मजहब को अफीम मानने वाले जमात का तब्लीगी जमात को समर्थन
   दिनांक 04-अप्रैल-2020
डाॅ. अंशु जोशी
मजहब को अफीम मानने वाले जमात की जाहिलियत पर मुंह सिले है। जेएनयू में ऐसे वर्ग द्वारा उनका विरोध करना तो दूर की बात उल्टे उनके समर्थन में पोस्टर निकाले जा रहे हैं। संकट काल में मानसिक दिवालिएपन का परिचय देने से भी नहीं चूक रहे कथित बौद्धिक छात्र

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जेएनयू में तब्लीगी जमात के समर्थन में जारी पोस्टर
पूरा विश्व कोरोना नामक घातक वायरस से त्रस्त हो त्राहिमाम कर रहा है। कोरोना का संकट प्राकृतिक है या चीन से निकला जैविक हथियार, ये बहस का एक महत्वपूर्ण किन्तु अलग मुद्दा है। हालांकि फिलहाल चिंता इस बात की है कि अब तक विश्व के एक सौ नब्बे से अधिक देशों में दस लाख से अधिक लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं और मरने वालों का आंकड़ा 50 हजार पार कर चुका हैै। अब तक इसका कोई इलाज नहीं ढूंढा जा सका है, शायद इसीलिए भारत जैसे घनी आबादी वाले देश ने इससे बचने के तमाम तरीकों का मुस्तैदी से पालन करने की ठानी जिसमें जनता ने मोदी सरकार का भरपूर साथ दिया। 22 मार्च को एक दिन के देशव्यापी सफल कर्फ्यू के बाद जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्र से 21 दिनों के लॉकडाउन का आह्वान किया तो अटक से कटक तक जनता ने इसका समर्थन किया। जैविक शास्त्रों पर मेरा शोध होने से मैं यह बात दावे से कह सकती हूं कि विश्व में पहली बार किसी राष्ट्र ने एक मजबूत सिविल डिफेन्स सिस्टम बनाने का सफल प्रयास किया है जिसमें उसे जनता, सामजिक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और मीडिया तक का सकारात्मक सहयोग मिला है।
पर हाय रे तथाकथित बौद्धिक होने का तमगा खुद से लगाए, वामपंथ का काला चश्मा पहने जेएनयू के महान क्रांतिकारी! ऐसी वैश्विक आपातकालीन स्थिति में भी इन्हें राजनीति सूझ गयी। पहले इन्होंने जनता कर्फ्यू का मखौल उड़ाया, फिर लॉकडाउन पर राजनीति आरम्भ की। परिसर के छात्र-छात्राओं को हर दिन स्थिति से अवगत कराते हुए प्रशासन अनुरोध करता रहा कि वे अपने घर लौट जाएं ताकि सभी सुरक्षित रह पाएं पर नहीं साहब! इस पर भी राजनीति करते हुए कुछ कथित क्रांतिकारीटाइप परिसर में ही रुक गए। मैं मानती हूं कि कुछ विद्यार्थियों को चिकित्सकीय या अन्य वजहों से रुकना पड़ा, पर जो रुक गए, उनका उद्देश्य इसी से स्पष्ट हो जाता है कि बजाय प्रशासन या सरकार का सहयोग देने के, वे बाहर घूमने-फिरने को अपना अधिकार समझ रहे हैं।
जमात के कारनामों के समर्थन में पोस्टर निकाल रहे हैं और सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प कर रहे हैं। जेएनयू ने सभी जरूरी सेवाएं जैसे मेस, सैनिटेशन, बाजार आदि सरकार की एडवायजरी के अनुसार बहाल कर रखी है। पर उन मानसिक दिवालिया लोगों के लिए क्या कहा जाए जिन्हें संकट काल में भी ओछी राजनीति सूझ रही है। दो दिन पहले मरकज और जमातियों के समर्थन में जेएनयू के छात्रों द्वारा निकाले पोस्टर देखे गए। दुःख और आक्रोश का मिला-जुला भाव उभरा। जिस मरकज और जमातियों ने जनता के इतने दिनों के सद्प्रयासों पर पानी फेर दिया। जिन मजहबियों की वजह से कई मासूम कोरोना का शिकार बन गए, जिन जमातियों ने जिहादियों का काम कर देश के सामने इतना बड़ा संकट खड़ाकर दिया, उसकी निंदा करने की बजाय समर्थन ? और ये लोग अपने आपको देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय का छात्र कहते हैं। परिसर के प्रवेश द्वार का हाल का एक वीडियो देखा। एक छात्र ने बाहर जाने के लिए सुरक्षाकर्मियों पर खांसने और थूकने की धमकी दी, हाथापाई की। बेचारे सुरक्षाकर्मी अपना काम कर रहे थे। वे बिना पास न किसी को अंदर आने दे सकते हैं न बाहर जाने। परिसर को क्वारंटाइन रखने का पूरा प्रयास किया जा रहा है ताकि अंदर रहने वाले छात्र, शिक्षक, स्टाफ तथा उनके परिवार संक्रमण से बचे रह सकें।
मैं क्या लिखूं, क्या कहूं, निःशब्द हूूं। इस संकट काल में जबकि हम सभी एकजुट रहकर प्रयास कर रहे हैं कि देश कोरोना की चपेट से जल्द से जल्द बाहर निकले, लेकिन देश का तथाकथित वर्ग ऐसे में भी राजनीति करने में लगा हुआ है। उन्हें कोरोना मजाक लग रहा है। वे एक चीज समझ लें, इस संकट काल के इतिहास में उनका नाम काले अक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि आज की जनता न मूर्ख है न अंधी.
( लेेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं )