं सदाकत है..हमारे मुंह में तुम्हारी जबान थोड़ी है.
इसी अंदाज में एक यूज़र ने राणा को जवाब दिया-
अगर चिढ़ते हैं तो चिढ़ने दो, मेहमान थोड़ी है, ये सब हैं जाहिल, अब्दुल कलाम थोड़ी हैं
फैलेगा कोरोना तो आएंगे घर कई ज़द्द में,यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.
मैं जानता हूं देश उनका भी है लेकिन, हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है.
सीएए-एनआरसी पर मुनव्वर राणा ने लड़कर मरने का उकसावा देते हुए कहा था-
मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे,खामोशी से मर जाना मुनासिब नहीं होगा।
उस समय भी रोहित सरदाना ने राणा को जवाब दिया था कि -
भीतर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए, जितने ‘शरीफ़’ लोग थे सब खुल के आ गए!
सेकुलरिज्म का लबादा ओढ़े, कितने ही नामचीन जिहादी देश में बरसों से घूम रहे हैं. देश जब भी किसी चुनौती से दो-चार होता है ये लोग अपनी मांद में से बाहर निकल आते हैं. आज जब दुनिया में 51 हजार से ज्यादा लोगों को कोरोनावायरस मौत की नींद सुला चुका है. भारत के लोग दस दिनों से लॉकडाउन की तपस्या कर रहे हैं. गरीब आदमी, दिहाड़ी मजदूर संघर्ष कर रहा है, तब ये लोग विषवमन कर रहे हैं, उन अहसान फरामोश तब्लीगियों की तरह, जो उनकी जान बचाने आए देवदूतों पर थूक रहे थे.
रोशनी के खिलाफ अंधियारे के जिन्न
देशवासियों के कोरोनावायरस के खिलाफ युद्ध को उत्साह व नैतिक मजबूती देने के लिए और घरों में स्वेच्छा से बंद देशवासियों को देश की सामूहिक ताकत का अहसास दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने रौशनी करने का आह्वान किया है. 5 अप्रैल रात 9 बजे सब देशवासी घर की बत्तियां बंद कर, बालकनी में 9 मिनट के लिए मोमबत्ती, दीया या टॉर्च जलाकर प्रकाश करेंगे. पर कई ऐसे जन्मजात मोदी विरोधी हैं, जिन्हें हर बात पर पेट में मरोड़ होने लगती है. असादुद्दीन ओवैसी ने लिखा कि यह देश इवेंट मैनेजमेंट कंपनी नहीं है. भारत के लोग इंसान है जिनके सपने और उम्मीदें हैं. 9 मिनट की नौटंकी में हमारे जीवन को कम मत करो.' अब रौशनी से तो निशाचरों को ही डर लगता है. ओवैसी की पीड़ा समझी जा सकती है.
फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप की मरोड़ एक ट्वीट में इस तरह सामने आई
“एक सवाल था. मोमबत्ती और दिया कहां मिलेगा? दवा की दुकान पे या फिर राशन या सब्ज़ी की दुकान पे? क्या ये भी ज़रूरी समान में आता है? और नहीं मिले तो क्या ये दुनिया जला सकता हूं? माचिस है मेरे पास.”
अनुराग कश्यप की इस छद्म ट्विटर बुद्धिजीविता की हवा ट्विटर पर ही निकल गई. लोगों द्वारा अनुराग को दिए गए कुछ जवाब इस तरह थे –
- माचिस अपने आप से दूर ही रखना.. इतना बारूद भरा हुआ है तुम्हारे अंदर की कभी भी फट सकते हो ..
-जिस फ़ोन से ये ट्वीट कर रहे हो, उसका फ़्लैश ऑन कर लेना, या फ़ोन को भी तेल डाल कर ही चलाते हो?
-आप खुद को भी जला सकते हैं, रोशनी चाहिए सिर्फ कहीं से भी आए.
-तुम कुछ मत जलाना भाई, तुम तो 2014 से ही जल रहे हो ... सबको दिख रहा है.
खतरनाक खेल
अनुराग कश्यप जैसे कई लोग हैं , जो हर सकारात्मक बात का विरोध करते हैं. और फिर यदि वो बात मोदी के मुंह से निकली हो तो उल्टी करने की तो बनती ही है. फिल्म अभिनेत्री श्रुति सेठ, जिसका नाम भी किसी को याद नहीं आता, यदि वो मोदी के इस आह्वान के खिलाफ ट्वीट नहीं करती. और भी हैं इस कतार में, जिनका नाम लेने की ज़रूरत नहीं. कोरोना से लड़ते देश में कट्टरपंथी मुस्लिमों के द्वारा जो बवाल काटा जा रहा है, उसको सही ठहराने की कोशिशें इनमें से कुछ की मजबूरी है, कुछ के लिए व्यापार. कोई उसके खून में दौड़ते वामपंथ की वफादारी निभा रहा है तो कोई सिर्फ अपनी अकल का पिटा हुआ दीवाला दिखा रहा है. मुनव्वर राणा जैसे लोग एक अन्य श्रेणी में आते हैं जो सारी दुनिया में अल्पसंख्यकवाद का शगल भी है, और हथियार भी. इसे कहते हैं “विक्टिम कॉम्प्लेक्स”. स्वयं को, या अपने समूह को पीड़ित के रूप में चित्रित करना और उसकी आड़ में मनमानी करते जाना. ये बेहद घाघ, बहुत प्रभावी और खतरनाक खेल है.